दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि मकान मालिक बेदखली याचिका (Eviction Petition) के लंबित रहने के दौरान अपनी किसी अन्य खाली संपत्ति को खुद इस्तेमाल करने के बजाय किराए पर चढ़ा देता है, तो उसकी ‘वास्तविक आवश्यकता’ (Bona fide requirement) का दावा संदेहास्पद हो जाता है। न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने मकान मालिकों द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज करते हुए निचली अदालत (Additional Rent Controller – ARC) के फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि मकान मालिक अपनी वास्तविक जरूरत साबित करने में विफल रहे हैं, क्योंकि उन्होंने एक तरफ जगह की कमी का हवाला दिया, वहीं दूसरी तरफ अपनी नवनिर्मित संपत्ति को किराए पर दे दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता (मकान मालिकों) ने प्रतिवादी (किरायेदार) के खिलाफ D-45, प्रथम तल, जाकिर नगर (पश्चिम), जामिया नगर, ओखला, नई दिल्ली स्थित संपत्ति को खाली कराने के लिए दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 की धारा 14(1)(e) के तहत याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि उनका परिवार बड़ा है (27 से अधिक सदस्य) और उन्हें रहने के लिए इस परिसर की सख्त जरूरत है। इसके अलावा, उन्होंने यह भी दावा किया कि संपत्ति जर्जर हालत में है और इसे तत्काल मरम्मत की आवश्यकता है।
किरायेदार ने धारा 25B के तहत ‘लीव टू डिफेंड’ (Leave to defend) की मांग करते हुए तर्क दिया कि मकान मालिकों ने अपनी अन्य संपत्तियों (संपत्ति संख्या O-405 और 414) का खुलासा नहीं किया है। किरायेदार ने आरोप लगाया कि जिस संपत्ति (D-45) में विवादित परिसर स्थित है, वहां पहले से ही पांच कमरे खाली पड़े हैं जिनका उपयोग मकान मालिक नहीं कर रहे हैं।
साकेत कोर्ट्स के विद्वान अतिरिक्त किराया नियंत्रक (ARC) ने 2 सितंबर, 2019 को मकान मालिकों की याचिका खारिज कर दी थी। ARC ने माना था कि मकान मालिक यह बताने में विफल रहे कि उन्होंने खाली पड़े पांच कमरों का उपयोग क्यों नहीं किया और नवनिर्मित संपत्ति संख्या 414 को खुद इस्तेमाल करने के बजाय किराए पर क्यों दिया।
कोर्ट के समक्ष दलीलें
मकान मालिकों का पक्ष: मकान मालिकों की ओर से दलील दी गई कि उनके परिवार का आकार काफी बढ़ गया है, जिसे किरायेदार ने जिरह के दौरान स्वीकार भी किया था। उन्होंने यह भी कहा कि ARC ने स्ट्रक्चरल इंजीनियर की रिपोर्ट पर गौर नहीं किया, जो संपत्ति की जर्जर स्थिति को दर्शाती थी। संपत्ति संख्या 414 के बारे में उनका कहना था कि किरायेदार ने ‘लीव टू डिफेंड’ पर बहस के दौरान इस मुद्दे पर जोर नहीं दिया था।
किरायेदार का पक्ष: दूसरी ओर, किरायेदार के वकील ने तर्क दिया कि मकान मालिकों ने 2011 में दायर अपनी पिछली बेदखली याचिका वापस ले ली थी और उसके मात्र पांच दिन बाद ही मौजूदा याचिका दायर कर दी। उन्होंने बताया कि मकान मालिक नंबर 1 (PW-1) ने अपनी गवाही में स्वीकार किया है कि 2015 में संपत्ति संख्या 414 का निर्माण पूरा होने के तुरंत बाद उसके छह फ्लैटों को किराए पर दे दिया गया था, जबकि उस समय उनकी पिछली बेदखली याचिका लंबित थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि मकान मालिकों ने पिछली याचिका 1 अगस्त, 2016 को वापस ली और 6 अगस्त, 2016 को नई याचिका दायर कर दी।
खाली कमरों और अन्य संपत्ति पर कोर्ट की टिप्पणी: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने मकान मालिकों के दावों में विरोधाभास पाया। कोर्ट ने कहा:
“परिवार के आकार से परे, यह स्वीकार्य तथ्य है कि संपत्ति संख्या D-45 में पांच कमरे खाली थे, लेकिन उनमें से किसी ने भी कभी उन पर कब्जा नहीं किया… साथ ही, उस समय नवनिर्मित संपत्ति संख्या 414 को पिछली बेदखली याचिका के लंबित रहने के दौरान अन्य किरायेदारों को किराए पर दे दिया गया था।”
संपत्ति को किराए पर देने का मुद्दा: हाईकोर्ट ने संपत्ति संख्या 414 को किराए पर देने के तथ्य को अत्यंत महत्वपूर्ण माना। निर्णय में कहा गया:
“संपत्ति संख्या 414 को किराए पर देना अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि इसका निर्माण 2015 में पूरा हुआ था और इसमें छह फ्लैट तुरंत मकान मालिकों द्वारा किराए पर दे दिए गए थे, जब धारा 14(1)(e) के तहत उनकी पिछली बेदखली याचिका अभी भी लंबित थी… पिछली याचिका वापस लेने के पांच दिनों की छोटी अवधि के भीतर दूसरी संपत्ति के संबंध में नई बेदखली याचिका दायर करना संदेह पैदा करता है।”
मकान मालिकों ने तर्क दिया था कि उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए फ्लैट किराए पर दिए थे, लेकिन कोर्ट ने पाया कि इसके समर्थन में कोई सबूत या किराए की रसीदें पेश नहीं की गईं।
हाईकोर्ट ने बी.आर. आनंद बनाम प्रेम सागर के मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई मकान मालिक अपने दावों को साबित करने में असमर्थ रहता है, तो बेदखली याचिका खारिज होने योग्य है। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मकान मालिकों द्वारा खड़ा किया गया पूरा मामला संदेह के घेरे में है।
नतीजतन, हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया और विद्वान ARC के फैसले में कोई त्रुटि नहीं पाई।
केस विवरण:
- केस टाइटल: मोहम्मद अख्तर और अन्य बनाम अब्दुल रेहान
- केस नंबर: RC.REV. 43/2020
- कोरम: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी

