‘आशंकित’ औद्योगिक विवादों के संदर्भ के लिए औपचारिक डिमांड नोटिस अनिवार्य शर्त नहीं; ‘फर्जी’ अनुबंध के आरोपों का फैसला ट्रिब्यूनल करे: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (ID Act) के तहत किसी औद्योगिक विवाद के अस्तित्व के लिए कर्मचारी द्वारा नियोक्ता को औपचारिक लिखित मांग (Formal Written Demand) देना कोई अनिवार्य शर्त (sine qua non) नहीं है, विशेष रूप से तब जब उपयुक्त सरकार की राय में कोई विवाद “आशंकित” (apprehended) हो।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने 27 जनवरी, 2026 को मेसर्स प्रीमियम ट्रांसमिशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2026 INSC 87) के मामले में यह फैसला सुनाया। न्यायालय ने अनुबंध श्रमिकों (Contract Labourers) के नियमितीकरण से संबंधित विवाद के संदर्भ (Reference) को चुनौती देने वाली प्रबंधन की याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, एक अन्य जुड़े हुए मामले (मेसर्स प्रीमियम ट्रांसमिशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम किशन सुभाष राठौड़ और अन्य) में, कोर्ट ने श्रमिकों को दी गई अंतरिम राहत को रद्द कर दिया और कहा कि आईडी अधिनियम की धारा 33(1) तभी लागू होती है जब नियोक्ता-कर्मचारी संबंध स्थापित हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट इस सवाल पर विचार कर रहा था कि क्या डिप्टी लेबर कमिश्नर द्वारा जारी किया गया संदर्भ आदेश (Reference Order) वैध था, जबकि यूनियन ने प्रबंधन को डिमांड नोटिस (Charter of Demands) सौंपे बिना सीधे सुलह अधिकारी (Conciliation Officer) से संपर्क किया था। कोर्ट ने कहा कि आईडी अधिनियम की धारा 10(1) के तहत, यदि सरकार को लगता है कि कोई विवाद “मौजूद है या आशंकित है”, तो वह उसे संदर्भित कर सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, मेसर्स प्रीमियम ट्रांसमिशन प्राइवेट लिमिटेड, ट्रांसमिशन इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्माण में लगी हुई है। कंपनी ने श्रमिकों को उपलब्ध कराने के लिए लेबर ठेकेदारों (मेसर्स ओम साई मैनपावर सर्विसेज लिमिटेड और मेसर्स औरंगाबाद मल्टी सर्विसेज) की सेवाओं का उपयोग किया था।

11 जून, 2019 को औरंगाबाद मजदूर यूनियन ने सीधे सुलह अधिकारी के समक्ष आईडी अधिनियम की धारा 12 के तहत एक अभ्यावेदन (Representation) दायर किया। यूनियन ने आरोप लगाया कि लेबर अनुबंध “दिखावटी, फर्जी और छद्म” (Sham, Bogus and Camouflaged) थे, ताकि श्रमिकों को समान वेतन और लाभ से वंचित किया जा सके। उन्होंने मांग की कि श्रमिकों को अपीलकर्ता कंपनी के मस्टर रोल पर लिया जाए और उन्हें स्थायी दर्जा दिया जाए।

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सुलह अधिकारी ने विवाद को स्वीकार किया और सुलह कार्यवाही विफल होने के बाद, 22 जनवरी, 2020 को एक विफलता रिपोर्ट (Failure Report) प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के आधार पर, डिप्टी लेबर कमिश्नर ने 28 जनवरी, 2020 को विवाद को औद्योगिक न्यायालय, औरंगाबाद के पास भेज दिया।

प्रबंधन ने बॉम्बे हाईकोर्ट में इस संदर्भ आदेश को चुनौती दी (रिट याचिका संख्या 7158/2020), यह तर्क देते हुए कि कोई “औद्योगिक विवाद” मौजूद नहीं था क्योंकि सुलह अधिकारी के पास जाने से पहले उन्हें कोई डिमांड नोटिस नहीं दिया गया था। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

पक्षों की दलीलें

प्रबंधन (Management) का तर्क: प्रबंधन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने तर्क दिया कि वैधानिक निवारण तंत्र के लिए यह आवश्यक है कि यूनियन पहले प्रबंधन को डिमांड नोटिस सौंपे। उन्होंने तर्क दिया कि औद्योगिक विवाद तभी अस्तित्व में आता है जब ऐसी मांगों को अस्वीकार कर दिया जाता है। चूंकि यूनियन ने सीधे सुलह अधिकारी से संपर्क किया, इसलिए कार्यवाही “अवैध” थी। प्रबंधन ने सिंधु रीसेटलमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल (1968) और प्रभाकर बनाम संयुक्त निदेशक, रेशम उत्पादन विभाग (2015) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया।

यूनियन का तर्क: यूनियन का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता संदीप सुधाकर देशमुख ने तर्क दिया कि सीधे डिमांड नोटिस देने से अक्सर सेवा तत्काल समाप्त कर दी जाती है। उन्होंने कहा कि सुलह अधिकारी के पास आईडी अधिनियम की धारा 12(1) के तहत हस्तक्षेप करने की शक्ति है, भले ही विवाद “आशंकित” हो। यूनियन ने शंभू नाथ गोयल बनाम बैंक ऑफ बड़ौदा (1978) पर भरोसा जताते हुए कहा कि लिखित मांग एक अनिवार्य पूर्व शर्त नहीं है।

