जनहित याचिका (PIL) का उपयोग चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जा सकता; डिमोलिशन का आदेश केवल ‘घोर अवैधता’ के मामलों में ही उचित है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि पीआईएल का इस्तेमाल “निजी स्कोर सेटल करने” या “चुनिंदा चुनौतियों” (Selective Challenges) के लिए नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि किसी निर्माण को गिराने (डिमोलिशन) जैसा “अत्यधिक कठोर कदम” (Draconian Consequence) केवल “घोर और ठोस अवैधताओं” के मामलों में ही उठाया जाना चाहिए, न कि उन प्रक्रियात्मक खामियों के लिए जिन्हें सुधारा जा सकता है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के 2013 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें शांतिनिकेतन (पश्चिम बंगाल) में मेसर्स आरसुदय प्रोजेक्ट्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर (प्रा) लिमिटेड द्वारा निर्मित एक आवासीय इमारत को गिराने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के खिलाफ हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों को हटा दिया और मूल याचिकाकर्ताओं पर 1,00,000 रुपये का जुर्माना लगाया, क्योंकि उन्होंने यह तथ्य छिपाया था कि उसी इलाके में उनकी अपनी संपत्तियां भी मौजूद थीं।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला बीरभूम जिले के मौजा बल्लभपुर में विश्व-भारती विश्वविद्यालय के पास स्थित 0.39 एकड़ के भूखंड से जुड़ा है। डेवलपर, आरसुदय प्रोजेक्ट्स ने 2009 में यह जमीन खरीदी और मंजूरी प्राप्त करने के बाद एक आवासीय इमारत का निर्माण किया।

हालांकि, 2012 में कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया गया कि यह निर्माण अवैध था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था:

  1. यह भूमि “ख्वाई” (Khoai – लेटेराइट मिट्टी की एक अद्वितीय भौगोलिक संरचना) थी, जिसे सुशांत टैगोर बनाम भारत संघ (2005) मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत संरक्षित किया जाना आवश्यक था।
  2. भवन निर्माण की अनुमति पंचायत समिति के बजाय ग्राम पंचायत द्वारा दी गई थी, जो सक्षम प्राधिकारी नहीं थी।
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हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए निर्माण को अनधिकृत घोषित किया, इसे गिराने का आदेश दिया, डेवलपर को मुआवजे के रूप में 10 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया और श्रीनिकेतन शांतिनिकेतन विकास प्राधिकरण (SSDA) के अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही का आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें

अपीलकर्ता (आरसुदय प्रोजेक्ट्स) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिद्धार्थ भटनागर ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट का फैसला “अटकलों और अनुमानों” (Conjectures and Surmises) पर आधारित था। उन्होंने कहा कि यह भूमि निजी स्वामित्व वाली थी और राजस्व रिकॉर्ड में इसे “ख्वाई” नहीं बल्कि “डांगा” (बंजर भूमि) के रूप में दर्ज किया गया था। यह भी बताया गया कि भवन योजना की जांच जिला परिषद द्वारा की गई थी और उस समय की प्रचलित प्रथा के अनुसार ग्राम पंचायत द्वारा इसे मंजूरी दी गई थी।

प्रतिवादी (मूल याचिकाकर्ता) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जयदीप गुप्ता ने हाईकोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए तर्क दिया कि निर्माण ने “ख्वाई” लैंडस्केप को संरक्षित करने के पर्यावरण जनादेश का उल्लंघन किया है। उन्होंने जोर दिया कि अनुमति शून्य थी क्योंकि यह सक्षम वैधानिक प्राधिकारी (पंचायत समिति) द्वारा जारी नहीं की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए तथ्यों और कानून दोनों के संबंध में हाईकोर्ट के दृष्टिकोण में गंभीर त्रुटियां पाईं।

1. डिमोलिशन और प्रक्रियात्मक खामियां

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर विचार किया कि ग्राम पंचायत द्वारा दी गई अनुमति अवैध थी क्योंकि अधिकार क्षेत्र पंचायत समिति के पास था। पीठ ने कहा कि भले ही अधिकार क्षेत्र की कमी थी, फिर भी यह एक “प्रक्रियात्मक अनियमितता” (Procedural Irregularity) थी, क्योंकि योजना की जांच उच्च निकाय (जिला परिषद) द्वारा की गई थी।

