सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) को मैनेजमेंट ट्रेनी के पद पर एक ऐसी महिला उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्देश दिया है, जिसे दृष्टिबाधित होने के साथ-साथ आंशिक हेमिपेरेसिस (Partial Hemiparesis) से पीड़ित होने के कारण ‘मेडिकली अनफिट’ घोषित कर दिया गया था। कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भर्ती पैनल की अवधि समाप्त होने के आधार पर राहत देने से इनकार कर दिया गया था।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए ‘रीज़नेबल एकोमोडेशन’ (Reasonable Accommodation) यानी उचित समायोजन और दिव्यांगता के साथ लिंग के अंतर्संबंध (Intersectionality) के सिद्धांतों पर जोर दिया। पीठ ने स्टीवी वंडर के कथन का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि “शारीरिक दृष्टि की कमी का मतलब विजन (Vision) की कमी नहीं है।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा 2019 में मैनेजमेंट ट्रेनी की भर्ती के लिए जारी विज्ञापन से जुड़ा है। अपीलकर्ता सुजाता बोरा ने दृष्टिबाधित (VH) श्रेणी के तहत आवेदन किया था। लिखित परीक्षा पास करने के बाद उन्हें जुलाई 2021 में दस्तावेज़ सत्यापन और प्रारंभिक चिकित्सा परीक्षा (IME) के लिए बुलाया गया।
हालांकि, सितंबर 2021 में उन्हें इस आधार पर अनफिट घोषित कर दिया गया कि वे न केवल दृष्टिबाधित हैं, बल्कि ‘रेसिडुअरी पार्शियल हेमिपेरेसिस’ से भी पीड़ित हैं। अधिकारियों का तर्क था कि यह मामला ‘बहु-दिव्यांगता’ (Multiple Disabilities) के अंतर्गत आता है, जो VH श्रेणी के लिए निर्धारित मानदंडों में शामिल नहीं था।
अपीलकर्ता ने इसके खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। एकल न्यायाधीश (जस्टिस लपिता बनर्जी) ने 10 अगस्त 2023 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया और मेडिकल अनफिटनेस के आदेश को रद्द कर दिया। एकल जज ने निर्देश दिया कि उन्हें 2023 की भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने का मौका दिया जाए।
लेकिन CIL ने इस फैसले को हाईकोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) में चुनौती दी। खंडपीठ ने एकल जज के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि रिट याचिका पैनल की अवधि समाप्त होने के बाद दायर की गई थी, इसलिए पिछली या अगली भर्ती प्रक्रिया में विचार करने का निर्देश देना उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही
अपीलकर्ता ने खंडपीठ के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली को विशेषज्ञों का एक बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने विशेष रूप से दिव्यांग अधिकारों के लिए कार्य कर रहे डॉ. सतेंद्र सिंह को इस बोर्ड में शामिल करने का आदेश दिया।
AIIMS द्वारा 1 जनवरी 2026 को सौंपी गई अंतिम रिपोर्ट में पुष्टि की गई कि अपीलकर्ता 57% दिव्यांगता से पीड़ित हैं, जो कि बेंचमार्क दिव्यांगता (40%) से अधिक है।
कोर्ट की टिप्पणियाँ और कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा तकनीकी आधारों पर राहत न देने के दृष्टिकोण की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि केवल पैनल की अवधि समाप्त होने के कारण किसी उम्मीदवार को रोजगार से वंचित नहीं किया जा सकता, जिसे गलत तरीके से खारिज किया गया था।
फैसले में तीन प्रमुख कानूनी बिंदुओं पर चर्चा की गई:
1. रीज़नेबल एकोमोडेशन (Reasonable Accommodation) सुप्रीम कोर्ट ने ओंकार रामचंद्र गोंड बनाम भारत संघ (2024) और ओम राठौड़ बनाम महानिदेशक स्वास्थ्य सेवा (2024) जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘रीज़नेबल एकोमोडेशन’ एक मौलिक अधिकार है। यह दिव्यांग व्यक्तियों के लिए संविधान में निहित अन्य अधिकारों का आनंद लेने का प्रवेश द्वार है। इसके बिना, दिव्यांग व्यक्ति उस दुनिया में संघर्ष करने को मजबूर हैं जो उन्हें अपने ढांचे से ही बाहर रखती है।
2. इंटरसेक्शनलिटी (Intersectionality) कोर्ट ने दिव्यांगता और जेंडर के अंतर्संबंध पर भी प्रकाश डाला। पीठ ने कहा:
“यहाँ हमारे सामने एक एकल महिला है, जिसमें अपनी दिव्यांगता के बावजूद सफल होने की ललक है। क्या पैनल की समाप्ति जैसी तकनीकी बाधाएं हमें पूर्ण न्याय करने से रोक सकती हैं? हम ऐसा बिल्कुल नहीं मानते।”
कोर्ट ने जेन कौशिक बनाम भारत संघ (2025) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि भेदभाव के कारक अलग-थलग काम नहीं करते, बल्कि मिलकर एक व्यक्ति के अनुभव को प्रभावित करते हैं।
3. कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) कोर्ट ने दिव्यांग अधिकारों को CSR से जोड़ते हुए कहा कि कार्यस्थल पर सच्ची समानता तभी प्राप्त की जा सकती है जब दिव्यांग अधिकारों को कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के एक पहलू के रूप में सही बढ़ावा दिया जाए।
फैसला और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए खंडपीठ के आदेश को रद्द कर दिया और निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- पद का सृजन: अपीलकर्ता के लिए एक ‘सुपरन्यूमेरी पोस्ट’ (Supernumerary Post) सृजित की जाए।
- नियुक्ति: कोर्ट ने अपीलकर्ता को मैनेजमेंट ट्रेनी के पद के लिए योग्य घोषित किया।
- पोस्टिंग: कोल इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन से अनुरोध किया गया कि अपीलकर्ता को नॉर्थ ईस्टर्न कोलफील्ड्स, मार्गेरिटा, तिनसुकिया (असम) में तैनात किया जाए।
- कार्यस्थल पर सुविधाएं: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 2(ze) के तहत ‘यूनिवर्सल डिज़ाइन’ के अनुसार, अपीलकर्ता को एक उपयुक्त डेस्क जॉब, अलग कंप्यूटर और कीबोर्ड प्रदान किया जाए।
अंत में, कोर्ट ने कोल इंडिया के वकील श्री विवेक नारायण शर्मा और एम्स के डॉक्टरों के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।
केस विवरण
केस टाइटल: सुजाता बोरा बनाम कोल इंडिया लिमिटेड व अन्य
केस संख्या: सिविल अपील संख्या 120 ऑफ 2026
कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

