इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों (एनकाउंटर) में आरोपियों के घायल होने की घटनाओं को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि यदि किसी पुलिस एनकाउंटर में आरोपी को गंभीर चोटें आती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा पीयूसीएल (PUCL) मामले में तय की गई गाइडलाइंस का पालन करना अनिवार्य होगा। हाईकोर्ट ने चेतावनी दी है कि इन निर्देशों का पालन न होने पर जिले के पुलिस प्रमुख (SP/SSP/पुलिस कमिश्नर) को सीधे तौर पर जिम्मेदार माना जाएगा और उन पर न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई की जाएगी।
यह महत्वपूर्ण आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने एक आरोपी, राजू उर्फ राजकुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। आरोपी पुलिस मुठभेड़ के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गया था। कोर्ट ने पाया कि पुलिस विभाग द्वारा बार-बार सर्कुलर जारी किए जाने के बावजूद, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का जमीनी स्तर पर ठीक से पालन नहीं किया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मिर्जापुर जिले के थाना कोतवाली देहात का है, जहाँ राजू उर्फ राजकुमार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 305(a), 331(4) और 317(2) के तहत मुकदमा अपराध संख्या 344/2025 दर्ज था। आरोपी ने जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
एफआईआर का अवलोकन करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि यह मामला पुलिस मुठभेड़ से जुड़ा है, जिसमें आरोपी को गंभीर चोटें आई थीं। 28 जनवरी, 2026 को अपने पिछले आदेश में कोर्ट ने राज्य सरकार के वकील से यह जानकारी मांगी थी कि क्या इस मामले में पीयूसीएल गाइडलाइंस का पालन किया गया है—विशेष रूप से, क्या एनकाउंटर को लेकर अलग से एफआईआर दर्ज की गई और क्या घायल का बयान किसी मजिस्ट्रेट या मेडिकल अफसर द्वारा दर्ज किया गया?
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि एनकाउंटर की एफआईआर तो दर्ज की गई थी, लेकिन घायल का बयान न तो किसी मजिस्ट्रेट के सामने हुआ और न ही मेडिकल अफसर के। इसके अलावा, नियमों के विपरीत जांच का जिम्मा एक सब-इंस्पेक्टर को सौंप दिया गया था, जबकि यह किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए था।
गृह सचिव और डीजीपी हुए तलब
नियमों की इस अनदेखी को गंभीरता से लेते हुए, हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तलब किया।
अपर गृह सचिव श्री संजय प्रसाद और डीजीपी श्री राजीव कृष्णा कोर्ट के समक्ष पेश हुए। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस विभाग द्वारा 01.08.2017 और 11.10.2024 को सर्कुलर जारी किए जाने के बाद भी, कई पुलिस अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे हैं। दोनों शीर्ष अधिकारियों ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि नियमों के सख्ती से पालन के लिए नए निर्देश जारी किए जाएंगे और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: “पुलिस सजा नहीं दे सकती”
हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा आरोपियों को “सबक सिखाने” के उद्देश्य से उनके पैरों में गोली मारने के चलन पर कड़ी नाराजगी जताई। न्यायमूर्ति देशवाल ने टिप्पणी की:
“इस न्यायालय ने देखा है कि पुलिस मुठभेड़ों में, विशेष रूप से आरोपियों के पैरों में गोली मारना, एक रूटीन फीचर बन गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने या सजा के तौर पर आरोपी को तथाकथित ‘सबक सिखाने’ के लिए किया जाता है। ऐसा आचरण पूरी तरह से अस्वीकार्य है, क्योंकि सजा देने की शक्ति विशेष रूप से न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में है, पुलिस के पास नहीं।”
