इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आपराधिक रिट याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि आरोप पत्र (Charge Sheet) और संज्ञान आदेश (Cognizance Order) को रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका तब पोषणीय (Maintainable) नहीं है, जब हाईकोर्ट के रोस्टर के अनुसार यह अधिकार क्षेत्र एकल पीठ (Single Judge) के पास हो। न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ल की खंडपीठ ने निर्धारित किया कि एक बार मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान ले लिए जाने के बाद, उपचार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत निहित है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के नियमों के तहत, धारा 528 BNSS के आवेदन एकल पीठ के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, न कि रिट याचिका सुनने वाली खंडपीठ के।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला याचिकाकर्ता संजय वाही और शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) के बीच एक व्यावसायिक विवाद से उत्पन्न हुआ। अभियोजन पक्ष के अनुसार, दोनों पक्ष भूमि विकास से संबंधित साझेदारी में शामिल थे। शिकायतकर्ता का आरोप था कि 16 मार्च 2024 को याचिकाकर्ता को उनके घर बुलाया गया, जहां उनके साथ मारपीट की गई, उन्हें बंधक बनाया गया और 17.5 करोड़ रुपये के चेक पर जबरन हस्ताक्षर कराए गए।
दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 156(3) के तहत आवेदन के बाद, 3 अगस्त 2024 को ग्रेटर नोएडा के थाना बीटा 2 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420, 406, 467, 468, 471, 120-B, 504 और 507 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
याचिकाकर्ता ने शुरू में एफआईआर रद्द करने के लिए रिट याचिका दायर की थी। हालांकि, याचिका के लंबित रहने के दौरान जांच पूरी हो गई और 17 जुलाई 2025 को आरोप पत्र दाखिल किया गया। इसके बाद, 26 अगस्त 2025 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतम बुद्ध नगर ने संज्ञान ले लिया। परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता ने आरोप पत्र और संज्ञान आदेश को चुनौती देने के लिए अपनी याचिका में संशोधन किया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल स्वरूप चतुर्वेदी और दिनेश कुमार गोस्वामी ने तर्क दिया कि विवाद पूरी तरह से दीवानी (Civil) प्रकृति का है, जो साझेदारी समझौते और लाभ के बंटवारे से जुड़ा है। उन्होंने दलील दी कि व्यक्तिगत हिसाब बराबर करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली का दुरुपयोग किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के वेसा होल्डिंग्स (पी) लिमिटेड बनाम केरल राज्य के फैसले का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि “अनुबंध का हर उल्लंघन धोखाधड़ी का अपराध नहीं होता” और इस बात पर जोर दिया कि साझेदारी विलेख में मध्यस्थता (Arbitration) क्लॉज भी मौजूद है।
राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. श्रीवास्तव ने याचिका की पोषणीयता पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि आरोप पत्र दाखिल होने और संज्ञान लिए जाने के बाद, अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की शक्ति सीमित है। उनका कहना था कि संज्ञान आदेश को रद्द करने का उपचार BNSS की धारा 528 (पूर्व में Cr.P.C. की धारा 482) के तहत उपलब्ध है।
महत्वपूर्ण रूप से, प्रतिवादियों ने बताया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली, 1952 के अध्याय V नियम 2 के तहत, धारा 528 BNSS के आवेदन एकल पीठ द्वारा सुने जाने चाहिए, जबकि आपराधिक रिट याचिकाएं खंडपीठ के समक्ष रखी जाती हैं। इसलिए, उन्होंने तर्क दिया कि खंडपीठ के पास संज्ञान आदेश पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र नहीं है।
न्यायालय का विश्लेषण
कोर्ट ने इस कानूनी प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया: “क्या यह न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र में संबंधित मजिस्ट्रेट के समन या संज्ञान आदेश को रद्द कर सकता है?”
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के राधे श्याम बनाम छवि नाथ के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि न्यायिक आदेश अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं हैं। कोर्ट ने प्रज्ञा प्रांजल कुलकर्णी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के हालिया फैसले पर भी चर्चा की, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि हाईकोर्ट एक रिट याचिका में संज्ञान आदेश को रद्द कर सकता है यदि वह “दोहरे अधिकार क्षेत्र” (Twin Jurisdiction – अनुच्छेद 226 और धारा 482 Cr.P.C./धारा 528 BNSS) का उपयोग करता है और “यदि रोस्टर इसकी अनुमति देता है।”
हालांकि, पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के विशिष्ट नियमों और रोस्टर के आधार पर वर्तमान मामले को अलग बताया। कोर्ट ने अवलोकन किया:
“उक्त नियमों के अनुसार, धारा 528 BNSS (482 Cr.P.C.) के तहत आवेदन, जिसके द्वारा न्यायालय को संज्ञान आदेश या संबंधित न्यायालय द्वारा पारित किसी भी न्यायिक आदेश को रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है, एकल पीठ (Single Judge Bench) के समक्ष रखे जाने चाहिए, लेकिन एफआईआर रद्द करने के लिए आपराधिक रिट याचिकाएं खंडपीठ (Division Bench) के समक्ष रखी जाती हैं।”
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मुख्य न्यायाधीश “रोस्टर के मास्टर” होते हैं और कोई भी पीठ उसे सौंपे गए अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं कर सकती। जजों ने नोट किया:
“यह एक स्वीकृत तथ्य है कि इस न्यायालय के पास अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227/528 BNSS के तहत दोहरा अधिकार क्षेत्र नहीं है, इसलिए, इस न्यायालय के पास केवल मुख्य न्यायाधीश द्वारा सौंपा गया अनुच्छेद 226 के तहत अधिकार क्षेत्र है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि खंडपीठ को सौंपा गया रोस्टर अनुच्छेद 226 तक सीमित था, इसलिए वह संज्ञान आदेश को रद्द करने के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नहीं कर सकती, जो कि धारा 528 BNSS के तहत एकल पीठ में निहित है।
“कानून के उपरोक्त सिद्धांत, माननीय सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों व सामग्री को ध्यान में रखते हुए, हमारा विचार है कि वर्तमान रिट याचिका पोषणीय नहीं है।”
न्यायालय ने रिट याचिका को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को संज्ञान आदेश को रद्द करने के लिए उपयुक्त न्यायालय के समक्ष उचित आवेदन या याचिका दायर करने की छूट दी।
मामले का विवरण:
- वाद शीर्षक: संजय वाही बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य
- वाद संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या 18905 ऑफ 2025
- पीठ: न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ल

