प्रेम-संबंध में सहमति से साथ रहने वाली युवती को नाबालिग बताकर दर्ज हुआ मामला; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा को रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक युवक की उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए कहा है कि युवती बालिग थी और वह आरोपी के साथ सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जब ऐसे रिश्ते टूटते हैं, तो अक्सर महिलाओं की ओर से बलात्कार की एफआईआर दर्ज कर दी जाती है, जबकि कानूनों की मौजूदा संरचना पुरुषों के लिए प्रतिकूल साबित हो रही है और यह उस दौर में बनाई गई थी जब लिव-इन जैसे रिश्ते की कल्पना भी नहीं की गई थी।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने आरोपी चंद्रेश की अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। निचली अदालत ने चंद्रेश को आईपीसी की विभिन्न धाराओं, पॉक्सो एक्ट और एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा दी थी।

हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन की कहानी और साक्ष्यों की पर्याप्त जांच नहीं की, विशेष रूप से ऑसिफिकेशन टेस्ट रिपोर्ट को नजरअंदाज किया गया, जिसमें पीड़िता की उम्र लगभग 20 वर्ष बताई गई थी।

पीठ ने कहा कि युवाओं में लिव-इन रिलेशनशिप की बढ़ती प्रवृत्ति पश्चिमी विचारों से प्रभावित है और जब ऐसे रिश्ते खत्म होते हैं, तब झूठे मुकदमे दर्ज होने की संभावना अधिक रहती है।


अभियोजन के अनुसार, चंद्रेश पर आरोप था कि वह एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर शादी का झांसा देकर बेंगलुरु ले गया और वहां उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। निचली अदालत ने उसे IPC की धारा 363 (अपहरण), 366 (शादी के लिए अपहरण), 323 (चोट पहुंचाना), 376 (बलात्कार), पोक्सो एक्ट की धारा 6 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत दोषी ठहराया था।

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लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि युवती आरोपी के साथ अपनी मर्जी से सार्वजनिक परिवहन से गोरखपुर और फिर बेंगलुरु तक गई। वह छह महीने तक बेंगलुरु के एक सामान्य मोहल्ले में आरोपी के साथ रही और कभी कोई शिकायत नहीं की।

अदालत ने कहा, “पीड़िता ने किसी भी पड़ोसी या सार्वजनिक स्थान पर मदद की गुहार नहीं लगाई। यह स्पष्ट है कि वह अपनी इच्छा से गई थी और आरोपी के साथ सहमति से संबंध बनाए थे।”

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FIR में पीड़िता की उम्र 18.5 वर्ष बताई गई थी, लेकिन बाद में उसकी मां ने अदालत में दावा किया कि उसकी उम्र 17 साल थी। कोर्ट ने इसे “कानूनी सलाह के आधार पर किया गया बदलाव” माना और कहा कि यह बदलाव आरोपी को दोषी साबित करने के प्रयास का हिस्सा हो सकता है।

कोर्ट ने बलात्कार और पॉक्सो एक्ट के तहत सजा को गलत ठहराते हुए कहा कि जब पीड़िता बालिग थी और सहमति से संबंध में थी, तो ये धाराएं लागू ही नहीं होतीं। एससी/एसटी एक्ट के आरोप भी बिना पर्याप्त सबूत के लगाए गए थे।

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8 जनवरी के फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों की उपेक्षा करते हुए गलत निर्णय दिया। चंद्रेश की उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए अदालत ने अपील स्वीकार कर ली और उसे दोषमुक्त कर दिया।

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