सीजेआई सूर्यकांत ने कहा— “जियोपॉलिटिकल अस्थिरता के दौर में भारत‑फ्रांस साझेदारी कोई विलासिता नहीं, जीवनरेखा है”

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि आज जब वैश्विक सहयोग की रूपरेखा को विघटनकारी ताकतें और भू-राजनीतिक तनाव अस्थिर कर रहे हैं, ऐसे में भारत और फ्रांस के बीच की साझेदारी कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक जीवनरेखा है।

वे इंडो‑फ्रेंच लीगल एंड बिजनेस कॉन्फ्रेंस में “सीमापार विवाद निपटान: न्यायालय, मध्यस्थता और इंडिया-फ्रांस इनोवेशन वर्ष 2026” विषय पर बोल रहे थे।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत‑फ्रांस संबंध केवल कूटनीतिक दायरे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह रक्षा-सुरक्षा सहयोग से लेकर सतत विकास और तकनीकी नवाचार तक एक व्यापक संरचना में विकसित हो चुके हैं।

“यह संबंध सुविधा से उत्पन्न नहीं हुआ है, यह सदियों की साझी विरासत से निर्मित है। आज, जब हम अनिश्चितताओं से भरी दुनिया के सामने खड़े हैं, तो यह साझेदारी विलासिता नहीं, जीवनरेखा है,” उन्होंने कहा।

सीजेआई ने बताया कि पिछले दशक में भारत‑फ्रांस व्यापार दोगुना हो गया है — वर्ष 2009‑10 में 6.4 अरब डॉलर से बढ़कर 2023‑24 में 15.11 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।

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उन्होंने कहा कि दोनों देश लोकतंत्र, विधिशासन और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के प्रति साझा विश्वास रखते हैं, और “एक-दूसरे के पूरक बल” के रूप में काम कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि भारत और फ्रांस को ऐसे संयुक्त मध्यस्थता और सुलह पैनल गठित करने चाहिए, जिनमें सिविल और कॉमन लॉ दोनों परंपराओं में प्रशिक्षित पेशेवर शामिल हों।

“ऐसे पैनल न केवल तकनीकी दक्षता लाएंगे, बल्कि वे कानूनी और सांस्कृतिक समझ के साथ ऐसे विवादों का समाधान कर सकेंगे जो दोनों देशों की कानूनी प्रणालियों और बाजारों को समान रूप से पार करते हैं,” उन्होंने कहा।

उन्होंने यह भी ज़ोर दिया कि भारतीय मध्यस्थता संस्थानों और पेरिस स्थित संस्थानों के बीच संस्थागत साझेदारी, संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम और साझा कार्यवाही व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए ताकि विश्वसनीय और स्थानीय रूप से प्रासंगिक समाधान उपलब्ध हो सकें।

मुख्य न्यायाधीश ने भारत में मध्यस्थता प्रणाली को तीन प्रमुख विधियों — मध्यस्थता अधिनियम, सुलह अधिनियम, और वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम — के रूप में एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र बताया।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार प्रो‑आर्बिट्रेशन रुख अपनाया है और यह दोहराया है कि:

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“मध्यस्थता खंडों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए और तकनीकी आपत्तियों को ऐसी व्यवस्था विफल नहीं करनी चाहिए, जिसे पक्षों ने स्पष्ट रूप से अपनाया हो।”

उन्होंने कहा कि “पार्टी ऑटोनॉमी” यानी पक्षों को प्रक्रिया तय करने की स्वतंत्रता — भारतीय मध्यस्थता प्रणाली की रीढ़ है, और इसे न्यायपालिका ने लगातार संरक्षित किया है।

अपने भाषण के अंतिम हिस्से में सीजेआई ने भारत की गंगा और फ्रांस की सीन नदी की सांस्कृतिक समानताओं को उजागर किया:

“गंगा हिमालय से निकलती है और आस्था, जीवन और संस्कृति से भारतीय उपजाऊ मैदानों को पोषित करती है। वहीं, सीन फ्रांस की आत्मा है, जो पेरिस को रचती-संवारती है। एक आध्यात्मिक यात्रा है, दूसरी काव्यात्मक कला की जीवनरेखा। लेकिन दोनों के मूल में एक साझा उद्देश्य है — दोनों सभ्यताओं की वाहक हैं,” उन्होंने कहा।

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2026 को भारत‑फ्रांस नवाचार वर्ष के रूप में मनाए जाने की पृष्ठभूमि में उन्होंने विश्वास जताया कि दोनों देशों के बीच कानूनी सहयोग और विवाद निपटान की व्यवस्था इस नवाचार युग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

“अब हम केवल घोंसला नहीं बना रहे हैं, बल्कि उस आकाश की दिशा भी तय कर रहे हैं जिसमें हम उड़ान भरेंगे,” उन्होंने कहा।

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