सुप्रीम कोर्ट ने धारा 29A पर स्थिति स्पष्ट की: आर्बिट्रेटर का कार्यकाल बढ़ाने पर हर बार उसे बदलना अनिवार्य नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) की धारा 29A की व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि मोहन लाल फतेहपुरिया बनाम मेसर्स भारत टेक्सटाइल्स और अन्य के मामले में दिए गए हालिया फैसले का उद्देश्य कानून को फिर से लिखना या कार्यकाल विस्तार (extension of mandate) के हर मामले में आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) को बदलने के लिए बाध्य करना नहीं था।

यह टिप्पणी जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने विवा हाईवेज लिमिटेड (Viva Highways Ltd) द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी करते हुए हाईकोर्ट की कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर खंडपीठ) द्वारा 2 दिसंबर, 2025 को एमसीसी संख्या 2699/2025 में पारित एक अंतिम निर्णय और आदेश से उत्पन्न हुआ है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के मोहन लाल फतेहपुरिया बनाम मेसर्स भारत टेक्सटाइल्स और अन्य (2025 INSC 1409) के फैसले का हवाला दिया था। याचिकाकर्ता, विवा हाईवेज लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए तर्क दिया कि उक्त मिसाल (precedent) पर हाईकोर्ट की निर्भरता की जांच की आवश्यकता है, विशेष रूप से आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 29A की व्याख्या के संबंध में।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और स्पष्टीकरण

सुनवाई के दौरान, पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा मोहन लाल फतेहपुरिया फैसले के संदर्भ दिए जाने पर गौर किया। विशेष रूप से, जस्टिस संजय कुमार, जो मोहन लाल फतेहपुरिया का फैसला सुनाने वाली पीठ का भी हिस्सा थे, ने स्पष्ट किया कि उस फैसले का असली इरादा क्या था।

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कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

“आक्षेपित आदेश में, हाईकोर्ट द्वारा इस न्यायालय के ‘मोहन लाल फतेहपुरिया बनाम मेसर्स भारत टेक्सटाइल्स और अन्य’ के फैसले का संदर्भ दिया गया था। हालांकि, उक्त फैसले में इस न्यायालय का इरादा, जिसमें हममें से एक (जस्टिस संजय कुमार) पक्षकार थे, मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 29A(4), 29A(5) और 29A(6) के प्रावधानों को फिर से लिखना और आर्बिट्रेटर के जनादेश (mandate) के विस्तार के हर मामले में आर्बिट्रेटर के प्रतिस्थापन (substitution) को बाध्य करना नहीं था।”

पीठ ने आगे कहा कि यह इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि मोहन लाल फतेहपुरिया के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के रोहन बिल्डर्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड बनाम बर्जर पेंट्स इंडिया लिमिटेड (2024 SCC OnLine SC 2494) के पूर्व फैसले का उल्लेख किया गया था।

निर्णय और अंतरिम राहत

याचिकाकर्ता और प्रतिवादियों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया, जो 6 फरवरी, 2026 को वापसी योग्य (returnable) है।

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प्रतिवादी संख्या 1 (मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड) की ओर से उपस्थित एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड श्री अभिनव श्रीवास्तव ने कोर्ट में नोटिस स्वीकार किया, इसलिए उन्हें अलग से नोटिस तामील करने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि गैर-प्रतिनिधित्व वाले प्रतिवादी संख्या 2 को ‘दस्ती’ सहित सभी तरीकों से नोटिस तामील किया जाए।

एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत प्रदान की और निर्देश दिया:

“हाईकोर्ट अगली सुनवाई तक इस मामले में आगे कार्यवाही नहीं करेगा।”

मामले की अगली सुनवाई 6 फरवरी, 2026 को निर्धारित की गई है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश से आवश्यक आदेश प्राप्त करने के बाद, इस मामले को जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

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केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: विवा हाईवेज लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड और अन्य
  • केस नंबर: एसएलपी (सी) नंबर 38327/2025
  • कोरम: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री गुरु कृष्ण कुमार (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री संदीप बजाज (अधिवक्ता), श्री शोएब कुरैशी (एओआर), सुश्री चेतना अलग (अधिवक्ता)
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री सौरभ मिश्रा (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री अभिनव श्रीवास्तव (एओआर), श्री स्वास्तिक सिंह (अधिवक्ता), श्री शिवांग रावत (अधिवक्ता), श्री हितेश गुप्ता (अधिवक्ता), सुश्री मुस्कान (अधिवक्ता)

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