आरक्षित सूची की समय सीमा समाप्त होने के बाद वेटिंग लिस्ट के उम्मीदवारों को नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि वेटिंग लिस्ट या आरक्षित सूची (Reserve List) में शामिल किसी उम्मीदवार के पास नियुक्ति पाने का कोई अबाध अधिकार (Indefeasible Right) नहीं है, विशेष रूप से तब जब उस सूची की वैधानिक वैधता अवधि (Statutory Validity Period) समाप्त हो चुकी हो। कोर्ट ने यह भी निर्धारित किया कि राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के पास हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने का ‘लोकस स्टैंडी’ (Locus Standi) या अधिकार है, भले ही राज्य सरकार ने उस आदेश को चुनौती न दी हो।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने आरपीएससी (RPSC) द्वारा दायर तीन दीवानी अपीलों को स्वीकार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें चयनित उम्मीदवारों के जॉइन न करने से रिक्त हुए पदों पर आरक्षित सूची के उम्मीदवारों की नियुक्ति या उम्मीदवारी पर विचार करने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला आरपीएससी द्वारा आयोजित तीन अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़ा था:

  1. जूनियर लीगल ऑफिसर (JLO) भर्ती 2019: प्रतिवादी यति जैन, जो आरक्षित सूची में थीं, ने एक चयनित उम्मीदवार (विकास कुमार) के जॉइन न करने पर रिक्त हुए पद पर नियुक्ति की मांग की थी। हाईकोर्ट ने आरपीएससी को आरक्षित सूची से उनका नाम लेने का निर्देश दिया था।
  2. सहायक सांख्यिकी अधिकारी (ASO) भर्ती 2018: प्रतिवादी आकृति सक्सेना ने एक चयनित उम्मीदवार (सुनील मछेरा) द्वारा प्रस्ताव ठुकराने के बाद नियुक्ति की मांग की थी। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को उनकी उम्मीदवारी पर विचार करने का निर्देश दिया था।
  3. जूनियर लीगल ऑफिसर (JLO) भर्ती 2013-14: प्रतिवादी विवेक कुमार मीणा ने एक अनुशंसित उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द होने से उत्पन्न रिक्ति पर नियुक्ति चाही थी। हाईकोर्ट ने उनके मामले पर विचार करने का निर्देश दिया था।

इन तीनों मामलों में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उम्मीदवारों की रिट याचिकाएं स्वीकार कर ली थीं। बाद में, खंडपीठ ने आरपीएससी की अपीलों को मुख्य रूप से इस आधार पर खारिज कर दिया कि चूंकि राजस्थान राज्य ने अपील नहीं की है, इसलिए आरपीएससी की अपीलों में कोई बल नहीं है।

पक्षों की दलीलें

आरपीएससी (अपीलकर्ता) ने तर्क दिया कि खंडपीठ का यह कहना गलत था कि राज्य द्वारा अपील न करने के कारण आयोग अपील नहीं कर सकता। आयोग ने कहा कि एक संवैधानिक संस्था के रूप में उसके अपने स्वतंत्र कर्तव्य हैं। आयोग ने दलील दी कि संबंधित नियमों (राजस्थान लीगल स्टेट एंड सबऑर्डिनेट सर्विसेज रूल्स, 1981 का नियम 24 और राजस्थान एग्रीकल्चर सबऑर्डिनेट सर्विस रूल्स, 1978 का नियम 21) के तहत वेटिंग/आरक्षित सूचियों की अवधि समाप्त हो चुकी थी, इसलिए नियुक्ति का कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता था।

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प्रतिवादियों (रिट याचिकाकर्ताओं) ने तर्क दिया कि आरक्षित सूची का उद्देश्य जॉइन न करने वाले उम्मीदवारों की स्थिति के लिए एक आकस्मिक उपाय (Contingency) के रूप में कार्य करना है। उन्होंने नियमों की ‘उद्देश्यपूर्ण व्याख्या’ (Purposive Interpretation) की मांग करते हुए कहा कि आरक्षित सूची की छह महीने की वैधता रिक्ति उत्पन्न होने या अंतिम नियुक्ति की तारीख से शुरू होनी चाहिए, न कि केवल मूल सूची भेजने की तारीख से। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि रिक्तियों का निर्धारण राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र है, इसलिए आरपीएससी के पास ‘लोकस स्टैंडी’ नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से दो मुद्दों पर विचार किया: आरपीएससी द्वारा अपील की पोषणीयता (Maintainability) और वेटिंग लिस्ट के उम्मीदवारों के अधिकार।

आरपीएससी के लोकस स्टैंडी (Locus Standi) पर कोर्ट ने खंडपीठ के उस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया कि आरपीएससी अपील नहीं कर सकता क्योंकि राज्य ने अपील नहीं की है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 320 का हवाला देते हुए कहा कि राज्य केवल उन उम्मीदवारों को नियुक्त कर सकता है जिनकी सिफारिश आयोग द्वारा की गई हो।

