मद्रास हाईकोर्ट ने बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 (PBPT Act) के तहत एक साझेदारी फर्म की महिला भागीदार को अभियोजन से आरोप मुक्त (Discharge) कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यवसाय के संचालन में उनकी भूमिका के बारे में विशिष्ट आरोपों (Specific Averments) के बिना उन्हें प्रतिनिधिक रूप से उत्तरदायी (Vicariously Liable) नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, हाईकोर्ट ने नोटबंदी के बाद 68.71 करोड़ रुपये की नकदी जमा करने के मामले में फर्म और उसके प्रबंध भागीदार (Managing Partner) के खिलाफ अभियोजन को बरकरार रखा है।
जस्टिस सुंदर मोहन की पीठ ने बेनामी लेनदेन मामले में आरोपियों द्वारा दायर दो आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं (Criminal Revision Cases) पर यह फैसला सुनाया। यह मामला 2017 में नोटबंदी के ठीक बाद साझेदारी फर्म, मैसर्स वी.पी.सी. एंड कंपनी के बैंक खाते में 68.71 करोड़ रुपये जमा करने से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने तीसरी आरोपी (आर. कलाईवानी) की याचिका को स्वीकार करते हुए उन्हें इस आधार पर आरोप मुक्त कर दिया कि शिकायत में उनके प्रतिनिधिक दायित्व को स्थापित करने के लिए आवश्यक आरोपों का अभाव था। इसके विपरीत, कोर्ट ने फर्म (आरोपी संख्या 1) और उसके प्रबंध भागीदार आर. रमेश (आरोपी संख्या 2) की याचिका को खारिज कर दिया और माना कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मामला बनता है।
मामले की पृष्ठभूमि
आयकर विभाग (बेनामी निषेध) के उपायुक्त द्वारा शुरू किए गए अभियोजन में आरोप लगाया गया था कि साझेदारी फर्म, मैसर्स वी.पी.सी. एंड कंपनी (आरोपी संख्या 1) के बैंक खाते में 2017 में नोटबंदी के बाद 68.71 करोड़ रुपये नकद जमा किए गए थे।
प्रतिवादी/शिकायतकर्ता का तर्क था कि आरोपियों के पास इतनी बड़ी जमा राशि को समझाने के लिए आवश्यक स्रोत नहीं थे। यह आरोप लगाया गया था कि पिछले वर्षों में फर्म द्वारा घोषित आय बहुत कम थी और अचानक मुनाफे और जमा में हुई यह वृद्धि वित्तीय स्थिति से मेल नहीं खाती थी। विभाग ने आरोप लगाया कि आरोपी इन जमाओं के लिए स्रोत प्रस्तुत करने में विफल रहे।
आरोपियों ने चेन्नई स्थित सीबीआई मामलों के नौवें अतिरिक्त विशेष न्यायाधीश के समक्ष डिस्चार्ज याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें 20 मार्च, 2023 को खारिज कर दिया गया था। विशेष न्यायाधीश ने कहा था कि आरोप तय करने के चरण में कोर्ट सबूतों का वजन नहीं तौल सकता और प्रथम दृष्टया मामला मौजूद है। इस आदेश से व्यथित होकर आरोपियों ने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षों की दलीलें
आर. कलाईवानी (आरोपी संख्या 3) का पक्ष: तीसरी आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आर. जॉन सत्यन ने तर्क दिया कि वह केवल एक “निष्क्रिय भागीदार” (Dormant Partner) हैं और प्रबंध भागीदार (आरोपी संख्या 2) की पत्नी हैं। उन्होंने दलील दी कि:
- फर्म के सभी मामलों का प्रबंधन उनके पति द्वारा किया जाता था।
- कारण बताओ नोटिस के अपने जवाब में, उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी निष्क्रिय स्थिति का उल्लेख किया था।
- प्रतिवादी उनकी सक्रिय भूमिका स्थापित करने वाले सबूत जुटाने में विफल रहा।
- PBPT अधिनियम की धारा 62 के तहत प्रतिनिधिक दायित्व लागू करने के लिए शिकायत में आवश्यक विशिष्ट आरोपों का अभाव था।
फर्म और प्रबंध भागीदार (आरोपी संख्या 1 और 2) का पक्ष: फर्म और आर. रमेश (आरोपी संख्या 2) की ओर से अधिवक्ता श्री एस. मनुराज ने तर्क दिया कि:
- फर्म के पास पर्याप्त साधन थे, और 68.71 करोड़ रुपये नोटबंदी से पहले सात महीनों की अवधि में नकद बिक्री और अग्रिम राशि से जमा हुआ टर्नओवर था।
- केवल इसलिए कि पिछले वर्षों में मुनाफा कम था, अपराध की धारणा नहीं बनाई जा सकती।
- प्रतिवादी द्वारा कथित “लाभार्थी स्वामी” (Beneficial Owner) का पता नहीं लगाया गया है।
- शिकायत में ऐसा कोई विशिष्ट आरोप नहीं है कि प्रबंध भागीदार व्यवसाय के संचालन के लिए प्रभारी और जिम्मेदार था।
- उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के संजय दत्त बनाम हरियाणा राज्य (2025 INSC 34) और मद्रास हाईकोर्ट के उमंगा वोहरा बनाम तमिलनाडु राज्य (2025-1-LW(Crl) 848) के फैसलों का हवाला दिया।
प्रतिवादी (आयकर विभाग) का पक्ष: विशेष लोक अभियोजक सुश्री एम. शीला ने डिस्चार्ज का विरोध करते हुए तर्क दिया:
