इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के विशेष न्यायाधीश (गैंगस्टर एक्ट) द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी (उन्मोचन प्रार्थना पत्र) खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सक्षम अधिकारियों द्वारा गैंग चार्ट का अनुमोदन यांत्रिक (mechanical) तरीके से किया गया था, जो वैधानिक नियमों का उल्लंघन है। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने पहले से छपे (pre-printed) प्रारूप पर केवल हस्ताक्षर कर दिए थे, जो स्वतंत्र मष्तिष्क के प्रयोग का अभाव दर्शाता है।
यह मामला याची बृजेश सिंह की डिस्चार्ज अर्जी 9 सितंबर 2025 को खारिज किए जाने से संबंधित था। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि ‘उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) नियमावली, 2021’ के नियम 17(2) के तहत पहले से छपे रबर सील वाले गैंग चार्ट पर हस्ताक्षर करना प्रतिबंधित है। हाईकोर्ट ने मामले को पुनः विचार के लिए निचली अदालत को वापस भेज दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वाराणसी जिले के थाना लोहता में दर्ज मुराद संख्या 34/2022 से संबंधित है, जिसमें उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट की धारा 3(1) के तहत कार्रवाई की गई थी। यह मामला सत्र परीक्षण संख्या 176/2023 (राज्य बनाम अखिलेश सिंह और अन्य) के रूप में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, गैंगस्टर एक्ट, कोर्ट नंबर 13, वाराणसी के समक्ष लंबित था।
याची बृजेश सिंह ने निचली अदालत के समक्ष डिस्चार्ज अर्जी दाखिल की थी, जिसे 9 सितंबर 2025 को खारिज कर दिया गया। इस आदेश से क्षुब्ध होकर याची ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों की दलीलें
याची के अधिवक्ताओं—अभिषेक कुमार पांडेय, बीरेंद्र सिंह और यश प्रताप सिंह—ने तर्क दिया कि आक्षेपित आदेश कानूनन गलत है और निचली अदालत ने उनके तर्कों पर उचित विचार नहीं किया।
मुख्य तर्क यह था कि चार्जशीट संबंधित पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा अग्रेषित (forward) नहीं की गई थी, जो कि 2021 की नियमावली के नियम 26(2) का उल्लंघन है। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि गैंग चार्ट ‘फॉर्म नंबर 1’ के अनुसार तैयार नहीं किया गया था, क्योंकि इसमें आपराधिक इतिहास का विवरण और आरोपी का डोजियर संलग्न नहीं था।
याची के वकीलों ने जोर देकर कहा कि “सक्षम अधिकारियों ने गैंग चार्ट को अग्रेषित करते समय अपने स्वतंत्र मष्तिष्क का प्रयोग नहीं किया और एक पहले से छपे (pre-printed) गैंग चार्ट पर हस्ताक्षर कर दिए।” यह भी बताया गया कि याची के खिलाफ केवल दो मामले दिखाए गए थे: एक मामले (केस क्राइम नंबर 278/2020) में उसे जांच अधिकारी द्वारा दोषमुक्त कर दिया गया था, और दूसरे (केस क्राइम नंबर 181/2021) में उसे केवल धारा 120B IPC की मदद से इस आरोप पर फंसाया गया था कि उसने नामजद आरोपियों को अपनी मोटरसाइकिल दी थी।
राज्य की ओर से उपस्थित सरकारी वकील (A.G.A.) ने इन तर्कों का विरोध किया और कहा कि निचली अदालत के आदेश में कोई अवैधता नहीं है।
कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने पत्रावली का अवलोकन किया और गैंगस्टर एक्ट के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के सख्त पालन की आवश्यकता पर जोर दिया।
कोर्ट ने आसिम @ हासिम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) के मामले का हवाला दिया, जिसमें यह निर्धारित किया गया था कि यदि एफआईआर में धारा 2(b) के तहत संबंधित असामाजिक गतिविधियों का उल्लेख नहीं है, तो धारा 3(1) के तहत कार्रवाई अवैध है।
कोर्ट ने विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के विनोद बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (क्रिमिनल अपील संख्या 777-778/2025, निर्णय दिनांक 23 मई 2025) के फैसले पर भरोसा जताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुमोदन प्राधिकारी की संतुष्टि अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को उद्धृत करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“यह उल्लेख करना उतना ही आवश्यक है कि संतुष्टि सिफारिश करने वाले प्राधिकारी द्वारा सूचित किए गए तथ्यों की ‘साइक्लोस्टाइल प्रतिलिपि’ नहीं होनी चाहिए… रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, विशेष रूप से गैंग चार्ट के अवलोकन से, यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि उक्त गैंग चार्ट को सक्षम प्राधिकारी द्वारा केवल पहले से छपे गैंग-चार्ट पर अपने हस्ताक्षर चिपकाकर अनुमोदित किया गया था, जो पूर्णतः विचार-शून्य (non-application of mind) है और 2021 के नियमों के नियम 16 और 17 का उल्लंघन है।”
इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए, न्यायमूर्ति सिंह ने रिकॉर्ड के पेज 34 पर संलग्न गैंग चार्ट की जांच की। कोर्ट ने पाया:
“गैंग चार्ट के अवलोकन से स्पष्ट है कि अधिकारियों ने अपने स्वतंत्र मष्तिष्क का प्रयोग नहीं किया और उन्होंने पहले से छपे प्रारूप (pre-printed format) पर हस्ताक्षर किए। नियमावली, 2021 के नियम 17(2) के अनुसार, पहले से छपे रबर सील गैंग चार्ट पर हस्ताक्षर निषिद्ध हैं। तदनुसार, सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वतंत्र मष्तिष्क का उचित उपयोग करने के बाद ही गैंग चार्ट पर अनुमोदन दर्ज किया जाना चाहिए।”
निर्णय वैधानिक नियमों के उल्लंघन को देखते हुए, हाईकोर्ट ने आवेदन स्वीकार कर लिया।
- विशेष न्यायाधीश, गैंगस्टर एक्ट, वाराणसी द्वारा पारित 9 सितंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया गया।
- निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि वह इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर, याची को सुनवाई का अवसर देने के बाद, डिस्चार्ज अर्जी पर कानून के अनुसार नया आदेश पारित करे।
केस का विवरण:
- केस टाइटल: बृजेश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: आवेदन धारा 528 BNSS संख्या 48794 वर्ष 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह
- याची के अधिवक्ता: अभिषेक कुमार पांडेय, बीरेंद्र सिंह, यश प्रताप सिंह
- प्रतिवादी के अधिवक्ता: जी.ए. (शासकीय अधिवक्ता)