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस दत्ता ने कहा:

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“हमारी सुविचारित राय में, राजस्थान राज्य को वेटिंग लिस्ट से ऐसे उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्देश देना, जिसकी सिफारिश नियुक्ति के लिए नहीं की गई है, अपीलकर्ता (RPSC) को कानूनी दावा पेश करने का वैध आधार देता है।”

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरपीएससी ‘पीड़ित व्यक्ति’ (Person Aggrieved) की श्रेणी में आता है और उसे अपील करने का अधिकार है।

वेटिंग लिस्ट की वैधता और नियुक्ति का अधिकार कोर्ट ने स्थापित कानून को दोहराया कि वेटिंग लिस्ट भर्ती का कोई स्थायी स्रोत नहीं है और यह केवल सीमित अवधि के लिए ही संचालित होती है। विशिष्ट नियमों (नियम 24 और नियम 21) का संदर्भ देते हुए, कोर्ट ने नोट किया कि आरक्षित सूची नियुक्ति प्राधिकारी को मूल सूची भेजे जाने की तारीख से छह महीने के लिए वैध होती है।

कोर्ट ने कहा:

“इस प्रकार, हम यह मानते हैं कि वेटिंग लिस्ट के उम्मीदवार के पास नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं है, और न ही कोई अबाध अधिकार (Indefeasible Right) है, सिवाय तब जब गवर्निंग भर्ती नियम निर्दिष्ट असाधारण परिस्थितियों में वहां से नियुक्तियों को अधिकृत करते हुए एक छोटी विंडो की अनुमति देते हैं… और वह भी तब, जब वेटिंग लिस्ट समाप्त न हुई हो।”

विशिष्ट दावों पर निर्णय

  1. यति जैन: कोर्ट ने पाया कि आरक्षित सूची की वैधता 6 दिसंबर, 2021 (या अधिकतम 6 फरवरी, 2022) को समाप्त हो गई थी। रिक्ति 14 जुलाई, 2022 को नियुक्ति रद्द होने पर उत्पन्न हुई। कोर्ट ने कहा कि 14 जुलाई, 2022 को विकास कुमार की नियुक्ति रद्द होने के बाद यति जैन के पास यह दावा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था कि उनके नाम की सिफारिश की जाए।
  2. आकृति सक्सेना: छह महीने की अवधि फरवरी 2022 में समाप्त हो गई थी, जबकि उन्होंने अप्रैल 2022 में कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने नोट किया कि विभाग ने रिक्ति के लिए आरपीएससी से कभी कोई नाम नहीं मांगा था।
  3. विवेक कुमार मीणा: आरक्षित सूची अगस्त 2016 में समाप्त हो गई थी। कोर्ट ने कहा कि एकल पीठ का विचार करने का निर्देश “स्पष्ट रूप से स्वीकार्य नहीं” था।
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नकारात्मक समानता (Negative Equality) पर प्रतिवादियों ने तर्क दिया था कि आरक्षित सूची से अन्य उम्मीदवारों की सिफारिश समय सीमा समाप्त होने के बाद भी की गई थी। इस दावे को खारिज करते हुए, कोर्ट ने इस सिद्धांत का हवाला दिया कि “कोई भी व्यक्ति भारतीय संविधान के तहत ‘नकारात्मक समानता’ का दावा नहीं कर सकता।” कोर्ट ने कहा:

“आरक्षित सूची में शामिल कुछ उम्मीदवारों की सिफारिश करने में की गई अवैधता को संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए परमादेश (Mandamus) जारी करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला, “हमारी सहानुभूति रिट याचिकाकर्ताओं के साथ है, लेकिन कानून जैसा है, हम यह मानते हैं कि उन्हें उन पदों पर नियुक्त नहीं किया जा सकता जिनके लिए उन्होंने प्रतिस्पर्धा की थी।”

अपने उपसंहार (Epilogue) में, पीठ ने न्यायपालिका को सलाह दी कि वे सेवा नियमों की व्याख्या इस तरह से करें जिससे चयन प्रक्रिया का उद्देश्य पूरा हो और यह सुनिश्चित हो कि नियुक्तियां समय पर पूरी हों।

केस विवरण:

केस शीर्षक: राजस्थान लोक सेवा आयोग, अजमेर बनाम यति जैन व अन्य (और संबद्ध मामले)

केस संख्या: सिविल अपील संख्या 273/2026 [SLP (Civil) No. 20366/2024 से उत्पन्न]

कोरम: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह

वकील: श्री सामंत (अपीलकर्ता के लिए); श्री के. परमेश्वर, वरिष्ठ अधिवक्ता, और श्री रौनक करनपुरिया (प्रतिवादियों के लिए)

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