इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान परीक्षा बोर्ड (National Board of Examinations in Medical Sciences – NBEMS) के उस निर्णय को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी, जिसमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उम्मीदवारों के लिए नीट-पीजी 2025 में काउंसलिंग की पात्रता के लिए कट-ऑफ को घटाकर माइनस 40 अंक तक कर दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने अधिवक्ता अभिनव गौर द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह मामला नीतिगत क्षेत्र में आता है और पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट इस मुद्दे पर ऐसी ही एक याचिका खारिज कर चुकी है। कोर्ट को यह भी बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट में इसी विषय पर एक और याचिका लंबित है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि एनबीईएमएस का यह कदम संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन है, जो सार्वजनिक नियुक्तियों में समान अवसर की गारंटी देता है। याचिका में कहा गया कि नीट-पीजी 2025 में दूसरी राउंड की काउंसलिंग के बाद जब 18,000 से अधिक सीटें खाली रह गईं, तब बोर्ड ने अर्हता अंकों को ‘अत्यधिक रूप से’ घटा दिया।
याचिका में बताया गया कि सामान्य (EWS) श्रेणी में कट-ऑफ को 276 से घटाकर 103, सामान्य-पीडब्ल्यूबीडी (PwBD) श्रेणी में 255 से घटाकर 90 कर दिया गया, जबकि एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग में इसे सीधे 235 से घटाकर -40 कर दिया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि यह कटौती गुणवत्ता से समझौता है और इससे चिकित्सा शिक्षा की गरिमा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और रोगियों की सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। यह संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन भी है, क्योंकि ऐसे डॉक्टरों को प्रवेश मिल सकता है जो न्यूनतम योग्यता स्तर को भी पूरा नहीं करते।
हालांकि, कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि यह न्यायिक दखल का मामला नहीं है और नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप उचित नहीं। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय में पहले से ही सुनवाई लंबित है।
अब इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका के आधार पर होगा।

