गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई आरोपी अदालत के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) से बाहर निवास करता है, तो मजिस्ट्रेट के लिए समन (Process) जारी करने से पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 202 के तहत जांच या अन्वेषण का आदेश देना अनिवार्य है।
जस्टिस संजीव कुमार शर्मा की पीठ ने कहा कि भले ही मजिस्ट्रेट ने धारा 200 के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज कर लिए हों, यह धारा 202 के तहत अनिवार्य जांच की आवश्यकता को खत्म नहीं करता है। इस आधार पर हाईकोर्ट ने पति द्वारा अपनी अलग रह रही पत्नी के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने यह भी माना कि पति द्वारा लगाए गए आरोपों में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात/Criminal Breach of Trust) का अपराध नहीं बनता है, क्योंकि इसमें ‘संपत्ति सौंपने’ (Entrustment) का कोई मामला ही नहीं था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। याचिकाकर्ता पत्नी और प्रतिवादी पति का विवाह वर्ष 2000 में हुआ था और उनके दो बच्चे हैं। पत्नी का आरोप था कि विवाह के दौरान पति ने दूसरी शादी कर ली और उसे शारीरिक व मानसिक क्रूरता का शिकार बनाया। इन परिस्थितियों के चलते, वह 7 मार्च 2022 को अपना ससुराल छोड़कर धुबरी जिले में अपने माता-पिता के घर रहने लगी।
ससुराल छोड़ने के बाद, पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम और CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका दायर की, जिसमें उसके पक्ष में अंतरिम भरण-पोषण का आदेश भी पारित हुआ।
इसके जवाब में, पति ने बारपेटा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के समक्ष एक शिकायत दर्ज कराई। पति का आरोप था कि पत्नी जाते समय उसके और बच्चों के सभी “आवश्यक दस्तावेज चुरा ले गई” और उन्हें अपने पास रख लिया। मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), बारपेटा को स्थानांतरित किया गया। मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद, 23 नवंबर 2022 को अपराध का संज्ञान लिया और पत्नी के खिलाफ प्रक्रिया जारी कर दी।
पत्नी ने इस आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
याचिकाकर्ता पत्नी की ओर से पेश हुए अधिवक्ता श्री एस. एस. अहमद ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट का आदेश पूरी तरह से अवैध था। उनका कहना था कि चूंकि याचिकाकर्ता धुबरी में रहती है, जो बारपेटा कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, इसलिए मजिस्ट्रेट को सीधे समन जारी करने के बजाय CrPC की धारा 202 का पालन करना चाहिए था। इसके तहत, उन्हें या तो स्वयं मामले की जांच करनी चाहिए थी या पुलिस द्वारा जांच का निर्देश देना चाहिए था।
इसके विपरीत, प्रतिवादी पति के वकील श्री एच. ए. अहमद ने दलील दी कि चूंकि मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता और उसके गवाहों के बयान दर्ज कर लिए थे, इसलिए पुलिस जांच का आदेश देने की कोई आवश्यकता नहीं थी, भले ही आरोपी अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहता हो।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
धारा 202 CrPC का पालन अनिवार्य
हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 202 का विश्लेषण किया, जो विशेष रूप से उन मामलों से संबंधित है जहां आरोपी मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहता है।
जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में कहा:
“CrPC की धारा 202 का स्पष्ट अवलोकन यह दर्शाता है कि जहां आरोपी मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र से बाहर किसी स्थान पर रहता है, वहां मजिस्ट्रेट के लिए यह अनिवार्य है कि वह आरोपी के खिलाफ प्रक्रिया जारी करने को स्थगित कर दे। इसके बाद, यह तय करने के लिए कि कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं, वह या तो स्वयं मामले की जांच करे या किसी पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा जांच का निर्देश दे।”
कोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज कर दिया कि धारा 200 के तहत गवाहों की परीक्षा धारा 202 की जांच की आवश्यकता को खत्म कर देती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि निजी शिकायतों में जांच का निर्देश देने से पहले शिकायतकर्ता और गवाहों की परीक्षा एक शर्त है, लेकिन यह बाहर रहने वाले आरोपियों के लिए धारा 202(1) के तहत अनिवार्य जांच या अन्वेषण का विकल्प नहीं है।
IPC की धारा 406 का अपराध नहीं बनता
प्रक्रियात्मक त्रुटि के अलावा, कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर भी विचार किया। मजिस्ट्रेट ने IPC की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत संज्ञान लिया था। हाईकोर्ट ने पाया कि इस अपराध के लिए ‘संपत्ति का सौंपा जाना’ (Entrustment) और ‘बेईमानी से दुरुपयोग’ आवश्यक तत्व हैं।
शिकायत को देखने पर कोर्ट ने पाया कि पति ने पत्नी पर दस्तावेज “चुराने” का आरोप लगाया था, न कि विश्वासघात का।
कोर्ट ने कहा:
“ऐसा कोई आरोप नहीं है कि याचिकाकर्ता ने उक्त दस्तावेजों, वस्तुओं या किसी नकदी को बेईमानी से अपने उपयोग के लिए परिवर्तित किया, या उसने कानून के किसी निर्देश या कानूनी अनुबंध का उल्लंघन करते हुए संपत्ति का निपटान किया… जो ‘आपराधिक विश्वासघात’ की श्रेणी में आता हो।”
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायत के आधार पर प्रथम दृष्टया धारा 406 IPC का कोई अपराध नहीं बनता है।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल के सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने 23.11.2022 के संज्ञान आदेश और पति द्वारा दर्ज शिकायत संख्या 375/2022 की पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
केस का विवरण:
केस टाइटल: नर्जीना @ नरजीना खातून बनाम असम राज्य और
अन्य केस नंबर: Crl.Pet./285/2025
पीठ: न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा

