मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी आवासीय भवन में वकील का कार्यालय (Advocate’s Office) चलाना एक पेशेवर गतिविधि है, न कि व्यावसायिक गतिविधि (Commercial Activity)।
जस्टिस जी.एस. आहलुवालिया की पीठ ने निचली अदालतों के उन निष्कर्षों को खारिज कर दिया, जिनमें मकान मालिक को केवल इसलिए बेदखली की डिक्री देने से मना कर दिया गया था क्योंकि किराए पर दी गई संपत्ति का उपयोग वकील के कार्यालय के रूप में किया जा रहा था, जबकि मकान मालिक ने अपनी आवासीय आवश्यकता के लिए वाद दायर किया था।
हाईकोर्ट ने मकान मालिक (अपीलकर्ता) द्वारा दायर दूसरी अपील को स्वीकार करते हुए मध्य प्रदेश स्थान नियंत्रण अधिनियम, 1961 की धारा 12(1)(ए) और 12(1)(ई) के तहत बेदखली की डिक्री पारित की और प्रतिवादी (जो पेशे से एक वकील हैं) को एक महीने के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता अनिल कुमार कुशवाह (वादी) ने प्रतिवादी अनिल कुमार गुप्ता (प्रतिवादी) के खिलाफ बेदखली और बकाया किराये की वसूली के लिए वाद दायर किया था। विवादित संपत्ति तानसेन रोड, हजीरा, ग्वालियर स्थित एक आवासीय भवन में एक कमरा है।
वादी का कहना था कि प्रतिवादी को 17 अक्टूबर 2001 को 500 रुपये मासिक किराया और 125 रुपये बिजली शुल्क पर किराएदार रखा गया था। वादी ने अपने सबसे छोटे बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए कमरे की वास्तविक आवश्यकता (Bona fide need) और किराये के बकाया भुगतान न करने के आधार पर बेदखली की मांग की थी।
दूसरी ओर, प्रतिवादी ने इन आरोपों का खंडन किया और दावा किया कि किराया केवल 100 रुपये मासिक और 25 रुपये बिजली शुल्क था। उनका कहना था कि वह उस कमरे का उपयोग अपने कार्यालय के रूप में सीमित घंटों के लिए करते हैं।
ट्रायल कोर्ट ने माना था कि वादी की आवश्यकता वास्तविक है और प्रतिवादी किराये के बकाया में है। इसके बावजूद, कोर्ट ने बेदखली की डिक्री देने से इनकार कर दिया, यह तर्क देते हुए कि वाद ‘आवासीय उद्देश्य’ के लिए दायर किया गया था, जबकि परिसर का उपयोग ‘गैर-आवासीय उद्देश्य’ (वकील के कार्यालय) के लिए किया जा रहा था। इसके बाद मामला अपीलीय अदालत में गया, जहाँ प्रतिवादी की अपील पर किराये की दर को कम माना गया, लेकिन बेदखली पर राहत नहीं मिली। अंततः मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
कानूनी सवाल
हाईकोर्ट ने इस मामले में निम्नलिखित प्रमुख कानूनी प्रश्नों पर विचार किया:
- क्या वकील का कार्यालय एक व्यावसायिक गतिविधि है?
- क्या सीपीसी की धारा 96 के तहत किसी निष्कर्ष (Finding) के खिलाफ अपील पोषणीय (Maintainable) है, जब पार्टी के खिलाफ कोई डिक्री पारित नहीं की गई हो?
- क्या निचली अपीलीय अदालत द्वारा किराये की दर के संबंध में ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष को पलटना सही था?
