पीड़ित का पता चले बिना या अवैध हिरासत के सबूत के अभाव में धारा 365 IPC के तहत सजा नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 की एक आपराधिक अपील पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पीड़ित का कोई पता नहीं चलता (Corpus not recovered) और अवैध हिरासत (Wrongful Confinement) का कोई ठोस सबूत नहीं है, तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 365 के तहत दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती।

जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने राम नरेन (अब मृत) और अन्य द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए झांसी के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अपीलकर्ताओं को किसी व्यक्ति का गुप्त और अवैध रूप से हिरासत में रखने के इरादे से अपहरण करने का दोषी ठहराया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 9 जून, 1981 को वादी राजा राम द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, वादी का बेटा शिव नरेन 6 जून, 1981 से लापता था। वादी का आरोप था कि अपीलकर्ता कमोद काछी उसके बेटे को गांव में राम नरेन और अन्य लोगों के साथ विवाद सुलझाने के बहाने बुलाकर ले गया था। वादी की इन लोगों से पुरानी रंजिश थी।

गवाहों ने कथित तौर पर पीड़ित को कमोद के साथ जाते हुए देखा था। बाद में, एक सह-आरोपी राम स्वरूप ने धारा 164 सीआरपीसी के तहत इकबालिया बयान दिया था कि आरोपियों ने शिव नरेन की हत्या कर दी, शव को कुएं में फेंक दिया और बाद में सबूत मिटाने के लिए शव को निकालकर जला दिया।

ट्रायल कोर्ट ने 21 अगस्त, 1984 के अपने फैसले में आरोपियों को धारा 147, 148, 302/149 और 201/149 आईपीसी के तहत हत्या और सबूत मिटाने के आरोपों से तो बरी कर दिया था, लेकिन उन्हें धारा 365 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित डागा ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता संख्या 2 और अन्य के खिलाफ धारा 365 आईपीसी के अपराध के संबंध में कोई विशिष्ट भूमिका तय नहीं की गई थी। उन्होंने अदालत को बताया कि अपीलकर्ता संख्या 1, 2, 3 और 4 के खिलाफ धारा 364 या 365 आईपीसी का आरोप (Charge) तय ही नहीं किया गया था। आरोप केवल अपीलकर्ता संख्या 5, कमोद के खिलाफ तय किया गया था, फिर भी अन्य लोगों को दोषी ठहरा दिया गया।

बचाव पक्ष ने जोर दिया कि पीड़ित का शरीर (Corpus) कभी भी बरामद नहीं हुआ, न तो जीवित और न ही मृत। यह भी तर्क दिया गया कि धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज करते समय अपीलकर्ताओं से अवैध हिरासत के संबंध में कोई सवाल नहीं पूछा गया था, जिससे यह दोषसिद्धि कानूनन गलत हो जाती है।

एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) पंकज कुमार शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, जिनमें शरद बिरदीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य और राजस्थान राज्य बनाम काशी राम शामिल हैं, का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जब तक पीड़ित बरामद नहीं होता और अवैध हिरासत के बारे में बयान नहीं देता, तब तक धारा 365 के तहत किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

राज्य की ओर से पेश एजीए (AGA) ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि रंजिश के कारण अपीलकर्ताओं के पास अपराध करने का मकसद था। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़ित को आखिरी बार अपीलकर्ताओं के साथ देखा गया था (Last Seen Theory) और सह-आरोपी का बयान दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने तीन प्रमुख गवाहों – पीडब्लू-1 (वादी), पीडब्लू-2 (बाबू लाल) और पीडब्लू-3 (बाबू खान) के बयानों की गहन जांच की। कोर्ट ने पाया कि हालांकि पीड़ित को आरोपियों के साथ देखे जाने के कुछ सबूत थे, लेकिन “ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह सुझाव दे सके कि पीड़ित को किसी भी तरह से अवैध हिरासत में रखा गया था।”

जस्टिस गुप्ता ने कहा:

“धारा 365 आईपीसी के अपराध के लिए, अभियोजन पक्ष के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि केवल अपहरण ही नहीं हुआ, बल्कि पीड़ित को अवैध रूप से हिरासत (Wrongful Confinement) में रखने का इरादा भी था।”

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में, “न तो पीड़ित का शरीर (Corpus) जीवित या मृत अवस्था में बरामद किया गया है। और न ही ऐसा कोई सबूत है कि मृत शरीर का कोई अवशेष मिला हो जो पीड़ित से मेल खाता हो।”

प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के संबंध में, कोर्ट ने बताया कि धारा 364 आईपीसी का आरोप विशेष रूप से केवल अपीलकर्ता संख्या 5 के खिलाफ तय किया गया था, न कि अन्य के खिलाफ। कोर्ट ने कहा:

“अन्य अपीलकर्ताओं… को धारा 365 के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है, जबकि उनके खिलाफ इस उद्देश्य के लिए कोई आरोप तय नहीं किया गया था और इस प्रकार उन्हें उक्त आरोप का बचाव करने का कोई अवसर नहीं दिया गया।”

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इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि अवैध हिरासत के संबंध में कोई भी आपत्तिजनक परिस्थिति धारा 313 सीआरपीसी के तहत आरोपियों के सामने नहीं रखी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के दृष्टांतों पर भरोसा करते हुए, हाईकोर्ट ने निर्णय दिया:

“जब तक पीड़ित का शरीर (Corpus) बरामद नहीं होता और पीड़ित द्वारा यह स्पष्ट बयान नहीं दिया जाता कि उसे आरोपी व्यक्ति द्वारा गलत तरीके से हिरासत में रखा गया था, तब तक अपीलकर्ताओं के खिलाफ धारा 365 आईपीसी के तहत अपराध नहीं बनता है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोषसिद्धि का कोई उचित कारण नहीं था। 1984 की अपील को स्वीकार करते हुए, 21 अगस्त, 1984 के फैसले और आदेश को रद्द कर दिया गया। सभी अपीलकर्ताओं को धारा 365 आईपीसी के अपराध से बरी कर दिया गया। चूँकि अपील के लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता संख्या 1 की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए उसका मामला पहले ही समाप्त हो चुका था। जीवित अपीलकर्ताओं के ज़मानत बांड रद्द कर दिए गए।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: राम नरेन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2435 ऑफ 1984
  • कोरम: जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता
  • अपीलकर्ताओं के वकील: पंकज कुमार शुक्ला, अमित डागा, जितेंद्र कुमार रावत, के.एन. सक्सेना
  • प्रतिवादी के वकील: ए.जी.ए. (AGA)
  • साइटेशन: 2026:AHC:21885

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