इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि पुलिस द्वारा प्रस्तुत फाइनल रिपोर्ट (अंतिम रिपोर्ट) को मजिस्ट्रेट द्वारा प्रोटेस्ट याचिका (विरोध याचिका) पर विचार करने और उसे खारिज करने के बाद स्वीकार कर लिया गया है, तो उन्हीं तथ्यों पर दूसरी आपराधिक शिकायत (Complaint Case) पोषणीय नहीं है।
जस्टिस बृज राज सिंह की पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए 10 जनवरी, 2020 के समन आदेश और उसके बाद की पूरी शिकायत कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 28 मई, 2015 की एक हिंसक घटना से जुड़ा है, जिसमें आवेदक विशाल कुमार सरोज के भाइयों और पिता की हत्या कर दी गई थी। आवेदक ने इस संबंध में एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके बाद, प्रतिवादी संख्या 2 ने बदले की कार्रवाई के रूप में धारा 156(3) Cr.P.C. के तहत आवेदन दिया, जिसके परिणामस्वरूप आवेदक और अन्य के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 148, 323, 308 और 326 सहित विभिन्न धाराओं के तहत क्रॉस-एफआईआर (केस क्राइम नंबर 344/2015) दर्ज की गई।
विवेचना के बाद, पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) प्रस्तुत की। प्रतिवादी संख्या 2 ने इस रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट याचिका दायर की। आपत्तियों पर विचार करने के बाद, मजिस्ट्रेट ने 8 अप्रैल, 2017 को आदेश पारित करते हुए पुलिस द्वारा प्रस्तुत फाइनल रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया।
इस आदेश से असंतुष्ट होकर, प्रतिवादी संख्या 2 ने आपराधिक निगरानी (Criminal Revision No. 111 of 2017) दायर की, जिसे अपर सत्र न्यायाधीश/एफ.टी.सी.-प्रथम, प्रतापगढ़ ने 1 अगस्त, 2023 को खारिज कर दिया।
हालांकि, इस दौरान 17 नवंबर, 2017 को प्रतिवादी संख्या 2 ने उसी घटना के संबंध में एक अलग आपराधिक परिवाद (Complaint No. 188 of 2017) दायर किया। मजिस्ट्रेट ने Cr.P.C. की धारा 200 और 202 के तहत बयान दर्ज करने के बाद, 10 जनवरी, 2020 को आवेदक को समन जारी किया। इसी समन आदेश और शिकायत कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
पक्षकारों की दलीलें
आवेदक के अधिवक्ता श्री सिद्धार्थ सिन्हा और श्री लालजी यादव ने तर्क दिया कि दूसरी शिकायत पोषणीय नहीं है। उनका कहना था कि चूंकि सक्षम न्यायालय ने प्रोटेस्ट याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार करने के बाद 8 अप्रैल, 2017 को फाइनल रिपोर्ट स्वीकार कर ली थी, इसलिए शिकायतकर्ता उन्हीं तथ्यों पर दूसरी शिकायत दर्ज नहीं कर सकता।
आवेदक पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सुब्रत चौधरी @ संतोष चौधरी व अन्य बनाम असम राज्य व अन्य (2024 INSC 834) पर भारी भरोसा जताया। उन्होंने तर्क दिया कि “एक बार जब लिखित आपत्ति/प्रोटेस्ट याचिका को खारिज करने के बाद मूल शिकायत पर नकारात्मक रिपोर्ट/फाइनल रिपोर्ट स्वीकार कर ली जाती है, तो उन्हीं तथ्यों पर Cr.P.C. की धारा 2(D) के तहत शिकायत, दूसरी शिकायत के रूप में पोषणीय नहीं है।”
इसके विपरीत, प्रतिवादी संख्या 2 के अधिवक्ता श्री सुशील कुमार सिंह का तर्क था कि फाइनल रिपोर्ट की स्वीकृति और प्रोटेस्ट याचिका की अस्वीकृति रेसि जुडिकाटा (Res Judicata) का रूप नहीं लेती। उन्होंने कहा कि फाइनल रिपोर्ट स्वीकार करने वाला मजिस्ट्रेट का आदेश प्रशासनिक प्रकृति का था और पुलिस विवेचना सामग्री पर आधारित था, जबकि परिवाद (complaint) का मामला न्यायालय के समक्ष दर्ज साक्ष्य पर आधारित होता है।
