दिल्ली हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रल अवॉर्ड (मध्यस्थता निर्णय) सुनाने में लगभग 14 महीने की देरी होना, अपने आप में उसे रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि जब तक यह साबित नहीं होता कि इस देरी से पक्षकार को कोई वास्तविक पूर्वाग्रह (prejudice) या नुकसान हुआ है, तब तक आर्बिट्रल अवॉर्ड को खारिज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने वाणिज्यिक न्यायालय (Commercial Court) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें 6 लाख रुपये के मैत्रीपूर्ण ऋण (friendly loan) की वसूली के लिए पारित आर्बिट्रल अवॉर्ड को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी पक्ष ने प्लीडिंग्स में ऋण लेने की बात स्वीकार कर ली है, तो दस्तावेजों (जैसे मॉर्गेज डीड) के अपंजीकृत होने या कम स्टांप शुल्क होने के बावजूद वसूली का आदेश दिया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील ‘आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996’ (AC Act) की धारा 37 के तहत दायर की गई थी। अपीलकर्ता, ओम प्रकाश ने कमर्शियल कोर्ट के 31 अक्टूबर 2022 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसने 15 नवंबर 2019 के आर्बिट्रल अवॉर्ड को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
विवाद का मूल कारण 6 लाख रुपये का एक लोन था, जो प्रतिवादी श्रीमती लक्ष्मी मौर्य ने अपीलकर्ता को दिया था। इस लोन की सुरक्षा के लिए दो मॉर्गेज समझौते (19.12.2011 और 07.12.2012) निष्पादित किए गए थे। जब अपीलकर्ता ने पैसे नहीं लौटाए, तो प्रतिवादी ने मध्यस्थता (Arbitration) का सहारा लिया। हाइकोर्ट द्वारा नियुक्त एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) ने प्रतिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया और अपीलकर्ता को ब्याज सहित पूरी राशि चुकाने का निर्देश दिया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता ने आर्बिट्रल अवॉर्ड को चुनौती देते हुए निम्नलिखित मुख्य तर्क प्रस्तुत किए:
- निर्णय में देरी: अपीलकर्ता का कहना था कि मध्यस्थता की कार्यवाही 27 सितंबर 2018 को पूरी हो गई थी और निर्णय सुरक्षित रख लिया गया था, लेकिन अवॉर्ड 14 महीने बाद 15 नवंबर 2019 को सुनाया गया। यह देरी अनुचित है और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
- ऋण की स्वीकृति नहीं: अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उसने कभी भी एकमुश्त 6 लाख रुपये का लोन लेने की बात स्वीकार नहीं की थी। उसने दावा किया कि उसने अलग-अलग समय पर 2-2 लाख रुपये लिए थे, जिसमें से अधिकांश चुका दिए गए हैं।
- दस्तावेजों की वैधता: यह भी दलील दी गई कि मॉर्गेज डीड (बंधक विलेख) पंजीकृत नहीं थे और उन पर पर्याप्त स्टांप शुल्क नहीं दिया गया था, इसलिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
- संपत्ति की प्रकृति: जिस संपत्ति को गिरवी रखने की बात कही गई थी, वह एक जेजे पुनर्वास कॉलोनी में सरकारी जमीन पर स्थित है, इसलिए उस पर वैध मॉर्गेज नहीं बनाया जा सकता।
प्रतिवादी ने इन तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि अपीलकर्ता केवल तथ्यों की दोबारा जांच करवाना चाहता है, जिसकी अनुमति धारा 37 के तहत नहीं है।
न्यायालय का विश्लेषण और निष्कर्ष
1. देरी का प्रभाव
हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले M/s. Lancor Holdings Limited v. Prem Kumar Menon & Ors. (2025 INSC 1277) का हवाला देते हुए कहा कि केवल देरी के आधार पर अवॉर्ड को रद्द नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह दिखाना जरूरी है कि देरी अनुचित थी और इससे निर्णय की निष्पक्षता या वैधता पर स्पष्ट प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
कोर्ट ने कहा:
“वर्तमान मामले के तथ्यों पर स्थापित कानूनी स्थिति को लागू करते हुए, यह कोर्ट पाता है कि अपीलकर्ता कथित देरी के कारण अवॉर्ड में किसी भी पूर्वाग्रह या त्रुटि को स्थापित करने में विफल रहा है।”
2. ऋण की स्वीकृति (Admission)
कोर्ट ने पाया कि आर्बिट्रल कार्यवाही के दौरान अपीलकर्ता ने अपने लिखित बयान (Written Statement) में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि उसने कुल 6 लाख रुपये उधार लिए थे, भले ही वह अलग-अलग किस्तों में लिए गए हों।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऋण चुकाने का सबूत पेश करने का भार (Onus of Proof) अपीलकर्ता पर था, जिसे वह पूरा करने में विफल रहा। इसलिए, मध्यस्थ द्वारा उसकी स्वीकृति पर भरोसा करना सही था।
3. दस्तावेजों की स्वीकार्यता
दस्तावेजों के अपंजीकृत होने के तर्क को खारिज करते हुए, पीठ ने कहा कि रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 49 के तहत, अपंजीकृत दस्तावेजों को भी ‘संपार्श्विक उद्देश्यों’ (collateral purposes) के लिए देखा जा सकता है। इसके अलावा, इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899 की धारा 36 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एक बार जब कोई दस्तावेज साक्ष्य में स्वीकार कर लिया जाता है, तो बाद में उसकी स्वीकार्यता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“भले ही मॉर्गेज समझौता न हो, फिर भी प्रतिवादी ने अपने दावे को सफलतापूर्वक स्थापित किया है, क्योंकि अपीलकर्ता ने स्वयं 6,00,000 रुपये उधार लेने की बात स्वीकार की है।”
अंततः, हाइकोर्ट ने कहा कि मध्यस्थ ट्रिब्यूनल और कमर्शियल कोर्ट के निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि या अनियमितता नहीं है। इसके साथ ही अपील खारिज कर दी गई।
केस का विवरण
केस टाइटल: ओम प्रकाश बनाम श्रीमती लक्ष्मी मौर्य
केस नंबर: FAO (COMM) 57/2023
कोरम: जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन

