नियमों में बदलाव होने पर पीजी मेडिकल सीट पर उम्मीदवार का कोई ‘अपरिहार्य अधिकार’ नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शैक्षणिक वर्ष 2025 के लिए पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) मेडिकल पाठ्यक्रमों के पहले और दूसरे चरण की काउंसलिंग रद्द करने के राज्य सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल प्रवेश प्रक्रिया पूरी कर लेने या फीस जमा कर देने से किसी उम्मीदवार को उस सीट पर “निहित या अपरिहार्य अधिकार” (Vested or Indefeasible Right) प्राप्त नहीं हो जाता, खासकर तब जब ऐसी प्रक्रियाएं न्यायिक समीक्षा और वैधानिक सुधारों के अधीन हों।

इस मामले में मुख्य सवाल यह था कि क्या राज्य सरकार एक पूर्ण हो चुकी काउंसलिंग प्रक्रिया और आवंटित प्रवेशों को रद्द कर सकती है ताकि ‘छत्तीसगढ़ मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएट एडमिशन रूल्स, 2025’ के संशोधित नियम 11 को लागू किया जा सके। याचिकाकर्ता ने इसे मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन बताया, जबकि राज्य ने इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन के लिए एक आवश्यक सुधारात्मक कदम करार दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अनुष्का यादव ने नीट (पीजी) 2025 उत्तीर्ण की थी और शुरुआत में उन्हें ऑल इंडिया कोटा के तहत भोपाल में एक सीट आवंटित हुई थी। बाद में, उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य कोटे की काउंसलिंग में भाग लिया और तत्कालीन नियमों के तहत उन्हें श्री शंकराचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस, भिलाई में एम.डी. (रेडियो डायग्नोसिस) की सीट मिली। उन्होंने 9 जनवरी 2026 को प्रवेश प्रक्रिया पूरी की, 10.79 लाख रुपये की फीस और 10 लाख रुपये की बैंक गारंटी जमा की।

हालांकि, 22 जनवरी 2026 को राज्य ने नियम 11 में संशोधन करते हुए काउंसलिंग के पहले दो चरणों को रद्द कर दिया। यह निर्णय डॉ. समृद्धि दुबे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (WPC No. 5937 of 2025) मामले में हाईकोर्ट द्वारा पुराने नियम 11 को भेदभावपूर्ण मानकर रद्द किए जाने के बाद लिया गया था।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के तर्क: याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि प्रवेश की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद एक “निहित अधिकार” उत्पन्न हो चुका था। उनके मुख्य तर्क थे:

  • नियमों में संशोधन केवल भविष्य के लिए (Prospective) प्रभावी होना चाहिए।
  • याचिकाकर्ता ने राज्य कोटे में सीट मिलने पर अपनी ऑल इंडिया कोटा की सीट छोड़ दी थी, जिससे उनकी सुरक्षा निधि जब्त हो गई और उन्हें गंभीर शैक्षणिक और वित्तीय नुकसान हुआ।
  • अदालत के स्पष्ट निर्देश के बिना राज्य पिछली प्रक्रिया को रद्द नहीं कर सकता था।
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राज्य सरकार के तर्क: अतिरिक्त महाधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि:

  • राज्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा डॉ. तन्वी बहल बनाम श्रेय गोयल और अन्य (2025) मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों को लागू करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य था।
  • जब प्रवेश प्रक्रिया कानूनी विवादों के अधीन हो, तो प्रोविजनल अलॉटमेंट के आधार पर कोई अटूट अधिकार नहीं बनता।
  • काउंसलिंग रद्द करना पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए एक “नेक नियत” (Bona fide exercise) से उठाया गया कदम था।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

कोर्ट ने नियम 11 के विकासक्रम पर गौर किया। मूल नियम में छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों से एमबीबीएस करने वालों को प्राथमिकता दी गई थी, जिसे समृद्धि दुबे मामले में अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. तन्वी बहल मामले के फैसले को उद्धृत किया:

“पीजी मेडिकल कोर्स में विशेषज्ञ डॉक्टरों के महत्व को देखते हुए, ‘निवास’ के आधार पर उच्च स्तर पर आरक्षण देना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा… पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में निवास-आधारित आरक्षण की अनुमति नहीं है।”

खंडपीठ ने नोट किया कि राज्य ने नियम 11 में संशोधन कर 50% “संस्थागत आरक्षण” (Institutional Reservation) और 50% “ओपन श्रेणी” की व्यवस्था की है ताकि योग्यता (Merit) बनी रहे। “निहित अधिकार” के दावे पर कोर्ट ने कहा:

“यह कानूनन स्थापित है कि केवल प्रोविजनल अलॉटमेंट या प्रवेश के आधार पर कोई निहित या अपरिहार्य अधिकार प्राप्त नहीं होता है, विशेष रूप से जब ऐसे प्रवेश न्यायिक जांच और सुधार के अधीन हों।”

अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने याचिका में कोई सार नहीं पाया और इसे खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि राज्य के आदेश सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और इस कोर्ट के स्पष्टीकरणों के “निष्ठापूर्ण अनुपालन” में जारी किए गए थे।

भविष्य की मुकदमेबाजी को रोकने के लिए, कोर्ट ने “इन रेम” (In Rem) निर्देश जारी किया:

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“यह निर्देशित किया जाता है कि यह आदेश ‘इन रेम’ प्रभावी होगा और सभी समान रूप से स्थित उम्मीदवारों पर समान रूप से लागू होगा। यहाँ तय किए गए मुद्दे निर्णायक रूप से सुलझ गए हैं, और इस कोर्ट द्वारा समान आधारों पर किसी भी अलग या क्रमिक याचिका पर विचार नहीं किया जाएगा।”

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