नाबालिग के साथ प्राइवेट पार्ट रगड़ना ‘गंभीर यौन हमला’ है, ‘पेनिट्रेटिव हमला’ नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने डॉक्टर की सजा 10 साल से घटाकर 7 साल की

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी नाबालिग के शरीर के साथ अपने प्राइवेट पार्ट को रगड़ना (Rubbing), बिना पेनेट्रेशन (Penetration) के, पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत ‘गंभीर पेनिट्रेटिव यौन हमला’ (Aggravated Penetrative Sexual Assault) नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इसे धारा 9(m) के तहत ‘गंभीर यौन हमला’ (Aggravated Sexual Assault) करार दिया है।

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने 9 साल की बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न के आरोपी एक डॉक्टर की सजा को संशोधित करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि आरोपी डॉक्टर ‘विश्वास और अधिकार’ (Position of Authority and Trust) के पद पर था, जिसका उसने दुरुपयोग किया, इसलिए किसी भी प्रकार की नरमी की गुंजाइश नहीं है। हालांकि, कानूनी प्रावधानों के तहत अपराध की प्रकृति बदलने के कारण उसकी सजा को 10 साल से घटाकर 7 साल के कठोर कारावास में बदल दिया गया।

मामले का संक्षिप्त विवरण

यह अपील साकेत कोर्ट स्थित विशेष पॉक्सो अदालत के 17 जनवरी, 2025 के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। निचली अदालत ने आरोपी मधु सुधन दत्त को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 342 और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने सबूतों का पुनर्मूल्यांकन करने के बाद पाया कि पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत ‘पेनिट्रेटिव यौन हमले’ के आवश्यक तत्व इस मामले में पूरे नहीं होते हैं। नतीजतन, दोषसिद्धि को धारा 6 से बदलकर धारा 9(m) कर दिया गया।

केस की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 28 जून 2016 की है। पीड़िता (9 वर्ष) अपनी छोटी बहन के लिए दवा लेने आरोपी के क्लिनिक गई थी, जिसे लोग ‘बंगाली डॉक्टर’ कहते थे। कुछ देर बाद पीड़िता की मां (PW7) भी वहां पहुंची। उन्होंने देखा कि क्लिनिक का शटर आधा खुला था और पर्दे लगे हुए थे।

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पीड़िता की मां ने जब अंदर देखा, तो पाया कि आरोपी उनकी बेटी के ऊपर लेटा हुआ था और उसने अपने अंडरगारमेंट्स नीचे कर रखे थे। बाद में बच्ची ने बताया कि डॉक्टर ने उसके कपड़े उतार दिए थे और अपने शरीर को उसके शरीर से रगड़ रहा था। इस आधार पर पुलिस ने धारा 342, 376 IPC और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (आरोपी) का तर्क: बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत संतोषजनक नहीं हैं और गवाहों के बयानों में विरोधाभास है। मुख्य तर्क मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट (MLC) को लेकर था। बचाव पक्ष का कहना था कि जिस डॉक्टर ने पीड़िता की जांच की थी, उसे कोर्ट में गवाही के लिए पेश नहीं किया गया, इसलिए एमएलसी (Ext. PW5/B) को कानूनन साबित नहीं माना जा सकता।

इसके अलावा, यह भी कहा गया कि यदि अभियोजन की कहानी मान भी ली जाए, तो भी पेनेट्रेशन का कोई ठोस सबूत नहीं है। इसलिए यह मामला ज्यादा से ज्यादा पॉक्सो एक्ट की धारा 7 (यौन हमला) के तहत आता है, न कि धारा 6 के तहत।

अभियोजन पक्ष का तर्क: राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने कहा कि पीड़िता (PW1) की गवाही की पुष्टि उसकी मां (PW7) और पड़ोसियों के बयानों से होती है। एमएलसी के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि मूल डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे और उनके हस्ताक्षर की पहचान एक अन्य गवाह (PW5) द्वारा की गई है, जो वैध है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