न्यायालय का विश्लेषण

डिमांड नोटिस की आवश्यकता पर: सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान मामले को सिंधु रीसेटलमेंट और प्रभाकर के मामलों से अलग बताया। पीठ ने नोट किया कि सिंधु रीसेटलमेंट मामले में “आशंकित” (apprehended) विवादों को संदर्भित करने की सरकार की शक्ति की जांच नहीं की गई थी। कोर्ट ने कहा कि आईडी अधिनियम की धारा 10(1) उपयुक्त सरकार को विवाद को संदर्भित करने का अधिकार देती है यदि उसकी राय में कोई औद्योगिक विवाद “मौजूद है या आशंकित है।”

शंभू नाथ गोयल मामले का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने दोहराया:

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“नियोक्ता को कर्मचारी द्वारा औपचारिक लिखित मांग आईडी अधिनियम की धारा 2(k) के तहत औद्योगिक विवाद के अस्तित्व के लिए अनिवार्य शर्त (sine qua non) नहीं है… औद्योगिक विवाद तब अस्तित्व में होता है जब पक्षों के बीच कोई वास्तविक और ठोस मतभेद हो।”

न्यायालय ने कहा कि प्रबंधन की व्याख्या धारा 10(1) में “आशंकित” शब्द को निरर्थक बना देगी। पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस भट्टी ने कहा:

“‘आशंकित’ विवाद को संदर्भित करने की शक्ति पुरानी कहावत ‘समय पर किया गया एक उपाय भविष्य की बड़ी परेशानियों को बचाता है’ (a stitch in time saves nine) का वैधानिक अनुप्रयोग है। यह औद्योगिक शांति भंग होने से पहले राज्य को हस्तक्षेप करने में सक्षम बनाता है।”

फर्जी अनुबंध (Sham Contracts) और अधिकार क्षेत्र: स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) बनाम नेशनल यूनियन वॉटरफ्रंट वर्कर्स (2001) के संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि क्या अनुबंध दिखावटी है या वास्तविक, यह तथ्य का एक विवादित प्रश्न है जिसका निर्णय औद्योगिक न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए। चूंकि प्रबंधन ने नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों से इनकार किया था, इसलिए यूनियन एमआरटीयू और पीयूएलपी अधिनियम (MRTU & PULP Act) के तहत उपाय नहीं मांग सकती थी, बल्कि उसे आईडी अधिनियम के तहत औद्योगिक न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

“प्रबंधन, प्रारंभिक आपत्ति उठाकर, पंजीकृत ठेकेदार के माध्यम से काम करने वाले श्रमिकों को कानूनी उपाय से वंचित नहीं कर सकता… कानून के शासन को बनाए रखने के लिए, शिकायतों को बिना न्यायनिर्णयन के खारिज नहीं किया जा सकता।”

निर्णय

1. संदर्भ की वैधता पर (अपील @ SLP (C) No. 9970 of 2023): सुप्रीम कोर्ट ने प्रबंधन की अपील को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के फैसले तथा संदर्भ आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने औद्योगिक न्यायालय को निम्नलिखित मुद्दों को तय करने का निर्देश दिया:

  1. क्या वे अनुबंध जिनके माध्यम से रोजगार प्रदान किया गया है, दिखावटी और नाममात्र (sham and nominal) हैं।
  2. क्या प्रतिवादी-यूनियन के सदस्य वास्तव में प्रबंधन के कर्मचारी हैं (क्या प्रबंधन प्रमुख नियोक्ता है)।
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औद्योगिक न्यायालय को निर्देश दिया गया कि वह संदर्भ का निपटारा प्राथमिकता के आधार पर चार महीने के भीतर करे।

2. अंतरिम राहत पर (अपील @ SLP (C) No. 12192 of 2023): जुड़ी हुई अपील में, कोर्ट ने औद्योगिक न्यायाधिकरण और हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें श्रमिकों को अंतरिम राहत दी गई थी। निचली अदालतों ने प्रबंधन को निर्देश दिया था कि वह शिकायत के लंबित रहने के दौरान श्रमिकों को काम दे या वेतन का भुगतान करे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन एंड एबोलिशन) एक्ट (CLRA) के तहत “कर्मचारी” की परिभाषा आईडी एक्ट से अलग है। दी गई अंतरिम राहत मुख्य विवाद का “आभासी पूर्व-निर्णय” (virtual pre-judgment) थी।

“आईडी अधिनियम की धारा 33(1) की प्रयोज्यता तभी उत्पन्न होती है जब कर्मचारी की स्थिति स्थापित हो जाती है… इस चरण पर, अंतरिम प्रार्थना पक्षों के बीच मुख्य विवाद के पूर्व-निर्णय के समान है।”

कोर्ट ने इस अपील को स्वीकार करते हुए अंतरिम आदेशों को रद्द कर दिया और श्रमिकों को औद्योगिक न्यायालय के समक्ष SAIL निर्णय के सिद्धांतों के अनुसार अंतरिम उपायों के लिए प्रार्थना करने की स्वतंत्रता दी।

केस विवरण

  • केस टाइटल: मेसर्स प्रीमियम ट्रांसमिशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (और संबंधित अपील)
  • केस नंबर: सिविल अपील (SLP (Civil) No. 9970 of 2023 और SLP (Civil) No. 12192 of 2023 से उत्पन्न)
  • कोरम: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी

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