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि कानून के शासन द्वारा शासित एक लोकतांत्रिक राज्य में, पुलिस को न्यायिक क्षेत्र में अतिक्रमण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे कृत्य अक्सर उच्च अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने या सार्वजनिक सहानुभूति बटोरने के प्रयास लगते हैं।
हाईकोर्ट द्वारा जारी नई गाइडलाइंस
हाईकोर्ट ने दोहराया कि पीयूसीएल मामले में दिए गए निर्देश संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत देश का कानून हैं। कोर्ट ने पुलिस एनकाउंटर में गंभीर चोट लगने के मामलों के लिए निम्नलिखित गाइडलाइंस जारी कीं:
- अनिवार्य एफआईआर: यदि किसी एनकाउंटर में आरोपी को गंभीर चोट आती है, तो पुलिस टीम के प्रमुख द्वारा तत्काल एफआईआर दर्ज कराई जानी चाहिए।
- स्वतंत्र जांच: मामले की जांच सीबीसीआईडी (CBCID) या किसी दूसरे थाने की पुलिस टीम द्वारा की जानी चाहिए। इस टीम का पर्यवेक्षण (Supervision) एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी करेगा, जो एनकाउंटर में शामिल टीम के प्रमुख से कम से कम एक स्तर ऊपर का हो।
- बयान दर्ज करना: घायल अपराधी/पीड़ित को चिकित्सा सहायता प्रदान की जानी चाहिए और उसका बयान फिटनेस सर्टिफिकेट के साथ किसी मजिस्ट्रेट या मेडिकल अफसर द्वारा दर्ज किया जाना चाहिए।
- तत्काल पुरस्कार पर रोक: घटना के तुरंत बाद पुलिसकर्मियों को कोई आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा। पुरस्कार की सिफारिश तभी की जानी चाहिए जब एक गठित समिति द्वारा वीरता को संदेह से परे स्थापित कर दिया जाए।
- न्यायिक निगरानी: जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट सक्षम न्यायालय को भेजी जानी चाहिए।
- शिकायत तंत्र: यदि घायल के परिवार को लगता है कि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, तो वे संबंधित क्षेत्राधिकार वाले सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) से शिकायत कर सकते हैं, जो शिकायत का निवारण करेंगे।
जिला पुलिस कप्तानों की जवाबदेही तय
जवाबदेही सुनिश्चित करते हुए कोर्ट ने कड़ी चेतावनी जारी की। कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि कोई पुलिस अधिकारी इन दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो: “न केवल पुलिस मुठभेड़ में शामिल टीम का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति, बल्कि जिला पुलिस प्रमुख—चाहे वह एसपी, एसएसपी या पुलिस आयुक्त हों—अनुशासनात्मक कार्यवाही के अलावा न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के लिए भी जिम्मेदार होंगे।”
कोर्ट ने सत्र न्यायाधीशों को भी अधिकार दिया है कि यदि घोर उल्लंघन की सूचना मिलती है, तो वे जिला पुलिस प्रमुखों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने के लिए मामले को हाईकोर्ट भेज सकते हैं।
निर्णय
जमानत याचिका के गुण-दोष पर विचार करते हुए, आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि राजू का नाम मूल एफआईआर में नहीं था और उसे कुछ चांदी के सामान की बरामदगी के आधार पर झूठा फंसाया गया है। यह भी तर्क दिया गया कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की बरामदगी के संबंध में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 105 का पालन नहीं किया गया।
तथ्यों, जेलों में भीड़भाड़ और कपिल वधावन बनाम सीबीआई मामले में शीर्ष अदालत के फैसले को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने आवेदक राजू उर्फ राजकुमार को व्यक्तिगत मुचलका और दो जमानतदार प्रस्तुत करने की शर्त पर जमानत दे दी।
रजिस्ट्रार जनरल को इस आदेश को उत्तर प्रदेश के सभी जिला न्यायाधीशों को परिचालित करने का निर्देश दिया गया है।
केस विवरण:
- केस टाइटल: राजू उर्फ राजकुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन नंबर 45637 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल
- आवेदक के वकील: कुसुम मिश्रा
- राज्य के वकील: जी.ए., अनूप त्रिवेदी (एएजी), पंकज सक्सेना, डी.पी.एस. चौहान (ए.जी.ए.)

