नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings), विशेषकर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में, संवैधानिक अदालतों को आमतौर पर केवल ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) या ‘जांच रिपोर्ट’ के चरण में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कोर्ट का मानना है कि इस स्तर पर याचिका दायर करना जल्दबाजी होगी।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने एक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब तक कार्यवाही पूरी तरह से क्षेत्राधिकार से बाहर (Without Jurisdiction) या स्पष्ट रूप से अवैध (Patently Illegal) न हो, कोर्ट को संयम बरतना चाहिए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला जनवरी 2015 का है, जब याचिकाकर्ता सपन सुमन और उनके एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज की गई थी। नियमों के तहत विभाग ने एक आंतरिक शिकायत समिति (Complaints Committee) का गठन किया। लंबी जांच के बाद, नवंबर 2021 में समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें याचिकाकर्ता पर लगाए गए कदाचार के आरोप सही पाए गए।
इस रिपोर्ट के आधार पर, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने फरवरी 2022 में याचिकाकर्ता को एक ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया और उनका जवाब मांगा। याचिकाकर्ता ने इसी नोटिस, जांच रिपोर्ट और 2015 में समिति के गठन के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की दलीलें और DoPT के नियम
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने 16 जुलाई 2015 को एक ऑफिस मेमोरेंडम (OM) जारी किया था, जिसमें यौन उत्पीड़न की जांच के लिए कुछ विशेष कदम बताए गए थे। उनका कहना था कि जांच में इन नियमों का पालन नहीं किया गया। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि उन्हें औपचारिक ‘आरोप पत्र’ (Article of Charge) जारी नहीं किया गया, बल्कि सीधे शिकायत की कॉपी थमा दी गई, जो नियमों का उल्लंघन है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार (प्रतिवादी) की ओर से तर्क दिया गया कि जिस समय (जनवरी 2015) शिकायत मिली थी और समिति बनी थी, उस समय DoPT का जुलाई 2015 वाला OM अस्तित्व में ही नहीं था। इसलिए, बाद में बने नियम पुरानी जांच पर लागू नहीं हो सकते। सरकार ने यह भी कहा कि अभी केवल नोटिस दिया गया है, कोई सजा नहीं दी गई है, इसलिए यह याचिका समय से पहले दाखिल की गई है।
हाईकोर्ट का निर्णय: प्रक्रियात्मक चूक से जांच रद्द नहीं होगी
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि वर्तमान चरण में रिट याचिका पोषणीय (Maintainable) नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम कुनिसेट्टी सत्यनारायण (2006) के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि केवल कारण बताओ नोटिस जारी होने से किसी व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं होता।
कोर्ट ने DoPT के 2015 के दिशा-निर्देशों को पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospectively) से लागू करने की मांग को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा:
“अगर याचिकाकर्ता के तर्क को स्वीकार किया गया, तो 16 जुलाई 2015 से पहले शुरू हुई यौन उत्पीड़न की हर जांच को रोकना होगा और दोबारा शुरू करना पड़ेगा। इससे अनावश्यक देरी होगी और शिकायतकर्ताओं को न्याय मिलने में बाधा उत्पन्न होगी।”
औपचारिक ‘आरोप पत्र’ न दिए जाने के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि यह महज एक प्रक्रियात्मक अनियमितता है। चूँकि याचिकाकर्ता को शिकायत की कॉपी और सभी दस्तावेज दिए गए थे और उन्होंने जांच में पूरा हिस्सा लिया था, इसलिए उन्हें अपना बचाव करने का पूरा मौका मिला।
निष्कर्ष
कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अनुशासनात्मक प्रक्रिया अभी चल रही है और याचिकाकर्ता से जवाब मांगा गया है, इसलिए इस स्तर पर न्यायिक हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन्होंने मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई राय नहीं दी है, और सक्षम प्राधिकारी स्वतंत्र रूप से अंतिम निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
केस विवरण:
- केस का नाम: श्री सपन सुमन बनाम भारत संघ एवं अन्य
- केस नंबर: W.P.(C) 4181/2022 & CM APPL. 12528/2022, CM APPL. 12530/2022, CM APPL. 21213/2024
- कोरम: न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति अमित महाजन
- याचिकाकर्ता के वकील: सुश्री कनिका अग्निहोत्री, श्री वैभव अग्निहोत्री, श्री अंकित सिंह, श्री विदित प्रताप सिंह, श्री हर्षित किरण, सुश्री सुरुचि खंडेलवाल और सुश्री खुशी आनंद
- प्रतिवादियों के वकील: सुश्री अरुणिमा द्विवेदी (CGSC), सुश्री हिमांशी सिंह, सुश्री मोनालिसा प्रधान; श्री विनोद सावंत (लॉ ऑफिसर – भारत संघ)