1. एमएलसी की स्वीकार्यता (मूल डॉक्टर की अनुपस्थिति में): हाईकोर्ट ने एमएलसी तैयार करने वाले डॉ. एम. संदीप की गवाही न होने के मुद्दे पर विचार किया। एम्स के रिकॉर्ड क्लर्क (PW5) ने गवाही दी थी कि डॉ. संदीप अस्पताल छोड़ चुके हैं और उनका पता अज्ञात है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

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“PW5 की यह गवाही कि पीड़िता की जांच करने वाला डॉक्टर उपलब्ध नहीं था, को चुनौती नहीं दी गई है। इसलिए, अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत अपेक्षित परिस्थितियों को स्थापित कर दिया है… ऐसी स्थिति में, उनका बयान धारा 32(2) के तहत प्रासंगिक हो जाता है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी डॉक्टर को बिना अनुचित देरी के बुलाना संभव न हो, तो उनके द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को उस व्यक्ति के माध्यम से साबित किया जा सकता है जो उनके हस्तलेख/हस्ताक्षर से परिचित हो।

2. पेनेट्रेशन बनाम यौन हमला: कानूनी विवाद का मुख्य बिंदु यह था कि क्या यह कृत्य ‘पेनिट्रेटिव यौन हमला’ (Penetrative Sexual Assault) था। कोर्ट ने पीड़िता की मां की एफआईआर (FIS) और पीड़िता के धारा 164 के बयान की जांच की।

  • FIS: इसमें कहा गया था कि आरोपी “मेरे शरीर से रगड़ने लगा”
  • धारा 164 बयान: इसमें पेनेट्रेशन का कोई जिक्र नहीं था।
  • कोर्ट में गवाही: पीड़िता ने कोर्ट में कहा कि आरोपी ने अपना प्राइवेट पार्ट उसके पार्ट में डाला था।

कोर्ट ने नोट किया कि पेनेट्रेशन की बात बाद में जोड़ी गई लगती है। कोर्ट ने कहा:

“PW7 की एफआईआर और PW1 के 164 के बयान में पेनेट्रेशन का कोई मामला नहीं बनता… इसे ज्यादा से ज्यादा आरोपी के लिंग का पीड़िता के जननांगों से रगड़ना माना जा सकता है।”

पॉक्सो एक्ट की धारा 3 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

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“आरोपी के लिंग का पीड़िता के प्राइवेट पार्ट से रगड़ना धारा 3 के क्लॉज (a) से (d) के दायरे में नहीं आता। इसलिए, धारा 3 के तहत पेनिट्रेटिव यौन हमला या धारा 5 के तहत गंभीर पेनिट्रेटिव यौन हमले का मामला नहीं बनता।”

फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि धारा 6 का अपराध स्थापित नहीं होता, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से धारा 7 के तहत यौन हमला साबित होता है। चूंकि पीड़िता की उम्र 12 वर्ष से कम थी, इसलिए यह अपराध पॉक्सो एक्ट की धारा 9(m) (गंभीर यौन हमला) की श्रेणी में आता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस मामले में आरोपी एक डॉक्टर था जिसके पास बच्ची को दवा के लिए भेजा गया था। आरोपी अधिकार और विश्वास (Authority and Trust) के पद पर था, जिसका उसने दुरुपयोग किया… ऐसी परिस्थितियों में, किसी भी नरमी की आवश्यकता नहीं है।”

निष्कर्ष:

  1. दोषसिद्धि में संशोधन: पॉक्सो एक्ट की धारा 6 से बदलकर धारा 9(m) किया गया।
  2. सजा: संशोधित कर 7 साल का कठोर कारावास (इस धारा के तहत अधिकतम सजा) किया गया।
  3. अन्य धाराएं: आईपीसी की धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत सजा और जुर्माना बरकरार रखा गया।
  4. मुआवजा: कोर्ट ने दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि पीड़िता को दो महीने के भीतर मुआवजा वितरित किया जाए।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: मधु सुधन दत्त बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली सरकार)
  • केस नंबर: CRL.A. 649/2025 & CRL.M. (BAIL) 1046/2025
  • कोरम: जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा

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