- पिछले वर्षों में फर्म का टर्नओवर काफी कम था: 2015-16 में 2,31,449 रुपये, 2,31,449 में 1,70,203 रुपये, जो 2017-18 में बढ़कर 24,36,212 रुपये हो गया। 68 करोड़ रुपये की नकद बिक्री का दावा मनगढ़ंत है।
- 05.11.2016 तक फर्म पर 4.93 करोड़ रुपये की बकाया राशि थी, जिससे यह असंभव लगता है कि उनके पास 68 करोड़ रुपये नकद थे।
- जांच में पता चला कि माल परिवहन के बिलों में उल्लिखित वाहन पंजीकरण नंबर वास्तव में दोपहिया वाहनों के थे, न कि ट्रकों के।
- चूंकि यह केवल दो भागीदारों वाली साझेदारी फर्म है, इसलिए प्रबंध भागीदार और उनकी पत्नी (A3) संयुक्त रूप से उत्तरदायी हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
फर्म और प्रबंध भागीदार (आरोपी संख्या 1 और 2) पर: जस्टिस सुंदर मोहन ने कहा कि जमा राशि की वास्तविकता के संबंध में याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाया गया बचाव डिस्चार्ज के चरण में तय नहीं किया जा सकता है। लाभार्थी स्वामी की पहचान के संबंध में, कोर्ट ने नोट किया:
“वास्तव में, PBPT अधिनियम की धारा 2(9)(D) के तहत, ‘बेनामी लेनदेन’ में संपत्ति के संबंध में वह लेनदेन शामिल है जहां प्रतिफल प्रदान करने वाला व्यक्ति पता लगाने योग्य नहीं है या काल्पनिक है। इसलिए, यह तथ्य कि लाभार्थी स्वामी की पहचान नहीं की गई है, डिस्चार्ज का आधार नहीं होगा।”
हाईकोर्ट ने संजय दत्त मामले पर निर्भरता को खारिज कर दिया, तथ्यों में अंतर बताते हुए कहा कि उस मामले में कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया था। मौजूदा मामले में, फर्म पहली आरोपी है और दूसरा आरोपी प्रबंध भागीदार है। कोर्ट ने कहा:
“इस मामले में, पहला आरोपी साझेदारी फर्म है और दूसरा आरोपी इसका प्रबंध भागीदार है, जिसकी सहमति के बिना उक्त नकद जमा नहीं किया जा सकता था… उसने बैलेंस शीट और अन्य प्रासंगिक दस्तावेजों पर भी हस्ताक्षर किए थे, जो प्रथम दृष्टया उसके ज्ञान और सहमति को इंगित करता है।”
भागीदार/पत्नी (आरोपी संख्या 3) पर: हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया कि आर. कलाईवानी को प्रतिनिधिक रूप से उत्तरदायी ठहराने के लिए शिकायत में आवश्यक आरोपों का अभाव था। कोर्ट ने नोट किया कि उन्होंने नोटिस का जवाब देते हुए खुद को निष्क्रिय भागीदार बताया था, फिर भी शिकायत में उनकी सटीक भूमिका निर्दिष्ट नहीं की गई।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिलीप हरिरामानी बनाम बैंक ऑफ बड़ौदा (2024 (15) SCC 443) के फैसले पर भरोसा किया, जो यह दोहराता है कि प्रतिनिधिक दायित्व के लिए विशिष्ट दलीलों की आवश्यकता होती है कि आरोपी व्यवसाय के संचालन के लिए प्रभारी और जिम्मेदार था।
जस्टिस सुंदर मोहन ने कहा:
“याचिकाकर्ता की तुलना उसके पति से नहीं की जा सकती, जो प्रबंध भागीदार था। इसलिए, प्रतिवादी को विशेष रूप से यह आरोप लगाना चाहिए था कि याचिकाकर्ता व्यवसाय के संचालन के लिए फर्म के प्रति प्रभारी और जिम्मेदार थी।”
“याचिकाकर्ता/तीसरे आरोपी द्वारा निभाई गई भूमिका को स्थापित करने के लिए किसी भी सामग्री के अभाव में, इस न्यायालय का विचार है कि याचिकाकर्ता/तीसरे आरोपी को प्रतिनिधिक रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, विशेष रूप से तब जब शिकायत में प्रतिनिधिक दायित्व को लागू करने के लिए आवश्यक कथन भी अनुपस्थित हैं।”
निर्णय
मद्रास हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:
- Crl.R.C.No.872 of 2023 को स्वीकार किया: आर. कलाईवानी (आरोपी संख्या 3) के संबंध में ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया गया और उन्हें आरोप मुक्त (Discharge) कर दिया गया।
- Crl.R.C.No.956 of 2023 को खारिज किया: मैसर्स वी.पी.सी. एंड कंपनी और आर. रमेश (आरोपी संख्या 1 और 2) द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई और उन्हें मुकदमे का सामना करना होगा।
- स्वतंत्रता प्रदान की: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि प्रतिवादी मुकदमे के दौरान तीसरे आरोपी की भूमिका साबित करने वाले सबूत पेश करता है, तो वे उसके खिलाफ कार्यवाही के लिए Cr.P.C. की धारा 319 (BNSS की धारा 358 के अनुरूप) को लागू करने के लिए स्वतंत्र हैं।
केस विवरण
- केस टाइटल: आर. कलाईवानी बनाम उपायुक्त आयकर (बेनामी निषेध) / मैसर्स वी.पी.सी. एंड कंपनी बनाम उपायुक्त आयकर
- केस नंबर: Crl.R.C.Nos.872 & 956 of 2023
- कोरम: जस्टिस सुंदर मोहन