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अदालत ने टिप्पणी की: “इस तरह की प्रक्रियात्मक चूक… निर्माण को अपने आप में अवैध नहीं बना सकती है, और न ही यह डिमोलिशन के निर्देश को सही ठहरा सकती है। डिमोलिशन एक अत्यंत कठोर परिणाम है जो केवल घोर और ठोस अवैधताओं के मामलों के लिए आरक्षित है।”

पीठ ने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 300A के तहत निजी संपत्ति के अधिकारों में हस्तक्षेप एक “स्पष्ट वैधानिक आधार” पर होना चाहिए।

2. “ख्वाई” भूमि और साक्ष्य का अभाव

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को खारिज कर दिया कि भूमि “ख्वाई” थी। कोर्ट ने नोट किया कि “ख्वाई” पश्चिम बंगाल के राजस्व कानूनों में कोई मान्यता प्राप्त श्रेणी नहीं है और संबंधित भूमि को “डांगा” के रूप में दर्ज किया गया था। कोर्ट ने जिलाधिकारी और पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (WBPCB) की रिपोर्टों की जांच की और पाया कि उनमें वैज्ञानिक आधार की कमी थी।

पीठ ने कहा: “प्राकृतिक लहरदार स्थलाकृति (Undulating Topography) के उपयोग के बारे में टिप्पणियों को किसी भी तकनीकी सर्वेक्षण या दस्तावेजी सबूत द्वारा समर्थित नहीं किया गया है जो विषयगत भूखंड की पहचान ‘ख्वाई’ के रूप में करता हो। ऐसे ठोस सबूतों के अभाव में, यह निष्कर्ष निकालने का कोई विश्वसनीय आधार नहीं हो सकता कि विवादित निर्माण ‘ख्वाई’ भूमि पर था।”

3. पीआईएल का दुरुपयोग (चुनिंदा चुनौतियाँ)

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की मंशा (Bona Fides) पर गंभीर सवाल उठाए। साइट प्लान की जांच करने पर, कोर्ट ने पाया कि कई याचिकाकर्ताओं के पास उसी जमीन के हिस्से में, विवादित इमारत के ठीक सामने या बगल में, अपने घर थे।

कोर्ट ने कहा: “रिट कोर्ट के समक्ष इन (याचिकाकर्ताओं के) निर्माणों की वैधता पर सवाल न उठाना, जबकि वे उसी भूखंड के भीतर स्थित हैं, रिट याचिकाकर्ताओं की ईमानदारी पर गंभीर संदेह पैदा करता है… जनहित याचिका को चुनिंदा या लक्षित चुनौतियों (Targeted Challenges) का वाहन बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।”

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निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

  1. सिविल अपील संख्या 2920/2018: स्वीकार की गई। डिमोलिशन का आदेश रद्द कर दिया गया।
  2. सिविल अपील संख्या 2921/2018: स्वीकार की गई। एसएसडीए (SSDA) और उसके अधिकारियों के खिलाफ सभी प्रतिकूल टिप्पणियों और निर्देशों को हटा दिया गया।
  3. जुर्माना: कोर्ट ने मूल रिट याचिकाकर्ताओं (प्रतिवादी संख्या 1-7) पर 1,00,000 रुपये का जुर्माना लगाया, क्योंकि उन्होंने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया था और उनकी याचिका में सद्भावना की कमी थी।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि स्पष्ट वैज्ञानिक सबूतों के अभाव में जनहित याचिका के माध्यम से निर्माण को चुनौती देना सही नहीं था, विशेष रूप से तब जब उसी क्षेत्र में स्थित अन्य समान निर्माणों को चुनौती नहीं दी गई थी।

केस विवरण:

  • केस का नाम: मेसर्स आरसुदय प्रोजेक्ट्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर (प्रा) लिमिटेड बनाम जोगेन चौधरी और अन्य
  • सिविल अपील संख्या: 2018 की 2920 (और संबद्ध मामले)
  • कोरम: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता

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