सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के 2012 के रेगुलेशन, जो तकनीकी संस्थानों में शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों के लिए करियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) से संबंधित हैं, राज्य के नियमों के तहत आयोजित होने वाली सीधी भर्ती (Direct Recruitment) पर लागू नहीं होते हैं। कोर्ट ने कहा कि करियर में उन्नति के लिए बनाए गए नियमों को खुली प्रतिस्पर्धी भर्ती पर लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने गुजरात लोक सेवा आयोग (GPSC) द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें प्रोफेसर के पद के लिए चयन प्रक्रिया को अमान्य घोषित किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला गुजरात लोक सेवा आयोग द्वारा 23 सितंबर, 2015 को जारी एक विज्ञापन से संबंधित है। आयोग ने गुजरात के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में ‘प्रोफेसर (प्लास्टिक इंजीनियरिंग)’ सहित विभिन्न विषयों में प्रोफेसरों की भर्ती के लिए आवेदन मांगे थे। यह भर्ती ‘गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेजेज रिक्रूटमेंट रूल्स, 2012’ (राज्य नियम) के तहत आयोजित की गई थी, जिसमें व्यक्तिगत साक्षात्कार (Interview) के आधार पर मूल्यांकन का प्रावधान था।
प्रतिवादी उम्मीदवार ने इस पद के लिए आवेदन किया और 17 दिसंबर, 2015 को साक्षात्कार में शामिल हुईं। महिला अनारक्षित श्रेणी के लिए न्यूनतम योग्यता अंक 100 में से 45 निर्धारित थे, लेकिन उम्मीदवार को केवल 28 अंक प्राप्त हुए और इसलिए उनका चयन नहीं हुआ।
असफल घोषित होने के बाद, उम्मीदवार ने चयन प्रक्रिया को चुनौती देते हुए AICTE रेगुलेशन, 2012 का हवाला दिया। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने 25 नवंबर, 2024 को रिट याचिका खारिज कर दी थी, यह मानते हुए कि उम्मीदवार विज्ञापन की शर्तों से बंधी थीं और उन्होंने बिना किसी विरोध के प्रक्रिया में भाग लिया था। हालांकि, अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 20 अगस्त, 2025 को एकल न्यायाधीश के आदेश को पलट दिया। खंडपीठ ने माना कि AICTE रेगुलेशन सीधी भर्ती को भी नियंत्रित करते हैं और आयोग की साक्षात्कार-आधारित प्रक्रिया इन नियमों का उल्लंघन करती है।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता (GPSC) की ओर से तर्क दिया गया कि खंडपीठ ने भर्ती प्रक्रिया में AICTE रेगुलेशन को लागू करके गलती की है। यह कहा गया कि विज्ञापन में स्पष्ट रूप से साक्षात्कार के आधार पर उपयुक्तता के मूल्यांकन का प्रावधान था। इसके अलावा, उम्मीदवार द्वारा चयन प्रक्रिया में भाग लेने के बाद उसे चुनौती देना एस्टोपेल (Estoppel) के सिद्धांत के खिलाफ है।
दूसरी ओर, प्रतिवादी उम्मीदवार की ओर से दलील दी गई कि संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम के तहत तैयार किए गए AICTE रेगुलेशन, राज्य के नियमों पर प्रभावी होंगे। यह भी तर्क दिया गया कि उम्मीदवार अनुच्छेद 16 के तहत अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की शिकार हुई हैं और उन पर एस्टोपेल का सिद्धांत लागू नहीं होना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण
पीठ की ओर से निर्णय लिखते हुए जस्टिस आलोक अराधे ने AICTE रेगुलेशन, 2012 की संरचना का विश्लेषण किया। कोर्ट ने नोट किया कि इन नियमों का शीर्षक ‘करियर एडवांसमेंट स्कीम’ है और ये मुख्य रूप से मौजूदा असिस्टेंट प्रोफेसरों और एसोसिएट प्रोफेसरों की पदोन्नति से संबंधित हैं।
कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“ये रेगुलेशन ‘भर्ती नियम’ (Recruitment Rules) नहीं हैं, बल्कि ‘पदोन्नति और प्रगति नियम’ (Promotion and Progression Rules) हैं… इसलिए, इन रेगुलेशन के प्रावधान तार्किक रूप से उस व्यक्ति पर लागू नहीं हो सकते जो अभी तक उस प्रणाली का हिस्सा नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उम्मीदवार खुली प्रतिस्पर्धी भर्ती में एक आकांक्षी थीं, न कि करियर एडवांसमेंट स्कीम के तहत पदोन्नति चाहने वाली कोई मौजूदा कर्मचारी। पीठ ने कहा:
“आयोग द्वारा राज्य नियमों के तहत आयोजित इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रोफेसरों की भर्ती में भाग लेने वाले उम्मीदवार पर AICTE रेगुलेशन लागू करना, इन नियमों के पाठ, संदर्भ और उद्देश्य से परे जाना होगा। कानून उस विनियमन को ‘द्वार’ (Gate) के रूप में उपयोग करने की अनुमति नहीं देता जिसे ‘सीढ़ी’ (Ladder) के रूप में तैयार किया गया है।”
एस्टोपेल का मुद्दा
कोर्ट ने चयन प्रक्रिया में भाग लेने के बाद उसे चुनौती देने के संबंध में स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया। अनुपाल सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2020) 2 SCC 173 के मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह एक स्थापित सिद्धांत है कि चयन प्रक्रिया में बिना किसी विरोध के भाग लेने वाला उम्मीदवार, असफल घोषित होने के बाद खेल के नियमों (Rules of the game) को चुनौती नहीं दे सकता।”
पीठ ने माना कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यह मानकर गलती की कि उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को चुनौती देने से बाधित नहीं थीं।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि AICTE रेगुलेशन और राज्य नियम अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करते हैं, इसलिए एक के दूसरे पर हावी होने का प्रश्न ही नहीं उठता। कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और 2015 के विज्ञापन के अनुसरण में आयोग द्वारा आयोजित भर्ती को बरकरार रखा।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की:
“2015 में पूरी हो चुकी भर्ती को 2025 में उन रेगुलेशन के आधार पर फिर से नहीं खोला जा सकता जो उस पर कभी लागू ही नहीं हुए थे।”
तदनुसार, हाईकोर्ट की खंडपीठ का 20 अगस्त, 2025 का आदेश रद्द कर दिया गया।
मामले का विवरण:
केस टाइटल: गुजरात लोक सेवा आयोग बनाम ज्ञानेश्वरी दुष्यंतकुमार शाह और अन्य
केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (@SLP (C) नंबर 27710/2025)
पीठ: जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे

