पंजीकृत स्वामी को सुने बिना आदेश पारित करना न्याय का उल्लंघन; दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्क्रांत संपत्ति विवाद को पुनः सुनवाई के लिए भेजा

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश (Single Judge) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक संपत्ति के ‘निष्क्रांत संपत्ति’ (Evacuee Property) के रूप में निहित होने को अमान्य घोषित किया गया था। न्यायालय ने कहा कि एकल न्यायाधीश ने प्रभावित खरीदार को सुनवाई का अवसर दिए बिना और निष्क्रांत व्यक्ति की पहचान से जुड़े जटिल तथ्यात्मक विवादों की पर्याप्त जांच किए बिना यह निर्णय लिया था।

न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने अपीलकर्ता नीलम आर्या द्वारा दायर ‘लेटर्स पेटेंट अपील’ (LPA) को स्वीकार करते हुए मामले को गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से निर्णय के लिए एकल न्यायाधीश के पास वापस भेज दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अपीलकर्ता को एक आवश्यक पक्षकार के रूप में मामले में शामिल किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद दिल्ली के चंदन होला गांव में स्थित भूमि से संबंधित है, जिसकी जड़ें विभाजन के बाद के दौर से जुड़ी हैं। ‘एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ इवैक्यू प्रॉपर्टी (चीफ कमिश्नर्स प्रोविंसेस) ऑर्डिनेंस, 1949’ के तहत, 16 जून 1949 को एक अधिसूचना जारी की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप कई संपत्तियां स्वचालित रूप से कस्टोडियन में निहित हो गई थीं।

21 जुलाई 1961 को, एक सक्षम अधिकारी ने घोषित किया कि चूंकि गैर-निष्क्रांत हिस्से के संबंध में कोई दावा नहीं किया गया था, इसलिए संपत्ति पूरी तरह से कस्टोडियन में निहित हो गई। दशकों बाद, 23 फरवरी 1981 को, केंद्र सरकार ने ‘विस्थापित व्यक्ति (मुआवजा और पुनर्वास) अधिनियम, 1954’ के तहत यह भूमि श्री गुरबख्श सिंह को आवंटित की।

प्रतिवादीगण, जो शफेद खान के वारिस होने का दावा करते थे, ने 1981 में इस निहित प्रक्रिया को चुनौती दी और ‘एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ इवैक्यू प्रॉपर्टी एक्ट, 1950’ की धारा 27 के तहत एक पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) दायर की। कस्टोडियन जनरल ने 29 जून 1982 को इस याचिका को खारिज कर दिया, यह पाते हुए कि प्रतिवादियों के पूर्वज वही “शफेद खान” नहीं थे जिनका नाम राजस्व रिकॉर्ड में निष्क्रांत सूची से बाहर रखा गया था।

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इसके बाद प्रतिवादियों ने एक रिट याचिका (W.P.(C) No. 2385/1982) दायर की। इस याचिका के लंबित रहने के दौरान, मूल आवंटी गुरबख्श सिंह का निधन हो गया। अपीलकर्ता नीलम आर्या ने 15 दिसंबर 1992 को पंजीकृत बिक्री विलेख (Sale Deeds) के माध्यम से उनके वारिसों से यह संपत्ति खरीदी और आवश्यक मंजूरी प्राप्त करने के बाद वहां एक फार्महाउस का निर्माण किया।

2009 में, एकल न्यायाधीश ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए कस्टोडियन के आदेश को रद्द कर दिया। अपीलकर्ता ने इस निर्णय को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि पंजीकृत स्वामी होने के बावजूद उन्हें कभी नहीं सुना गया।

दलीलें

अपीलकर्ता का पक्ष: अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि आक्षेपित आदेश नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन करते हुए पारित किए गए थे, क्योंकि अपीलकर्ता को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था। यह भी कहा गया कि प्रतिवादियों ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया, जिसमें अपीलकर्ता का स्वामित्व और भूमि पर किया गया निर्माण शामिल है। यह भी तर्क दिया गया कि प्रतिवादियों ने निहित होने की तारीख से 32 साल की देरी के बाद अधिकारियों से संपर्क किया था। अपीलकर्ता ने “शफेद खान” की पहचान के संबंध में एक बुनियादी विवाद को भी उजागर किया और कहा कि प्रतिवादियों के पूर्वज का पितृत्व और मृत्यु प्रमाण पत्र ऐतिहासिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते हैं।

प्रतिवादियों का पक्ष: प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विषयगत भूमि कभी भी कानूनी रूप से निष्क्रांत संपत्ति के रूप में निहित नहीं हुई थी क्योंकि इसे 16 जून 1949 की अधिसूचना द्वारा बाहर रखा गया था। उनका कहना था कि गुरबख्श सिंह को किया गया आवंटन इस क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि के कारण शुरू से ही शून्य (void ab initio) था। पहचान के मुद्दे पर, उन्होंने तर्क दिया कि “शफेद खान पुत्र घिसा” और “शफेद खान पुत्र भोसन” के बीच का अंतर केवल तकनीकी था और एकल न्यायाधीश ने उन्हें सही रूप में एक ही व्यक्ति माना था।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

खंडपीठ ने कहा कि इस मुकदमेबाजी में सभी पक्षों के अधिकारों को संतुलित करते हुए एक “समग्र और व्यावहारिक दृष्टिकोण” की आवश्यकता है। न्यायालय ने एकल न्यायाधीश के समक्ष कार्यवाही में कई गंभीर त्रुटियों की पहचान की:

  1. नैसर्गिक न्याय का उल्लंघन: कोर्ट ने नोट किया कि अपीलकर्ता ने सरकार के एक आवंटी के कानूनी वारिसों से पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से संपत्ति खरीदी थी। पीठ ने कहा:
    “विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा 2009 में पारित मूल आदेश अपीलकर्ता को सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया था, जो नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है… विद्वान एकल न्यायाधीश ने अपीलकर्ता को सुनवाई का अवसर दिए बिना एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण (Quasi-judicial Authority) के आदेशों को रद्द कर दिया, जिससे वह उपचारहीन हो गईं…”
  2. तथ्यात्मक विवादों की अनदेखी: कोर्ट ने कहा कि एकल न्यायाधीश ने इस तथ्यात्मक विसंगति को नजरअंदाज कर दिया कि प्रतिवादी अपने पूर्वज को ‘शफेद खान पुत्र घिसा’ बताते हैं, जबकि ऐतिहासिक अधिसूचनाओं में ‘शफेद खान पुत्र भोसन’ की भूमि को बाहर रखा गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
    “विद्वान एकल न्यायाधीश ने पितृत्व में इस तथ्यात्मक विसंगति को नजरअंदाज कर दिया और उन्हें एक ही व्यक्ति मान लिया। पहचान का ऐसा विवाद ही प्रतिवादियों (रिट याचिकाकर्ताओं) के दावे की वास्तविकता पर संदेह पैदा करता है।”
  3. विलंब: पीठ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि प्रतिवादियों ने 1949 में भूमि निहित होने के 32 साल बाद पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।
  4. मृत्यु तिथि में विसंगति: कोर्ट ने नोट किया कि 1981 का एक संशोधित मृत्यु प्रमाण पत्र इंगित करता है कि शफेद खान की मृत्यु 1952 में हुई थी, जबकि प्रतिवादी दावा करते हैं कि उनकी मृत्यु 1955 में हुई थी। पीठ ने कहा कि इन “अत्यधिक विवादित तथ्यात्मक प्रश्नों” का निर्णय एकल न्यायाधीश ने पर्याप्त जांच के बिना सारांश कार्यवाही (summary proceedings) में कर दिया।
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निर्णय

खंडपीठ ने माना कि एकल न्यायाधीश ने साक्ष्यों की पूरी सराहना और प्रभावित पक्ष की भागीदारी के बिना जटिल तथ्यात्मक विवादों का निर्णय करने में त्रुटि की है।

कोर्ट ने निर्णय दिया:

“निष्क्रांत की पहचान, निहित होने का समय और बाद के शीर्षकों (titles) का खुलासा न करना इस मामले के समाधान के लिए केंद्रीय विषय हैं।”

तदनुसार, हाईकोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए 26 फरवरी 2009, 22 जनवरी 2010 और 7 जनवरी 2013 के आक्षेपित आदेशों को रद्द कर दिया। मामले को एकल न्यायाधीश के पास वापस (Remit) भेज दिया गया है ताकि वे अपीलकर्ता को प्रतिवादी के रूप में शामिल करने और उनका जवाब दाखिल करने का अवसर देने के बाद डब्ल्यूपी (सी) संख्या 2385/1982 पर नए सिरे से निर्णय ले सकें।

पक्षकारों को 5 फरवरी 2026 को रोस्टर बेंच के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।

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केस विवरण:

  • केस टाइटल: नीलम आर्या बनाम दीन मोहम्मद (मृतक) और अन्य
  • केस नंबर: एलपीए 114/2013 (LPA 114/2013)
  • कोरम: न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति तेजस कारिया

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