कलकत्ता हाईकोर्ट: अधिकार क्षेत्र के बिना पारित अपीलीय आदेश को वापस लेना सही, नई अपील लंबित रहने तक रोकी जा सकती है पदोन्नति

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल लघु उद्योग विकास निगम लिमिटेड (WBSIDCL) के निदेशक मंडल (Board of Directors) द्वारा एक कर्मचारी पर लगाए गए दंड को रद्द करने वाले अपीलीय आदेश को वापस लेने के निर्णय को सही ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूल अपीलीय आदेश एक ऐसे अधिकारी द्वारा पारित किया गया था जिसके पास इसका अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं था, इसलिए वह आदेश कानून की नजर में शून्य (Nullity) है। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने वैधानिक अपील की नई सुनवाई लंबित रहने तक कर्मचारी की पदोन्नति को स्थगित (Abeyance) रखने के निर्णय को भी उचित माना है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, देबंजन गुहा, WBSIDCL में असिस्टेंट मैनेजर-II के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2017 में एक संविदा कर्मचारी द्वारा उच्च अधिकारियों के खिलाफ धमकियां देने और अपमानजनक भाषा का उपयोग करने की शिकायत के बाद उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी। 31 मार्च, 2018 को अनुशासनात्मक प्राधिकारी (प्रबंध निदेशक) ने दंड के रूप में दो साल के लिए उनके वेतन को दो स्तर नीचे कर दिया, जिसका प्रभाव संचयी (Cumulative effect) था।

याचिकाकर्ता ने WBSIDCL (स्टाफ विनियम) के विनियम 50 के तहत वैधानिक अपील दायर की। 13 जुलाई, 2020 को कार्यकारी निदेशक-I ने अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक की सहमति से अपील स्वीकार करते हुए दंड को रद्द करने का आदेश जारी किया। इस आदेश को लागू किया गया और याचिकाकर्ता का वेतन बहाल कर दिया गया।

हालांकि, 2022 में पदोन्नति प्रक्रिया के दौरान, जब याचिकाकर्ता ने असिस्टेंट मैनेजर-I के पद के लिए मेरिट सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त किया, तो निदेशक मंडल ने एक प्रक्रियात्मक अनियमितता पाई। अपनी 362वीं बैठक में, बोर्ड को सूचित किया गया कि कार्यकारी निदेशक के पास अपील का निपटारा करने का कोई अधिकार नहीं था। नतीजतन, बोर्ड ने दंड रद्द करने वाले आदेश को वापस लेने (Recall) का संकल्प लिया और अपील की नए सिरे से सुनवाई के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नियुक्त किया। इसके बाद, चयन समिति ने याचिकाकर्ता की पदोन्नति को टाल दिया।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री इंद्रनील रॉय ने तर्क दिया कि 13 जुलाई, 2020 का अपीलीय आदेश अंतिम रूप ले चुका था और इसे पूरी तरह से लागू भी किया जा चुका था। उन्होंने कहा कि स्टाफ विनियमों में अपीलीय आदेश की समीक्षा (Review) या पुनरीक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के हरियाणा स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम मवासी के फैसले का हवाला देते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि स्पष्ट वैधानिक प्रावधान के बिना कोई भी अर्ध-न्यायिक या प्रशासनिक प्राधिकारी अपने स्वयं के आदेश की समीक्षा नहीं कर सकता है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि मेरिट में स्थान पाने के बावजूद उन्हें पदोन्नति से वंचित करने के लिए दुर्भावनापूर्ण तरीके से मामले को दोबारा खोला गया है।

प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एन. सी. बेहूनी ने तर्क दिया कि विनियम 50(iii) के तहत, अपीलों की सुनवाई बोर्ड द्वारा निर्धारित प्राधिकारी द्वारा ही की जानी चाहिए। 1985 की एक बैठक में, बोर्ड ने संकल्प लिया था कि निदेशक मंडल स्वयं अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य करेगा। इसलिए, कार्यकारी निदेशक के पास अपील सुनने का अधिकार नहीं था, जिससे उनका आदेश आरंभ से ही शून्य (void ab initio) हो गया। प्रतिवादियों ने कहा कि अधिकार क्षेत्र की त्रुटि को किसी भी स्तर पर सुधारा जा सकता है और बोर्ड को वास्तविक गलती सुधारने का अधिकार है।

कोर्ट का विश्लेषण

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न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी ने पाया कि मुख्य मुद्दा यह था कि क्या बोर्ड द्वारा कार्यकारी निदेशक के आदेश को वापस लेना और नई सुनवाई का निर्देश देना उचित था।

कोर्ट ने विनियम 50(iii) और 1985 के बोर्ड प्रस्ताव का उल्लेख किया, जिसमें यह अनिवार्य किया गया था कि निदेशक मंडल ही अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य करेगा। कोर्ट ने नोट किया कि कार्यकारी निदेशक के पास “अपील का निपटारा करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था।”

टेलर बनाम टेलर और नजीर अहमद बनाम किंग एम्परर में स्थापित सिद्धांत का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि “जहां किसी कानून द्वारा कोई कार्य एक निश्चित तरीके से करने की शक्ति दी गई है… तो वह कार्य उसी तरीके से किया जाना चाहिए या बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए।”

न्यायमूर्ति चटर्जी ने कहा कि 13 जुलाई, 2020 का आदेश शून्य (Nullity) था। कोर्ट ने समीक्षा (Review) की शक्ति और अधिकार क्षेत्र के बिना पारित आदेश को वापस लेने (Recall) की शक्ति के बीच अंतर स्पष्ट किया। बुधिया स्वाइन बनाम गोपीनाथ देब मामले पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने कहा:

“यह स्वीकार्य है कि जहां एक प्राधिकारी आमतौर पर विशिष्ट वैधानिक प्रावधान के अभाव में अपने स्वयं के आदेश की समीक्षा नहीं कर सकता है, वहीं उसके पास उस आदेश को वापस लेने की शक्ति होती है जो अधिकार क्षेत्र की कमी के कारण शून्य है।”

एस्टोपेल (Estoppel) पर याचिकाकर्ता के तर्क को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने कहा:

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“अधिकार क्षेत्र की कमी वाले प्राधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई राज्य पर बाध्यकारी नहीं होती है… और परिणामस्वरूप, राज्य को… ऐसे आदेश को वापस लेने से रोका नहीं जा सकता है।”

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि दंड रद्द करने वाला आदेश शून्य था, इसलिए उससे मिलने वाले सभी बाद के लाभ अस्थिर थे। इसलिए, आदेश को वापस लेने में बोर्ड ने कोई गलती नहीं की।

पदोन्नति के संबंध में, कोर्ट ने कहा:

“चूंकि वैधानिक अपील, जो अनुशासनात्मक कार्यवाही की निरंतरता है, विचाराधीन है, इसलिए याचिकाकर्ता की पदोन्नति को स्थगित रखने के निर्णय… में कोई गलती नहीं पाई जा सकती।”

फैसला

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिससे अपील की दोबारा सुनवाई के बोर्ड के निर्णय और पदोन्नति रोकने के चयन समिति के निर्णय को वैधता मिली। फैसले पर रोक लगाने की याचिकाकर्ता की बाद की प्रार्थना को भी अस्वीकार कर दिया गया।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: देबंजन गुहा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य
  • केस नंबर: डब्ल्यूपीए 21881 ऑफ 2022
  • कोरम: न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री इंद्रनील रॉय, श्री सुनीत कुमार रॉय, सुश्री सुष्मिता मंडल
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री एन. सी. बेहूनी (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री कमल कुमार चट्टोपाध्याय, सुश्री रिमी चटर्जी

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