दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने हत्या के प्रयास के एक मामले में आरोपी को नियमित जमानत देते हुए स्पष्ट किया कि केवल घटनास्थल के आसपास घूमते हुए देखा जाना अपराध में संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
जस्टिस गिरीश कठपालिया की पीठ ने यह आदेश पारित करते हुए जांच अधिकारी (IO) और थाना प्रभारी (SHO) के अदालत में उपस्थित न होने पर स्थानीय पुलिस को कड़ी फटकार भी लगाई।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता संदीप उर्फ चमन ने वजीराबाद पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 490/2025 के संबंध में नियमित जमानत की मांग की थी। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109(1)/3(5) (हत्या का प्रयास और संयुक्त दायित्व) और आर्म्स एक्ट की धाराओं 25/27 के तहत दर्ज किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 1 जुलाई, 2025 को रात करीब 02:00 बजे हुई। शिकायतकर्ता का आरोप था कि घर के बाहर शोर सुनकर वह बालकनी में आया, जहां उसने सह-आरोपी शिबू को पिस्तौल के साथ खड़े देखा। आरोप है कि शिबू ने जान से मारने की नियत से शिकायतकर्ता पर दो गोलियां चलाईं, लेकिन वह बाल-बाल बच गया।
पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट में दावा किया गया कि जांच के दौरान शिकायतकर्ता और उसकी बेटी ने बताया कि शिबू एक अन्य लड़के के साथ आया था, जिसकी पहचान संदीप (आरोपी) के रूप में हुई। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए कहा कि “दो लड़के शिकायतकर्ता के घर के पास घूम रहे थे, जिनकी पहचान शिबू और उसके दोस्त संदीप के रूप में की गई।”
दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री प्रमोद कुमार ने तर्क दिया कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है। उन्होंने अदालत को बताया कि इसी मामले में एक अन्य सह-आरोपी ईशांत, जिस पर संदीप जैसा ही आरोप था, को हाईकोर्ट द्वारा 8 जनवरी, 2026 को जमानत दी जा चुकी है।
राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) श्री संजीव सभरवाल ने सीसीटीवी फुटेज और शिकायतकर्ता द्वारा की गई पहचान के आधार पर जमानत का विरोध किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
1. पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी
सुनवाई की शुरुआत में ही अदालत ने जांच अधिकारी (SI हीरा लाल) और SHO (इंस्पेक्टर अमित कुमार) की अनुपस्थिति पर गंभीर संज्ञान लिया। अदालत ने पाया कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद कि यदि IO छुट्टी पर है तो SHO को केस फाइल के साथ आना चाहिए, अभियोजक की सहायता के लिए केवल एक सब-इंस्पेक्टर (SI रेणु) को भेजा गया।
जस्टिस कठपालिया ने टिप्पणी की:
“इसकी अब कड़ी निंदा की जानी चाहिए। जांच अधिकारी या एसएचओ की अनुपस्थिति में जमानत मामलों को स्थगित करना निश्चित रूप से गलत होगा, क्योंकि इससे आरोपी की हिरासत अवधि ही बढ़ेगी… किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे को असंवेदनशीलता से नहीं संभाला जा सकता।”
अदालत ने आदेश की एक प्रति पुलिस आयुक्त (Commissioner of Police) को सूचना और आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने का निर्देश दिया।
2. सीसीटीवी फुटेज की जांच
सुनवाई के दौरान, जब अदालत ने सीसीटीवी फुटेज मांगी, तो पहले बताया गया कि वह एफएसएल (FSL) के पास है। हालांकि, बाद में आदेश लिखवाते समय मोबाइल फोन पर फुटेज दिखाई गई।
फुटेज देखने के बाद अदालत ने कहा:
“उक्त सीसीटीवी फुटेज में कोई स्पष्ट चेहरा दिखाई नहीं दे रहा है।”
3. केवल घटनास्थल के पास घूमना अपराध नहीं
आरोपी के खिलाफ मुख्य आरोप पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल मौका-ए-वारदात के पास उपस्थिति किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने का आधार नहीं हो सकती।
अदालत ने अपने आदेश में कहा:
“जो भी हो, केवल इसलिए कि आरोपी/याचिकाकर्ता को घटनास्थल के पास के क्षेत्र में घूमते हुए देखा गया था, यह उसकी अपराध में इतनी संलिप्तता नहीं दर्शाता कि उसकी स्वतंत्रता में कटौती की जाए।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता ने अपनी मूल शिकायत में सह-आरोपी शिबू के साथ किसी और की मौजूदगी का जिक्र तक नहीं किया था।
फैसला
मामले की समग्र परिस्थितियों और इस तथ्य को देखते हुए कि सह-आरोपी ईशांत को पहले ही जमानत मिल चुकी है, हाईकोर्ट ने जमानत याचिका स्वीकार कर ली।
अदालत ने संदीप उर्फ चमन को निचली अदालत की संतुष्टि के लिए 10,000 रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि की एक जमानती पेश करने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: संदीप उर्फ चमन बनाम स्टेट ऑफ एनसीटी दिल्ली एवं अन्य
- केस नंबर: Bail Appln. 176/2026 & Crl.M.A. 1497/2026
- कोरम: जस्टिस गिरीश कठपालिया

