मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु को स्पष्ट किया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी दुर्घटना में वाहन मालिक (पति) और पीछे बैठी सवारी (पत्नी) दोनों की मृत्यु हो जाती है, तब भी उनके बच्चे अपनी मां की मृत्यु के लिए इंश्योरेंस कंपनी से मुआवजे का दावा कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही मालिक को प्रतिवादी (Respondent) न बनाया गया हो, बीमा कंपनी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की पीठ ने रामदयाल कारपेंटर और अन्य बनाम इफको टोक्यो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने क्लेम ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने तकनीकी आधार पर बच्चों के दावे को खारिज कर दिया था।
क्या था पूरा मामला?
यह घटना 4 मार्च 2019 की है। मृतक रतनबाई अपने पति शिवनारायण के साथ उनकी मोटरसाइकिल (रजिस्ट्रेशन नंबर MP 42 MF 2391) पर पीछे बैठकर (Pillion Rider) खिलचीपुर से अपने गांव जा रही थीं। बाइक शिवनारायण चला रहे थे, जो वाहन के पंजीकृत मालिक भी थे।
रास्ते में संडावता-सारंगपुर रोड पर बाइक अनियंत्रित होकर गिर गई। इस हादसे में रतनबाई को गंभीर चोटें आईं और अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई। वहीं, वाहन मालिक शिवनारायण को भी गंभीर चोटें आईं, लेकिन उनकी मृत्यु इलाज के दौरान अस्पताल में बाद में हुई।
बच्चों (अपीलकर्ता) ने अपनी मां की मृत्यु के लिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत क्लेम याचिका दायर की। उन्होंने पिता की मृत्यु के लिए क्लेम नहीं किया और केवल इंश्योरेंस कंपनी को ही पक्षकार बनाया।
ट्रिब्यूनल ने क्यों खारिज किया था दावा?
क्लेम ट्रिब्यूनल ने हालांकि मुआवजे की राशि 10,79,672 रुपये तय की थी, लेकिन भुगतान का आदेश देने से इनकार कर दिया। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि चूंकि वाहन मालिक (पति) की मृत्यु हो गई है, इसलिए उसकी पत्नी कानूनी प्रतिनिधि होने के नाते वाहन की मालिक बन गई। और चूंकि पत्नी की भी मृत्यु हो गई, तो बच्चे अब वाहन के मालिक हैं।
ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि खुद का वाहन होने की स्थिति में ‘थर्ड पार्टी’ क्लेम नहीं बनता, इसलिए बीमा कंपनी जिम्मेदार नहीं है।
हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
अपीलकर्ताओं के वकील श्री अभिषेक गिलके ने तर्क दिया कि यह एक विशिष्ट मामला है। उन्होंने बताया कि रतनबाई की मृत्यु रास्ते में ही हो गई थी, जबकि वाहन मालिक (शिवनारायण) उस समय जीवित थे और उनकी मृत्यु बाद में इलाज के दौरान हुई। इसलिए, अपनी मृत्यु के समय रतनबाई ‘थर्ड पार्टी’ थीं, न कि वाहन मालिक की कानूनी प्रतिनिधि।
दूसरी ओर, बीमा कंपनी के वकील श्री सुदर्शन पंडित ने तर्क दिया कि मालिक की मृत्यु के बाद वारिस उनकी जगह ले लेते हैं (Step into the shoes of the owner)। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निंगम्मा मामले का हवाला देते हुए कहा कि मालिक (या उनके वारिस) अपने ही वाहन के लिए मुआवजे का दावा नहीं कर सकते।
कोर्ट का विश्लेषण और फैसला
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के तर्क को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति द्विवेदी ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 155 का हवाला दिया, जो यह प्रावधान करती है कि बीमित व्यक्ति (Insured) की मृत्यु के बाद भी बीमा कंपनी के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार समाप्त नहीं होता है।
कोर्ट ने घटनाक्रम और मृत्यु के समय (Sequence of Death) को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा:
“तथ्यों के आधार पर, रतनबाई को मृतक शिवनारायण का कानूनी प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता क्योंकि उनकी मृत्यु शिवनारायण से पहले हो गई थी। इस प्रकार, अपनी मृत्यु के समय वह एक ‘थर्ड पार्टी’ थीं क्योंकि शिवनारायण उस समय जीवित थे।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार, ‘बीमित’ (Insured) और ‘बीमाकर्ता’ (Insurer) को छोड़कर बाकी सभी ‘थर्ड पार्टी’ होते हैं। चूंकि पत्नी की मृत्यु मालिक से पहले हुई थी, इसलिए वह कभी भी वाहन की मालिक नहीं बनीं।
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए इफको टोक्यो जनरल इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया कि वह ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित 10,79,672 रुपये का मुआवजा ब्याज सहित दावेदारों को भुगतान करे।
केस विवरण:
- केस टाइटल: रामदयाल कारपेंटर और अन्य बनाम इफको टोक्यो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड
- केस नंबर: मिसलेनियस अपील नंबर 293/2023
- कोरम: न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी

