सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जब किसी एग्रीमेंट (जिसमें आर्बिट्रेशन क्लॉज हो) के अस्तित्व पर ही जालसाजी (Forgery) और फर्जीवाड़े के गंभीर आरोप हों, तो ऐसे विवाद को मध्यस्थता (Arbitration) के लिए नहीं भेजा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब समझौते की बुनियाद ही शक के घेरे में हो, तो उसे आर्बिट्रेटर के पास भेजना कानूनी रूप से सही नहीं है।
जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें साझेदारी (Partnership) से जुड़े एक विवाद को आर्बिट्रेशन के लिए भेज दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जिस ‘एडमिशन डीड’ (प्रवेश विलेख) के आधार पर आर्बिट्रेशन की मांग की जा रही थी, उसका अस्तित्व ही संदेह के गंभीर बादलों में घिरा हुआ है।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद ‘मैसर्स रिद्धि गोल्ड’ (M/s RDDHI Gold) नामक एक पार्टनरशिप फर्म से जुड़ा है। इस फर्म का गठन 1 दिसंबर 2005 को बरनाली मुखर्जी (अपीलकर्ता), आफताबुद्दीन और रेहान इकबाल ने मिलकर किया था।
विवाद तब शुरू हुआ जब रजिया बेगम (प्रतिवादी संख्या 1) ने दावा किया कि मूल साझेदारों ने 2007 में उन्हें फर्म का प्रबंधन सौंपने के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी दी थी। इसके बाद 17 अप्रैल 2007 को एक “एडमिशन डीड” निष्पादित की गई, जिसके तहत पुराने पार्टनर रिटायर हो गए और रजिया बेगम फर्म में शामिल हो गईं।
मामले ने तूल तब पकड़ा जब 2016 में, यानी कथित डीड के लगभग 9 साल बाद, रजिया बेगम ने एक नोटिस जारी कर फर्म में 50.33% हिस्सेदारी का दावा किया। दूसरी ओर, बरनाली मुखर्जी ने इस डीड के अस्तित्व को पूरी तरह नकार दिया। उनका कहना था कि यह दस्तावेज पूरी तरह से जाली और मनगढ़ंत है जिसे रजिया बेगम ने तैयार किया है। उन्होंने बताया कि फर्म का विलय 2011 में ही ‘रिद्धि गोल्ड प्रा. लि.’ कंपनी में हो चुका था।
कानूनी लड़ाई का सफर
इस एक दस्तावेज को लेकर अलग-अलग अदालतों में विरोधाभासी स्थितियां बनीं:
- धारा 9 (अंतरिम राहत): जब रजिया बेगम ने सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट में अर्जी दी, तो 2018 में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि ‘एडमिशन डीड’ का अस्तित्व संदिग्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में इस आदेश को सही माना था।
- धारा 8 (आर्बिट्रेशन में भेजने की मांग): बरनाली मुखर्जी ने डीड को फर्जी बताते हुए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया। रजिया बेगम ने धारा 8 के तहत इसे आर्बिट्रेशन में भेजने की मांग की। निचली अदालतों ने गंभीर धोखाधड़ी के आरोपों को देखते हुए इसे खारिज कर दिया। लेकिन, 2021 में हाईकोर्ट ने आर्टिकल 227 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए मामले को आर्बिट्रेशन के लिए भेज दिया।
- धारा 11 (आर्बिट्रेटर की नियुक्ति): समानांतर कार्यवाही में, हाईकोर्ट ने रजिया बेगम की आर्बिट्रेटर नियुक्त करने की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि जब तक एग्रीमेंट के अस्तित्व पर फैसला नहीं हो जाता, आर्बिट्रेटर नियुक्त करना सही नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट में दलीलें
रजिया बेगम के वकील ने तर्क दिया कि धोखाधड़ी के आरोप भी आर्बिट्रेशन के दायरे में आते हैं और इन पर फैसला करने का अधिकार आर्बिट्रेटर के पास है। उन्होंने ए. अय्यासमी और विद्या ड्रोलिया जैसे फैसलों का हवाला दिया।
इसके विपरीत, बरनाली मुखर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि जिस दस्तावेज (एडमिशन डीड) में आर्बिट्रेशन क्लॉज है, वह खुद ही फर्जी है। उन्होंने तर्क दिया कि 2018 में ही हाईकोर्ट यह मान चुका था कि दस्तावेज असली नहीं लगता, ऐसे में मामले को आर्बिट्रेशन में नहीं भेजा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण: जड़ में ही धोखा हो तो आर्बिट्रेशन नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने धोखाधड़ी और आर्बिट्रेशन से जुड़े कानूनों की बारीकी से जांच की। पीठ ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी के आरोपों को दो श्रेणियों में देखा जाना चाहिए:
- क्या आरोप केवल कॉन्ट्रैक्ट के पालन में धोखाधड़ी के हैं? (ये आर्बिट्रेशन योग्य हैं)
- क्या आरोप यह हैं कि पूरा कॉन्ट्रैक्ट और आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट ही धोखे से बनाया गया है या उसका अस्तित्व ही नहीं है? (ये आर्बिट्रेशन योग्य नहीं हैं)
जस्टिस अराधे ने फैसले में लिखा:
“जब आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट पर ही जालसाजी का आरोप लगाया जाता है, तो ऐसा विवाद आम तौर पर ‘गैर-आर्बिट्रेशन योग्य’ (Non-arbitrable) माना जाता है। अदालत इसकी जांच एक क्षेत्राधिकार के मुद्दे के रूप में करेगी।”
तथ्यों पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने पाया कि ‘एडमिशन डीड’ की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल हैं:
- विरोधाभास: डीड के मुताबिक रजिया के पति (आफताबुद्दीन) 2007 में रिटायर हो गए थे, लेकिन रजिया ने खुद माना कि उनके पति 2010 तक पार्टनर के रूप में काम करते रहे।
- दस्तावेज का गायब रहना: 2007 से 2016 तक, यानी करीब 9 साल तक किसी भी रिकॉर्ड में इस डीड का जिक्र नहीं मिला।
- गारंटर की भूमिका: 2009-2010 के बैंक दस्तावेजों में रजिया बेगम को एक पार्टनर नहीं, बल्कि केवल एक ‘गारंटर’ के रूप में दिखाया गया था।
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 17 अप्रैल 2007 की ‘एडमिशन डीड’ से जुड़ा विवाद केवल संविदात्मक नहीं है, बल्कि इसमें एग्रीमेंट की जड़ में ही गंभीर जालसाजी के आरोप शामिल हैं।
कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा:
- हाईकोर्ट का आदेश रद्द: हाईकोर्ट का 24 सितंबर 2021 का वह आदेश, जिसमें मामले को धारा 8 के तहत आर्बिट्रेशन के लिए भेजा गया था, गलत था। कोर्ट ने कहा कि जब निचली अदालतों ने माना था कि एग्रीमेंट संदिग्ध है, तो हाईकोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए था।
- आर्बिट्रेटर की नियुक्ति नहीं: कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस दूसरे आदेश को सही ठहराया जिसमें आर्बिट्रेटर नियुक्त करने से इनकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक एग्रीमेंट के अस्तित्व पर फैसला नहीं हो जाता, आर्बिट्रेटर की नियुक्ति “समय से पहले और कानूनी रूप से अस्वीकार्य” होगी।
परिणामस्वरूप, बरनाली मुखर्जी की अपील स्वीकार कर ली गई और रजिया बेगम की याचिका खारिज कर दी गई।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: रजिया बेगम बनाम बरनाली मुखर्जी (व अन्य)
- साइटेशन: 2026 INSC 106
- कोरम: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे

