केरल हाईकोर्ट ने जमीन नापने के बदले 500 रुपये की रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के दोषी पाए गए एक विलेज मैन (ग्राम क्षेत्र सहायक) की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत अपराध साबित करने के लिए ‘रिश्वत की मांग’ (Demand) का होना अनिवार्य शर्त (Sine Qua Non) है।
न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की पीठ ने आरोपी वी. चंद्रन की अपील पर सुनवाई करते हुए उसकी सजा को बरकरार रखा, हालांकि अदालत ने जेल की अवधि को घटाकर न्यूनतम कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला (वी. चंद्रन बनाम केरल राज्य) वर्ष 2006 का है। अपीलकर्ता वायनाड जिले के मनंतवाडी स्थित पय्याम्पल्ली ग्राम कार्यालय में ‘विलेज मैन’ के पद पर कार्यरत था। शिकायतकर्ता (PW1) ने अपने पिता द्वारा उपहार में दी गई संपत्ति के ‘जमा अधिकारों’ (Jama Rights) को हस्तांतरित करने और भू-राजस्व (Land Revenue) का भुगतान करने के लिए ग्राम कार्यालय से संपर्क किया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता ने 22 जून, 2006 को आवेदन दिया था। उसे बताया गया कि संपत्ति का माप (Measurement) करना आवश्यक है। कई बार कार्यालय के चक्कर काटने के बाद, आरोपी ने कथित तौर पर संपत्ति नापने के लिए 500 रुपये की रिश्वत की मांग की। इससे पहले आरोपी ने नक्शे और योजना के खर्च के नाम पर 950 रुपये मांगे थे, जिसे देने में शिकायतकर्ता ने असमर्थता जताई थी।
इसके बाद, सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (VACB), वायनाड ने 4 अक्टूबर, 2006 को जाल बिछाया। शिकायतकर्ता ने गवाहों और सतर्कता अधिकारियों की मौजूदगी में ग्राम कार्यालय में आरोपी को निशान लगे हुए नोट सौंपे। आरोपी को पैसे स्वीकार करने के तुरंत बाद रंगे हाथों पकड़ लिया गया और फिनोलफथेलिन टेस्ट (Phenolphthalein Test) में भी पुष्टि हुई।
कोझिकोड के इंक्वायरी कमिश्नर और विशेष न्यायाधीश ने 12 जुलाई, 2013 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए दो साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षों की दलीलें
बचाव पक्ष: अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि आरोपी केवल एक ‘विलेज मैन’ (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) था और उसे जमीन नापने का कोई अधिकार नहीं था। बचाव पक्ष का कहना था कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी के आधिकारिक कर्तव्यों के बारे में गलत धारणा बनाई है।
यह भी दलील दी गई कि आरोपी ने वास्तव में एक निजी सर्वेक्षक की व्यवस्था की थी, और ट्रैप वाले दिन शिकायतकर्ता ने जबरदस्ती आरोपी की जेब में पैसे डाल दिए थे। वकील ने दावा किया कि आरोपी का रिश्वत मांगने या स्वीकार करने का कोई इरादा नहीं था।
अभियोजन पक्ष: विशेष लोक अभियोजक ने तर्क दिया कि रिश्वत की मांग और स्वीकृति के संबंध में शिकायतकर्ता के बयान जिरह के दौरान भी अडिग रहे। अभियोजन पक्ष ने गवाहों और जांच अधिकारी (PW9) की गवाही का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी का दोष संदेह से परे साबित हुआ है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(d) के तहत अपराध के लिए आवश्यक तत्वों की जांच की। न्यायमूर्ति बदरुद्दीन ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले नीरज दत्ता बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली सरकार)
$$AIR 2023 SC 330$$
का हवाला दिया, जिसमें यह तय किया गया है कि आरोपी का दोष सिद्ध करने के लिए अभियोजन पक्ष द्वारा रिश्वत की मांग और स्वीकृति को एक तथ्य के रूप में साबित करना अनिवार्य है।
बचाव पक्ष की इस दलील पर कि आरोपी के पास जमीन नापने का अधिकार नहीं था, हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“वास्तव में, यह तर्क अस्थिर पाया गया है क्योंकि ग्राम कार्यालय में काम करने वाले सभी व्यक्ति आमतौर पर उन संपत्तियों की पहचान और माप के कार्य में सहायता करते हैं, जिनका म्यूटेशन या अन्य कार्य किया जाना है।”
अदालत ने आगे कहा कि जब कोई नागरिक किसी सरकारी कार्यालय में जाता है, तो उसके पास “उस अधिकारी के शब्दों पर विश्वास करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, जो संपत्ति को नापने के लिए सहमत हुआ है।”
अदालत ने पाया कि 4 अक्टूबर, 2006 को दोपहर 3:15 बजे रिश्वत की मांग और स्वीकृति के संबंध में शिकायतकर्ता (PW1) के सबूत विश्वसनीय थे।
फैसला
केरल हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(1)(d) के साथ धारा 13(2) के तहत वी. चंद्रन की दोषसिद्धि की पुष्टि की। हालांकि, अदालत ने आरोपी के वकील द्वारा नरमी बरतने की अपील पर विचार करते हुए सजा को संशोधित कर दिया।
संशोधित सजा इस प्रकार है:
- धारा 7 के तहत: छह महीने का कठोर कारावास और 5,000 रुपये का जुर्माना।
- धारा 13(1)(d) के तहत: एक वर्ष का कठोर कारावास और 5,000 रुपये का जुर्माना।
दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी (Concurrently), जिसका अर्थ है कि आरोपी को कुल एक वर्ष जेल में बिताना होगा। हाईकोर्ट ने आरोपी के जमानत बांड को रद्द करते हुए उसे सजा भुगतने के लिए तत्काल सरेंडर करने का निर्देश दिया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: वी. चंद्रन बनाम केरल राज्य
- केस नंबर: Crl.A. No. 1063 of 2013
- कोरम: न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन

