दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी उम्मीदवार को नैतिक अधमता (Moral Turpitude) से जुड़े अपराध में दोषी ठहराया गया है, लेकिन उसे ‘अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958’ (Probation of Offenders Act) के तहत परिवीक्षा (Probation) पर रिहा कर दिया गया है, तो उसे भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के नियमों के तहत नियुक्ति के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) और केंद्र सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने एकल पीठ (Single Judge) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें प्रतिवादी ‘राजेश’ को जूनियर एग्जीक्यूटिव (कॉमन कैडर) के पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुआ था। प्रतिवादी राजेश के खिलाफ 2012 में उसकी पत्नी की शिकायत पर आईपीसी की धारा 498A, 406 और 506 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। 4 सितंबर 2014 को निचली अदालत ने उन्हें धारा 498A और 406 के तहत दोषी ठहराया और एक साल के साधारण कारावास की सजा सुनाई।
सजा के खिलाफ अपील के दौरान, 19 सितंबर 2015 को आपसी सहमति से उनका तलाक हो गया। इसके परिणामस्वरूप, अपीलीय अदालत ने दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखते हुए, विवाद के निपटारे और तलाक के मद्देनजर, 21 सितंबर 2015 को राजेश को ‘अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958’ की धारा 4 के तहत अच्छे आचरण की परिवीक्षा (Probation of good conduct) पर रिहा कर दिया।
मार्च 2024 में, राजेश का चयन AAI में जूनियर एग्जीक्यूटिव के पद के लिए हुआ। उन्होंने सत्यापन फॉर्म में अपनी दोषसिद्धि और प्रोबेशन पर रिहाई की पूरी जानकारी दी। इसके बावजूद, AAI ने 19 अगस्त 2024 को उनका नियुक्ति प्रस्ताव रद्द कर दिया। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, AAI ने 9 दिसंबर 2024 को फिर से उनकी नियुक्ति को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि AAI विनियम, 2003 के रेगुलेशन 6(7)(b) के तहत नैतिक अधमता के दोषी व्यक्ति नियुक्ति के लिए पात्र नहीं हैं।
इस निर्णय को एकल पीठ के समक्ष चुनौती दी गई, जिसने 31 अक्टूबर 2025 को AAI के आदेश को रद्द कर दिया और नियुक्ति का निर्देश दिया। इसके खिलाफ AAI और केंद्र सरकार ने खंडपीठ में अपील दायर की थी।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता (AAI/केंद्र सरकार) ने तर्क दिया कि ‘भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (कर्मचारियों की सेवा और पारिश्रमिक की सामान्य शर्तें) विनियम, 2003’ के रेगुलेशन 6(7)(b) के अनुसार, नैतिक अधमता से जुड़े अपराध में दोषी व्यक्ति नियुक्ति के लिए अपात्र माना जाता है। उन्होंने कहा कि परिवीक्षा अधिनियम के तहत रिहाई से “दोषसिद्धि नहीं धुल जाती” और नियोक्ता को चरित्र सत्यापन का विशेषाधिकार है। उन्होंने अजीत कुमार बनाम पुलिस कमिश्नर के फैसले का हवाला दिया।
प्रतिवादी (राजेश) की ओर से तर्क दिया गया कि ‘अपराधी परिवीक्षा अधिनियम’ की धारा 12 में एक ‘नॉन-ऑब्स्टेंट क्लॉज’ (Non-obstante clause) है, जो कहता है कि धारा 3 या 4 के तहत निपटाए गए व्यक्ति को दोषसिद्धि से जुड़ी किसी भी अयोग्यता का सामना नहीं करना पड़ेगा। चूंकि AAI के नियमों में अयोग्यता सीधे ‘दोषसिद्धि’ (Conviction) से जुड़ी है, इसलिए धारा 12 का प्रभाव AAI के नियमों पर प्रभावी होगा।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
कोर्ट ने मुख्य रूप से ‘अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958’ की धारा 12 की व्याख्या पर ध्यान केंद्रित किया। धारा 12 स्पष्ट करती है कि किसी अन्य कानून में कुछ भी होने के बावजूद, परिवीक्षा पर रिहा किए गए व्यक्ति को उस कानून के तहत दोषसिद्धि से जुड़ी अयोग्यता का सामना नहीं करना पड़ेगा।
AAI के रेगुलेशन 6(7)(b) का विश्लेषण करते हुए पीठ ने कहा:
“रेगुलेशन 6(7)(b) का सीधा अर्थ यह है कि नियुक्ति के लिए अपात्रता ‘नैतिक अधमता से जुड़े अपराध में दोषसिद्धि’ से उत्पन्न होती है। चूंकि यह अयोग्यता सीधे दोषसिद्धि से जुड़ी है, इसलिए इस मामले में अधिनियम, 1958 की धारा 12 का संरक्षण उपलब्ध होगा।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शंकर दास बनाम भारत संघ (1985) के फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें यह स्थापित किया गया था कि हालांकि सेवा से ‘बर्खास्तगी’ धारा 12 के तहत अयोग्यता नहीं है, लेकिन दोषसिद्धि के आधार पर किसी पद या चुनाव के लिए वैधानिक रोक एक ‘अयोग्यता’ है जिसे धारा 12 हटा देती है।
खंडपीठ ने भारत संघ बनाम बख्शी राम (1990) का भी हवाला दिया और स्पष्ट किया कि यद्यपि धारा 12 दोषसिद्धि को खत्म नहीं करती, लेकिन यह उससे जुड़ी अयोग्यता को हटा देती है। कोर्ट ने शैतान सिंह मीणा बनाम भारत संघ के फैसले का भी उल्लेख किया, जो वैवाहिक विवादों के निपटारे से संबंधित था।
निष्कर्ष: कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी धारा 12 के संरक्षण का हकदार है। चूंकि उसे केवल दोषसिद्धि के कारण अपात्र माना गया था और उसे परिवीक्षा का लाभ दिया गया था, इसलिए वह अयोग्यता का सामना नहीं करेगा। कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया और प्रतिवादी को नियुक्त करने के एकल पीठ के निर्देश को सही ठहराया।
केस डिटेल्स:
केस टाइटल: यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य बनाम राजेश
केस नंबर: LPA 10/2026 & CM APPL. 1904-06/2026
कोरम: मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया

