बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि पत्नी उच्च शिक्षित है और सरकारी नौकरी से लाखों रुपये वेतन पा रही है, तो वह पति से भरण-पोषण (Maintenance) पाने की हकदार नहीं है। कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में पत्नी अपना जीवनयापन “शालीनता और गरिमा” (Decently and with dignity) के साथ करने में सक्षम है।
न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि हालांकि नौकरी करना भरण-पोषण मांगने में बाधा नहीं है, लेकिन अदालत को यह देखना होता है कि क्या पत्नी की अपनी आय उसे उसी जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त है जो उसे ससुराल में मिलता था। इस मामले में, पत्नी एक चिकित्सा अधिकारी (Medical Officer) है और उसका वेतन 1.38 लाख रुपये से अधिक है, जिसे कोर्ट ने पर्याप्त माना।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक डॉक्टर दंपति के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों का विवाह मई 2010 में हुआ था और उनका एक बेटा है। रिश्तों में खटास आने के बाद अगस्त 2010 से वे अलग रहने लगे। पत्नी ने ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’ (D.V. Act) की धारा 12 के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), उदगीर के समक्ष याचिका दायर की थी। उसने अपने और बेटे के लिए 25,000 रुपये मासिक भरण-पोषण की मांग की थी।
निचली अदालत ने 3 अगस्त, 2019 को फैसला सुनाते हुए पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को 12,000 रुपये और बेटे को 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण दे। इसके अलावा 7,000 रुपये किराया और 1 लाख रुपये मुआवजे के तौर पर देने का आदेश भी दिया गया। पति ने इस आदेश को सत्र न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन 31 जनवरी, 2023 को उसकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Application) दायर की।
पक्षकारों की दलीलें
पति का पक्ष: पति की ओर से पेश वकील ए. ए. यादकीकर ने तर्क दिया कि पत्नी एम.बी.बी.एस. और एम.डी. की डिग्री रखती है। वह महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) के माध्यम से एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सा अधिकारी के रूप में नियुक्त है।
साक्ष्य के तौर पर पति ने पत्नी की सैलरी स्लिप पेश की, जिसमें उसका सकल वेतन 1,38,192 रुपये प्रति माह दिखाया गया था। दलील दी गई कि पत्नी के पास आय का स्थाई स्रोत है, वह आयकर दाता है और उसे पति की आर्थिक मदद की जरूरत नहीं है। हालांकि, पति ने यह स्पष्ट किया कि वह अपने बेटे के खर्च उठाने के लिए तैयार है, लेकिन पत्नी के लिए नहीं।
पत्नी का पक्ष: पत्नी की ओर से पेश वकील वी. डी. गुनाले ने निचली अदालतों के फैसलों का बचाव किया। उन्होंने रजनेश बनाम नेहा (AIR 2021 SC 569) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि भले ही पत्नी कमा रही हो, वह उसी ‘जीवन स्तर’ को बनाए रखने के लिए भरण-पोषण की हकदार है, जो उसे विवाह के दौरान प्राप्त था।
पत्नी ने अपने हलफनामे में दावा किया कि पति अपनी प्रैक्टिस और खेती से लाखों रुपये कमाता है। उसने अपने खर्चों का ब्योरा देते हुए कहा कि उसे घर का किराया, आने-जाने का खर्च और बेटे की स्कूल फीस व ट्यूशन के लिए बड़ी राशि की आवश्यकता है। उसने यह भी बताया कि वह कार लोन और होम लोन की ईएमआई भर रही है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और रजनेश बनाम नेहा के सिद्धांतों का विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि यह तय करना अदालत का कर्तव्य है कि क्या कमाने वाली पत्नी की आय इतनी है कि वह अपना गुजारा उसी तरह कर सके जैसे वह अपने पति के साथ रहते हुए करती थी।
कोर्ट ने पत्नी की आर्थिक स्थिति पर गौर किया:
- आय: अगस्त 2025 की सैलरी स्लिप के अनुसार पत्नी का वेतन 1,38,192 रुपये है।
- आवास: पत्नी ने 20,000 रुपये किराये का दावा किया था, लेकिन सैलरी स्लिप में उसे मकान किराया भत्ता (HRA) मिलता हुआ दिखाया गया है। साथ ही, होम लोन की ईएमआई भरने का मतलब है कि उसके पास अपना घर है।
- संपत्ति: कार लोन की ईएमआई से स्पष्ट है कि उसके पास अपना वाहन है।
न्यायमूर्ति वाघवासे ने टिप्पणी की:
“अलग होने के बाद की जीवनशैली को देखें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि उसके पास अपना घर और अपना वाहन है। आरामदायक जीवनशैली के लिए आवश्यक सभी साधन उसके पास मौजूद हैं। अपनी उपरोक्त आय के साथ, वह निश्चित रूप से शालीनता और गरिमा के साथ अपना भरण-पोषण कर सकती है।”
बेटे के खर्चों के संबंध में, कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने दावों के समर्थन में दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किए, लेकिन पति की ओर से बेटे का खर्च उठाने की सहमति को देखते हुए उस आदेश को बरकरार रखा गया।
फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया और निचली अदालतों के आदेश में संशोधन किया:
- पत्नी को 12,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश रद्द (Set aside) कर दिया गया।
- किराये के संबंध में दिए गए आदेश को भी रद्द कर दिया गया।
- पति को निर्देश दिया गया कि वह बेटे के भरण-पोषण के लिए 10,000 रुपये प्रति माह देना जारी रखेगा।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: दीपक गंगाधर दाडगे बनाम सौ. विजया पत्नी दीपक दाडगे और अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन नंबर 31 ऑफ 2024
- कोरम: न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे

