कर्नाटक हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 के तहत रेप और धोखाधड़ी सहित अन्य अपराधों के लिए एक वकील और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक प्रक्रिया का उपयोग “उत्पीड़न के इंजन” या “प्रतिशोध के हथियार” के रूप में नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता, जो अपने पूर्व पति के साथ पहले से ही रिश्ते में थी, यह दावा नहीं कर सकती कि उसे केवल शादी के वादे पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह आदेश जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने क्रिमिनल पिटीशन नंबर 1225 ऑफ 2025 और उससे जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता (आरोपी नंबर 1) एक वकील हैं, जबकि अन्य याचिकाकर्ता उनके रिश्तेदार हैं।
9 दिसंबर, 2024 को दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, शिकायतकर्ता (प्रतिवादी नंबर 2) ने आरोप लगाया कि वह 2020 में एक कानूनी मामले के सिलसिले में आरोपी वकील के संपर्क में आई थी। उनका दावा था कि यह पेशेवर परिचय व्यक्तिगत रिश्ते में बदल गया और शादी के बहाने उनके बीच शारीरिक संबंध बने। उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपी ने उन्हें गर्भपात के लिए मजबूर किया और बाद में शादी करने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने बीएनएस, 2023 की धारा 69 (कपटपूर्ण साधनों द्वारा यौन संबंध), 64(2)(m) (रेप), 89, 318(2), 351(2) और 3(5) के तहत शिकायत दर्ज कराई।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील, श्री अभिषेक कुमार ने तर्क दिया कि लगाए गए आरोप पूरी तरह से मनगढ़ंत हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि शिकायतकर्ता की पहले दो बार शादी हो चुकी है और वह पुरुषों को फंसाकर उनके खिलाफ केस दर्ज कराने की आदी है। वकील ने यतीश कुमार टी.आर. के साथ शिकायतकर्ता की शादी, 2016 में हुए विवाह विच्छेद (annulment) और एक लापता बच्चे से संबंधित अपहरण के मामले के दस्तावेज प्रस्तुत किए। उन्होंने तर्क दिया कि तलाक की डिक्री के बावजूद शिकायतकर्ता अपने पूर्व पति के साथ रह रही थी।
इसके विपरीत, शिकायतकर्ता के वकील श्री अक्षय आर. हुड्डर और अतिरिक्त राज्य लोक अभियोजक सुश्री अस्मा कौसर ने तर्क दिया कि जांच जारी रहनी चाहिए। उनका कहना था कि शारीरिक संबंध शादी के वादे पर बनाए गए थे और सच्चाई पूरी जांच के बाद ही सामने आएगी।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
जस्टिस नागप्रसन्ना ने दस्तावेजों की बारीकी से जांच की, जिससे शिकायतकर्ता की कहानी के विपरीत “स्पष्ट और चौंकाने वाली परिस्थितियां” सामने आईं।
हाईकोर्ट ने नोट किया कि यद्यपि शिकायतकर्ता की यतीश कुमार के साथ शादी 22 अक्टूबर, 2016 को रद्द हो गई थी, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद जन्म प्रमाण पत्र से पता चला कि 21 अगस्त, 2020 को (विवाह विच्छेद के चार साल बाद) उनके एक बच्चे का जन्म हुआ। इसके अलावा, 2023 की एक कानूनी कार्यवाही (क्रिमिनल मिसलीनियस नंबर 1467/2023) में, शिकायतकर्ता ने खुद को “श्री यतीश कुमार की पत्नी” के रूप में वर्णित किया था।
कोर्ट ने कहा: “जब आधिकारिक रिकॉर्ड से सामने आए इन सभी तथ्यों पर समग्र रूप से विचार किया जाता है, तो यह समझना कठिन है, स्वीकार करना तो दूर की बात है, कि शिकायतकर्ता कैसे यह दावा कर सकती है कि उसने ‘शादी के वादे’ पर यौन संबंध बनाने के लिए सहमति दी थी, जबकि वह पहले से ही एक वैवाहिक रिश्ते में या कम से कम एक घरेलू संबंध में रह रही थी।”
बीएनएस (BNS) की धारा 69 की व्याख्या
बीएनएस की धारा 69, जो कपटपूर्ण साधनों (deceitful means) का उपयोग करके यौन संबंध बनाने को अपराध मानती है, का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने इसके दायरे को स्पष्ट किया। जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा कि इस कानून की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती कि केवल ‘वादे’ का जिक्र करके सहमति से बने संबंधों को पूर्वव्यापी प्रभाव से अपराध बना दिया जाए।
विधायी मंशा के संबंध में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए, कोर्ट ने कहा: “यह कानून कपट (deceit) को दंडित करता है, निराशा (disappointment) को नहीं; धोखाधड़ी (fraud) को दंडित करता है, असफल स्नेह (failed affection) को नहीं; और शोषण को दंडित करता है, रिश्ते के टूट जाने को नहीं।”
हाईकोर्ट ने माना कि चूंकि शिकायतकर्ता अन्य रिश्तों में थी और उसके बच्चे थे, इसलिए यह आरोप कि यौन संबंध केवल शादी के वादे पर बनाए गए थे, “स्वाभाविक रूप से अविश्वसनीय और कानूनी रूप से अस्थिर” है।
पूर्व निर्णयों का हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें शामिल हैं:
- डॉ. ध्रुवाराम मुरलीधर सोनार बनाम महाराष्ट्र राज्य: रेप और सहमति से बनाए गए संबंधों के बीच अंतर स्पष्ट किया गया।
- शंभू खरवार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य: इसमें कहा गया था कि वादे का उल्लंघन तब तक झूठा वादा नहीं कहा जा सकता जब तक कि वादे के समय ही उसे पूरा न करने का इरादा न हो।
- नईम अहमद बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली): इसमें कहा गया था कि केवल शादी न होने के कारण रिश्ते को अपराध नहीं माना जा सकता।
फैसला
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायत में “हेरफेर और निजी विवाद को सार्वजनिक अभियोजन में बदलने के प्रयास की गहरी छाप” दिखाई देती है। कोर्ट ने इस कार्यवाही को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया।
जस्टिस नागप्रसन्ना ने आपराधिक याचिकाओं को स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बेंगलुरु ग्रामीण जिले के समक्ष लंबित क्राइम नंबर 789/2024 की एफआईआर को रद्द कर दिया।
अंत में कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा: “यह कोर्ट आपराधिक प्रक्रिया को उत्पीड़न के इंजन या प्रतिशोध के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बनने की अनुमति नहीं दे सकता, जिससे अंततः न्याय का हनन हो।”
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: XXXX बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (तथा संबंधित मामला)
- केस नंबर: क्रिमिनल पिटीशन नंबर 1225 ऑफ 2025 C/W क्रिमिनल पिटीशन नंबर 2826 ऑफ 2025
- कोरम: जस्टिस एम. नागप्रसन्ना

