छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में दुर्व्यवहार और प्रताड़ना के मामलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि “हिरासत में किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार या उत्पीड़न पूरी तरह से अस्वीकार्य है।” चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने एक याचिका का निपटारा करते हुए पुलिस महानिदेशक (DGP) को संबंधित थाना प्रभारी (SHO) के आचरण की जांच करने और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने यह टिप्पणी भिलाई के एक सिनेमा हॉल में बैठने को लेकर हुए मामूली विवाद के बाद पुलिस द्वारा किए गए कथित अत्याचार के मामले में की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 22 अक्टूबर 2025 को पीवीआर सिनेमा, सूर्या मॉल, भिलाई में हुई एक घटना से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, फिल्म देखने के दौरान सीट को लेकर याचिकाकर्ता नंबर 1 के परिवार और शिकायतकर्ता श्रीमती अलका गुप्ता के बीच मामूली कहासुनी हुई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस चौकी स्मृति नगर के कर्मियों ने दुर्भावनापूर्ण इरादे से हस्तक्षेप किया, क्योंकि याचिकाकर्ता के एक रिश्तेदार से जुड़े पुराने मामले (WPCR No. 553/2025) के कारण पुलिस उनसे रंजिश रखती थी।
पुलिस ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74, 191, 126, 296, 351(3) और अन्य धाराओं के तहत अपराध क्रमांक 1273/2025 और एफआईआर क्रमांक 1274/2025 दर्ज की। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और हथकड़ी लगाकर सार्वजनिक रूप से जुलूस निकाला गया। उनसे जबरन “अपराध करना पाप है, पुलिस हमारा बाप है” जैसे अपमानजनक नारे लगवाए गए।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं का पक्ष: याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अवध त्रिपाठी ने तर्क दिया कि पुलिस की कार्रवाई शक्तियों का दुरुपयोग है और संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन है। उनकी मुख्य दलीलें थीं:
- कथित अपराधों में सजा सात साल से कम है, फिर भी पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरधेश कुमार बनाम बिहार राज्य और सतिंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई के मामलों में दिए गए अनिवार्य दिशानिर्देशों का पालन किए बिना याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार किया।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) द्वारा 23 अक्टूबर 2025 को मेडिकल जांच कराने और चोटों का स्पष्टीकरण देने के निर्देश के बावजूद, पुलिस ने आदेश की अवहेलना की और रात तक मेडिकल जांच में देरी की।
- शिकायतकर्ता ने स्वयं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष शपथ पत्र देकर कहा कि विवाद मामूली था और उन्हें जमानत पर कोई आपत्ति नहीं है।
राज्य शासन का पक्ष: महाधिवक्ता विवेक शर्मा और अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास ने याचिका का विरोध करते हुए पुलिस महानिदेशक (DGP) का शपथ पत्र प्रस्तुत किया। राज्य का तर्क था:
- याचिकाकर्ताओं द्वारा बताई गई कहानी अतिरंजित है। वास्तव में, याचिकाकर्ताओं ने पुलिस कर्मियों के साथ मारपीट की थी, जिससे आरक्षक कौशलेन्द्र सिंह को फ्रैक्चर हुआ।
- याचिकाकर्ता नंबर 2 नशे की हालत में था और गिरने के कारण उसे चोटें आईं, न कि पुलिस की प्रताड़ना से।
- सार्वजनिक जुलूस निकालने के आरोप को खारिज करते हुए राज्य ने कहा कि पुलिस वाहन में तकनीकी खराबी आ गई थी, जिसके कारण उसे “धक्का” (push-start) लगाना पड़ा, और इसी वजह से आरोपियों को 30-40 मीटर पैदल चलना पड़ा।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जिसमें वीडियो फुटेज और डीजीपी का शपथ पत्र शामिल है, का अवलोकन किया। हालांकि कोर्ट ने विवादित तथ्यों पर विस्तृत निर्णय देने से परहेज किया, लेकिन पुलिस अधिकारियों के आचरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
बेंच ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए अवैध गिरफ्तारी, वैधानिक और न्यायिक सुरक्षा उपायों का पालन न करने, मेडिकल जांच में अत्यधिक देरी और कथित अपमान के आरोप भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के मूल ढांचे पर प्रहार करते हैं।”
प्रतिवादी संख्या 2, एसएचओ गुरिंदर सिंह सिद्धू के आचरण पर कोर्ट ने कहा:
“यह न्यायालय प्रतिवादी संख्या 2 के कार्य करने के तरीके पर अपनी गंभीर चिंता और कड़ी असहमति दर्ज करता है… जो पुलिस शक्तियों के प्रयोग में एक लापरवाही और जल्दबाजी भरे दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो नागरिकों की गिरफ्तारी, हिरासत और उपचार को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक सुरक्षा उपायों और प्रक्रियात्मक जनादेशों की स्पष्ट अवहेलना है।”
विवाद की प्रकृति के संबंध में, कोर्ट ने जोर देकर कहा कि पुलिस को संवैधानिक जनादेशों का सख्ती से पालन करना चाहिए, “विशेष रूप से मामूली सार्वजनिक विवादों से उत्पन्न मामलों में।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का उद्देश्य नागरिकों की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करना और अवैध हिरासत, अनावश्यक हथकड़ी, सार्वजनिक जुलूस या मानसिक और शारीरिक अपमान को रोकना है।
निर्णय और निर्देश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- विभागीय कार्रवाई: पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया गया है कि वे प्रतिवादी संख्या 2 (SHO) के आचरण की उचित स्तर पर जांच करें और यदि आवश्यक हो, तो सुधारात्मक और अनुशासनात्मक कार्रवाई करें।
- संवेदनशीलता और परामर्श: एसएचओ को अरधेश कुमार, सतिंदर कुमार अंतिल और डी.के. बसु के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों के संबंध में औपचारिक रूप से संवेदनशील बनाया जाए और परामर्श दिया जाए।
- सख्त अनुपालन: राज्य सरकार और पुलिस विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि गिरफ्तारी, रिमांड और मेडिकल जांच की प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन किया जाए। किसी भी विचलन पर “सख्त विभागीय परिणाम” होंगे।
- स्थायी निर्देश: डीजीपी को सभी इकाइयों को स्थायी निर्देश जारी करने के लिए कहा गया है कि पुलिस अधिकार का प्रयोग संयम और जवाबदेही के साथ किया जाना चाहिए।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: सुजीत साव व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य
- केस नंबर: डब्ल्यूपीसीआर (WPCR) नंबर 11 ऑफ 2026
- कोरम: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल