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
वकील का कार्यालय व्यावसायिक नहीं, पेशेवर गतिविधि है कोर्ट ने इस प्रश्न पर विचार करते हुए कि क्या आवासीय भवन में चल रहा वकील का कार्यालय व्यावसायिक गतिविधि है, धीरज सिंह बनाम हेमंत कुमार शर्मा और सुप्रीम कोर्ट के एम.पी. इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम शिव नारायण (2005) के फैसलों का हवाला दिया।
जस्टिस आहलुवालिया ने निर्णय में कहा:
“निर्विवाद तथ्य यह है कि प्रश्नगत कमरा एक आवासीय भवन में स्थित है, न कि किसी व्यावसायिक भवन में… किसी भी तरह की कल्पना से यह नहीं कहा जा सकता है कि आवासीय भवन में स्थित वकील का कार्यालय एक व्यावसायिक गतिविधि है।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत को उद्धृत किया जिसमें कहा गया है कि ‘कॉमर्स’ या ‘कमर्शियल’ शब्द में व्यापारिक गतिविधि की अवधारणा निहित होती है, जिसमें खरीद-फरोख्त शामिल है। लेकिन कानूनी पेशे में ऐसी कोई खरीद-फरोख्त नहीं होती। इसलिए कानूनी पेशे की तुलना व्यापार और व्यवसाय से करना पूरी तरह गलत है।
निष्कर्षों के खिलाफ अपील की पोषणीयता हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 96 का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि अपील केवल ‘डिक्री’ के खिलाफ की जा सकती है, न कि केवल ‘निष्कर्षों’ के खिलाफ। चूँकि ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी के खिलाफ बेदखली की डिक्री पारित नहीं की थी (वाद खारिज कर दिया था), इसलिए प्रतिवादी द्वारा केवल निष्कर्षों के खिलाफ निचली अपीलीय अदालत में दायर अपील पोषणीय नहीं थी। उसे या तो क्रॉस ऑब्जेक्शन दाखिल करना चाहिए था या रिवीजन।
किराये का भुगतान न करना कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी ने निचली अपीलीय अदालत द्वारा निर्धारित कम किराये (125 रुपये प्रतिमाह) का भी भुगतान नहीं किया और इसमें 25 महीने की देरी की। प्रतिवादी ने देरी के लिए माफी (Condonation of delay) का आवेदन दिया था।
इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा:
“यदि प्रतिवादी को कोई तथ्यात्मक भ्रम था… तो उसे स्पष्टीकरण के लिए इस न्यायालय में आवेदन करना चाहिए था, लेकिन स्वयं निर्णय लेकर किराया जमा न करने का फैसला करना एक सद्भावनापूर्ण कारण नहीं कहा जा सकता, विशेष रूप से तब जब प्रतिवादी स्वयं एक अधिवक्ता है।”
कोर्ट ने सयेदा अख्तर बनाम अब्दुल अहद मामले का हवाला देते हुए देरी को माफ करने से इनकार कर दिया।
फैसला
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उन फैसलों को निरस्त कर दिया जिनमें बेदखली से इनकार किया गया था। कोर्ट ने कहा कि भले ही ट्रायल कोर्ट का यह मानना था कि परिसर गैर-आवासीय उद्देश्य के लिए दिया गया था, लेकिन जब किराये की चूक (Section 12(1)(a)) साबित हो गई थी, तो डिक्री दी जानी चाहिए थी।
न्यायालय ने प्रतिवादी को एक महीने के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पेरियाम्मल बनाम वी. राजमणि (2025) के फैसले का हवाला देते हुए निर्देश दिया कि यदि वादी को निष्पादन (Execution) कार्यवाही शुरू करनी पड़ती है, तो निष्पादन न्यायालय को 6 महीने के भीतर उसका निपटारा करना होगा।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: अनिल कुमार कुशवाह बनाम अनिल कुमार गुप्ता
केस नंबर: सेकंड अपील नंबर 235 ऑफ 2010
कोरम: जस्टिस जी.एस. आहलुवालिया
अपीलकर्ता के वकील: श्री अभिषेक सिंह भदौरिया
प्रतिवादी के वकील: श्री विकास सिंघल

