सुप्रीम कोर्ट ने सवुक्कु शंकर की ज़मानत शर्तों में दखल से इनकार किया; कहा– ‘आप अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे हैं’

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यूट्यूबर और पत्रकार शंकर उर्फ़ सवुक्कु शंकर की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट द्वारा ज़मानत के साथ लगाई गई शर्तों में ढील देने की मांग की थी। शंकर के खिलाफ एक फिल्म निर्माता से मारपीट और वसूली के आरोपों को लेकर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की:

“हर हफ्ते ये व्यक्ति हमारे सामने आ रहा है। उसका लैपटॉप ज़ब्त हुआ है, मगर वह मजिस्ट्रेट के सामने रिकवरी की अर्जी नहीं लगाता, सीधे सुप्रीम कोर्ट चला आता है। उसका फोन ज़ब्त हुआ है, फिर भी सीधे यहां आता है।”

पीठ ने कहा कि शंकर को ज़मानत ‘मेरिट’ के आधार पर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य आधार पर दी गई थी। लेकिन ज़मानत पर बाहर आने के बाद उन्होंने फिर से यूट्यूब पर वीडियो और रील्स डालना शुरू कर दिया, जो कि ज़मानत का उद्देश्य नहीं था।

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“आप ज़मानत पर बाहर आकर रील्स बना रहे हैं, वीडियो डाल रहे हैं। यही हाईकोर्ट का निष्कर्ष है कि आप अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे हैं। आपकी ज़मानत रद्द नहीं की गई है, मगर हाईकोर्ट ने शर्त लगाई है कि लंबित मामलों पर कुछ न कहें—फिर भी आप वही कर रहे हैं।”

राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि जांच के लिए शंकर का मोबाइल ज़रूरी था, मगर उन्होंने नहीं सौंपा। उल्टे ज़मानत मिलने के बाद उसी फोन का वीडियो बनाकर अपलोड कर दिया।

लूथरा ने यह भी बताया कि स्वास्थ्य आधार पर ज़मानत मिलने के बावजूद शंकर अस्पताल नहीं गए। इस पर न्यायमूर्ति शर्मा ने टिप्पणी की:

“क्योंकि वह रील्स बनाने में व्यस्त थे।”

शंकर की ओर से वकील बालाजी श्रीनिवासन ने कहा कि उन्हें केवल मेडिकल आधार पर ज़मानत नहीं मिली थी, बल्कि हाईकोर्ट ने यह भी पाया था कि राज्य पुलिस उन्हें टारगेट कर रही है। उन्होंने कहा कि जब शंकर ने बुखार की शिकायत की थी, तो डॉक्टर ने ईसीजी किया और उन्हें हृदय रोग के इतिहास को देखते हुए सरकारी अस्पताल रेफर कर दिया था।

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इस पर न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि अगर वह इतने बीमार थे, तो उन्हें कुछ संयम बरतना चाहिए और पहले स्वस्थ होना चाहिए था, न कि यूट्यूब पर वीडियो अपलोड करने में लग जाना चाहिए।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह ज़मानत की शर्तों में कोई दखल नहीं देगा और याचिका खारिज कर दी।

20 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने शंकर की वह याचिका भी खारिज कर दी थी जिसमें उन्होंने चेन्नई स्थित अपने कार्यालय को अनसील करने और ज़ब्त डिवाइस लौटाने की मांग की थी। उस समय भी कोर्ट ने उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने की सलाह दी थी।

मद्रास हाईकोर्ट ने 30 दिसंबर 2025 को उनके कार्यालय को सील करने के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और कहा था कि वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 105–107 के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष जाएं।

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शंकर ने याचिका में चेन्नई के आदमबक्कम इलाके में स्थित अपने दफ़्तर (नंबर 111, अरंगनाथन इलम, दूसरी मंज़िल, जय कस्तूरी पार्थसारथी नगर, तीसरी गली) को खोलने और बाहर तैनात पुलिस को हटाने का अनुरोध किया था।

शंकर को 13 दिसंबर 2025 को उनके घर से गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किए गए हैं। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उन्होंने एक फिल्म निर्माता से पैसे वसूले थे।

26 दिसंबर 2025 को मद्रास हाईकोर्ट ने उन्हें 17 मामलों में अंतरिम ज़मानत दी थी। कोर्ट ने कहा था कि तमिलनाडु पुलिस द्वारा बार-बार उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कुचलना “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” प्रतीत होता है।

हालांकि, ज़मानत के बाद उनका व्यवहार—खासकर ऑनलाइन गतिविधियों को लेकर—अब भी जांच और न्यायिक निगरानी में बना हुआ है।

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