केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच का अधिकार राज्य एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) के पास भी है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि राज्य का एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act) के तहत केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ भी मामला दर्ज करने, जांच करने और मुकदमा चलाने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि ऐसे मामलों में केवल केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के पास ही विशेष क्षेत्राधिकार है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला नवल किशोर मीणा द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से शीर्ष अदालत में पहुंचा, जिसमें राजस्थान हाईकोर्ट के 3 अक्टूबर, 2025 के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ कानून के दो महत्वपूर्ण सवालों पर फैसला सुनाया था:

  1. क्या राज्य की एजेंसी, यानी एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) के पास केंद्र सरकार के अधीन कार्यरत व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने का क्षेत्राधिकार है, या यह क्षेत्राधिकार विशेष रूप से CBI के पास निहित है?
  2. यदि ACB द्वारा CBI की मंजूरी या सहमति के बिना केंद्र सरकार के कर्मचारी के खिलाफ सक्षम न्यायालय में आरोप पत्र (charge-sheet) दायर किया जाता है, तो क्या ऐसा आरोप पत्र कानूनन मान्य होगा?

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि केंद्र सरकार के कर्मचारी द्वारा किए गए अपराधों के लिए, ACB बिना CBI की पूर्व मंजूरी के कार्यवाही नहीं कर सकती है और जांच का अधिकार विशेष रूप से CBI के दायरे में आता है।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की और यह दर्ज किया कि राज्य ACB के पास क्षेत्राधिकार है, “भले ही आरोपी केंद्र सरकार का कर्मचारी हो।” पीठ ने टिप्पणी की कि “यह कहना गलत है कि केवल CBI ही अभियोजन शुरू कर सकती थी।”

CBI और राज्य पुलिस की भूमिका पर

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कोर्ट ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (DSPE Act) का विश्लेषण किया, जिसके तहत CBI का गठन किया गया है। कोर्ट ने माना कि CBI एक विशेष एजेंसी है जिसे अक्सर “काम के दोहराव से बचने” के लिए केंद्र सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामले सौंपे जाते हैं, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रशासनिक व्यवस्था राज्य पुलिस की वैधानिक शक्तियों को समाप्त नहीं करती है।

कोर्ट ने कहा:

“भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) विशेष रूप से जांच करने के लिए किसी अलग प्रक्रिया की परिकल्पना नहीं करता है। PC Act के तहत अपराधों की जांच राज्य एजेंसी या केंद्रीय एजेंसी या किसी भी पुलिस एजेंसी द्वारा की जा सकती है, जैसा कि उक्त अधिनियम की धारा 17 में देखा जा सकता है, जिसमें केवल यह शर्त है कि पुलिस अधिकारी एक विशेष रैंक का होना चाहिए।”

कानूनी व्याख्या

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दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156 का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने कहा कि CrPC जांच और ट्रायल के लिए मूल कानून है। पीठ ने कहा, “जब तक कि विशेष कानून स्पष्ट रूप से या परोक्ष रूप से जांच के लिए कोई अलग प्रावधान प्रदान नहीं करता है, तब तक CrPC की धारा 156 के तहत सामान्य प्रावधान ही मान्य होंगे।”

कोर्ट ने माना कि PC Act की धारा 17 राज्य पुलिस या राज्य की विशेष एजेंसी को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ अपराध दर्ज करने से बाहर नहीं करती है। पीठ ने समझाया:

“धारा 17 राज्य पुलिस या राज्य की विशेष एजेंसी को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वत, भ्रष्टाचार और कदाचार से संबंधित मामलों में अपराध दर्ज करने या जांच करने से बाहर नहीं करती है और न ही रोकती है।”

उद्धृत किए गए पूर्व निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने ए.सी. शर्मा बनाम दिल्ली प्रशासन (1973) में अपने पहले के फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें यह कहा गया था कि DSPE Act नियमित पुलिस अधिकारियों को उनके क्षेत्राधिकार से वंचित नहीं करता है। कोर्ट ने दोहराया कि DSPE Act केवल “अनुमति देने वाला या सशक्त बनाने वाला है, जिसका उद्देश्य केवल दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना को निर्दिष्ट अपराधों की जांच करने में सक्षम बनाना है… बिना किसी अन्य कानून को कमजोर किए जो पुलिस अधिकारियों को अपराधों की जांच करने का अधिकार देता है।”

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कोर्ट ने मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा अशोक कुमार कीर्तिवार बनाम मध्य प्रदेश राज्य और जी.एस.आर. सोमयाजी बनाम स्टेट थ्रू CBI जैसे मामलों में दिए गए निर्णयों से भी सहमति व्यक्त की। इन फैसलों में यह स्थापित किया गया था कि राज्य एजेंसी द्वारा केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ की गई जांच पर “क्षेत्राधिकार की कमी के आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता कि यह अवैध है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले में “कोई त्रुटि नहीं, और कानून की कोई त्रुटि तो बिल्कुल नहीं” पाते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण:

केस टाइटल: नवल किशोर मीणा @ एन.के. मीणा बनाम राजस्थान राज्य

केस संख्या: S.L.P. (Crl.) No. 492/2026

कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

याचिकाकर्ता के वकील: डॉ. मनीष अग्रवाल, श्री विशाल अरुण मिश्रा (AOR)

प्रतिवादी के वकील: श्री शिवमंगल शर्मा, एएजी

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