प्रतिवादी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों महेश चंद बनाम बी. जनार्दन रेड्डी और विष्णु कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कहा कि यदि पिछला आदेश अपूर्ण रिकॉर्ड पर पारित किया गया था या स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण था, तो दूसरी शिकायत दर्ज करने पर कोई वैधानिक रोक नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले के तथ्य सुप्रीम कोर्ट के सुब्रत चौधरी @ संतोष चौधरी के निर्णय के तथ्यों के समान हैं।
जस्टिस बृज राज सिंह ने सुब्रत चौधरी के फैसले का विस्तृत उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि यदि पहली शिकायत (या प्रोटेस्ट याचिका) का निस्तारण गुण-दोष (Merits) के आधार पर और विधि सम्मत तरीके से किया गया है, तो उन्हीं आरोपों पर दूसरी शिकायत स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट ने अपने आदेश में नोट किया:
“सुब्रत चौधरी @ संतोष चौधरी (सुप्रा) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पैरा-21 में यह माना है कि प्रोटेस्ट याचिका पर विचार करने और शिकायतकर्ता को सुनने के बाद पहली शिकायत खारिज होने के मद्देनजर, दूसरे प्रतिवादी द्वारा दायर दूसरी शिकायत पोषणीय नहीं थी।”
प्रतिवादी द्वारा महेश चंद और समता नायडू के मामलों पर दिए गए तर्क के संबंध में, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुब्रत चौधरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्णयों पर विचार किया था। कोर्ट ने कहा कि सुब्रत चौधरी में यह पाया गया था कि जहां विवेचना को उचित मानते हुए प्रोटेस्ट याचिका खारिज कर दी जाती है और फाइनल रिपोर्ट स्वीकार कर ली जाती है, वहां उन्हीं आरोपों को दोहराते हुए बाद की शिकायत पोषणीय नहीं है।
हाईकोर्ट ने निर्णय दिया:
“यह महत्वपूर्ण तथ्य भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि वर्तमान मामले का तथ्यात्मक पहलू सुब्रत चौधरी @ संतोष चौधरी (सुप्रा) के मामले के समान है। इसलिए, यह न्यायालय अलग राय नहीं ले सकता और सुब्रत चौधरी @ संतोष चौधरी (सुप्रा) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून बाध्यकारी है।”
निष्कर्ष
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि मजिस्ट्रेट ने प्रोटेस्ट याचिका पर विचार करने के बाद 8 अप्रैल, 2017 को फाइनल रिपोर्ट स्वीकार कर ली थी, और उक्त आदेश के खिलाफ निगरानी याचिका भी खारिज हो चुकी थी, इसलिए 17 नवंबर, 2017 को उन्हीं तथ्यों पर दायर की गई बाद की शिकायत पोषणीय नहीं थी।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने धारा 482 के तहत आवेदन को स्वीकार करते हुए 10 जनवरी, 2020 के समन आदेश और परिवाद संख्या 188/2017 की पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया:
“यदि प्रतिवादी संख्या 2 व्यथित है, तो वह 01.08.2023 के पुनरीक्षण (Revisional) आदेश के खिलाफ कानून का सहारा ले सकता है।”
केस विवरण:
- केस शीर्षक: विशाल कुमार सरोज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
- केस संख्या: आवेदन यू/एस 482 संख्या 3721 वर्ष 2021
- पीठ: न्यायमूर्ति बृज राज सिंह
- आवेदक के अधिवक्ता: श्री सिद्धार्थ सिन्हा, श्री लालजी यादव, श्री अरुण सिन्हा
- विपक्षी के अधिवक्ता: श्री राव नरेंद्र सिंह (ए.जी.ए.), श्री सुशील कुमार सिंह, श्री आशीष कुमार मौर्य

