केंद्र सरकार ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट को सूचित किया कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code, 2020) के तहत नियमों को फरवरी 2026 के अंत तक अंतिम रूप दे दिया जाएगा। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई को समाप्त कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें एन ए सेबास्टियन और सुनील कुमार ने दायर किया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 को गजट अधिसूचना जारी कर औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 को अधिसूचित किया, लेकिन उसके तहत नियम नहीं बनाए गए और ना ही संहिता के अंतर्गत आवश्यक ट्राइब्यूनल गठित किए गए।
सोलीसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत को बताया कि नियमों को अंतिम रूप देने से पहले जनता से सुझाव मांगे गए हैं और प्रक्रिया प्रगति पर है। उन्होंने यह भी अवगत कराया कि सोमवार को दो अधिसूचनाएं जारी की गई हैं ताकि वर्तमान की व्यावहारिक समस्याओं को हल किया जा सके।
मेहता ने बताया कि इन अधिसूचनाओं के माध्यम से पूर्ववर्ती श्रम कानूनों को 21 नवंबर 2025 से प्रभावी रूप से निरस्त कर दिया गया है, और स्पष्ट किया गया है कि पुराने कानूनों के तहत गठित ट्राइब्यूनल तब तक कार्यरत रहेंगे जब तक कि नए कोड के तहत वैधानिक संस्थाएं स्थापित नहीं हो जातीं।
कोर्ट ने इन स्पष्टीकरणों से संतुष्ट होकर कहा:
“हमारी राय में याचिका में उठाई गई चिंताओं का समाधान हो चुका है और आगे इस पर कार्यवाही जारी रखने की आवश्यकता नहीं है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नियमों के बन जाने के बाद कार्यान्वयन में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो याचिकाकर्ता उस समय नई याचिका दाखिल कर सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नियमों के अभाव में कानूनी शून्यता उत्पन्न हो गई है और पुराने कानूनों के तहत गठित प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली बाधित हो गई है। उन्होंने यह भी कहा कि संहिता के अनुसार सभी लंबित मामलों को ट्राइब्यूनल में स्थानांतरित किया जाना है, लेकिन ऐसे ट्राइब्यूनल अस्तित्व में ही नहीं हैं।
हालांकि, कोर्ट ने इन आशंकाओं को “बेबुनियाद” बताया और कार्यवाही समाप्त कर दी।

