धारा 114A साक्ष्य अधिनियम की उपधारणा ‘संदेह से परे सबूत’ का विकल्प नहीं: रेप केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप, गलत तरीके से बंधक बनाने और आपराधिक धमकी देने के दोषी ठहराए गए एक अपीलकर्ता को बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को ‘उचित संदेह से परे’ (beyond reasonable doubt) साबित करने में विफल रहा है। अदालत ने पीड़िता द्वारा बंधक बनाए जाने के आरोपों और कथित अवधि के दौरान दूसरे शहर में उसकी मौजूदगी दिखाने वाले फोटोग्राफिक साक्ष्यों के बीच “मौलिक विरोधाभास” (fundamental contradiction) को बरी करने का मुख्य आधार माना।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता प्रदीप कुमार ने तीस हजारी कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) द्वारा 26 मई, 2017 को दिए गए दोषसिद्धि के फैसले और 31 मई, 2017 को सजा के आदेश के खिलाफ यह अपील दायर की थी। यह मामला पुलिस स्टेशन पंजाबी बाग में दर्ज एफआईआर संख्या 163/2014 से संबंधित था।

पीड़िता, जो अपीलकर्ता के साले की पत्नी थी, ने आरोप लगाया था कि उसके पति और सास (सह-दोषी, जिनकी अपील मृत्यु के कारण समाप्त हो गई) द्वारा उसे प्रताड़ित किया जाता था। पीड़िता ने बताया कि उसने पहले भी अपीलकर्ता के खिलाफ रेप का आरोप लगाते हुए एफआईआर संख्या 349/2013 दर्ज कराई थी। उसका आरोप था कि अक्टूबर 2013 में पिछले मामले में जमानत पर रिहा होने के बाद, अपीलकर्ता ने उसके साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 13 नवंबर 2013 को अपीलकर्ता और उसकी सास पीड़िता को शकूर बस्ती स्थित एक झुग्गी में ले गए। पीड़िता का आरोप था कि उसे वहां बंधक बनाकर रखा गया और अपीलकर्ता ने उसके साथ बार-बार रेप किया, जब तक कि वह 14 जनवरी 2014 को वहां से भागने में सफल नहीं हो गई।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि आरोप झूठे हैं और इस बात पर प्रकाश डाला कि अपीलकर्ता को पिछली एफआईआर (संख्या 349/2013) से जुड़े मुकदमे में पहले ही बरी कर दिया गया था। यह भी दलील दी गई कि पिछले मामले में पीड़िता ने एक हलफनामा दायर कर कहा था कि शारीरिक संबंध सहमति से बने थे, हालांकि बाद में उसने अदालत में दावा किया कि वह हलफनामा धमकी के तहत दिया गया था।

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बचाव पक्ष ने उन तस्वीरों (Exhibits P-1 से P-4) पर भारी भरोसा जताया, जिनमें पीड़िता ने हरिद्वार में अपनी उपस्थिति स्वीकार की थी। वकील ने बताया कि इन तस्वीरों पर 16 नवंबर, 2013 की तारीख थी, जो कि वही समय था जब पीड़िता ने दावा किया था कि उसे शकूर बस्ती की झुग्गी में कैद करके रखा गया था। इसके अतिरिक्त, यह तर्क दिया गया कि फॉरेंसिक सबूत भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे थे।

पीड़िता का प्रतिनिधित्व करने वाले एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) और राज्य के अतिरिक्त लोक अभियोजक ने अपील का विरोध किया। एमिकस ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता ने विरोधाभासी बचाव अपनाए हैं—धारा 313 सीआरपीसी के तहत अपने बयान में पूर्ण इनकार किया, जबकि जिरह के दौरान सहमति का मामला सुझाया। यह भी तर्क दिया गया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114A के तहत सहमति के अभाव की अनिवार्य उपधारणा (mandatory presumption) इस मामले में स्पष्ट रूप से लागू होती है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने रिकॉर्ड की जांच की और एक “मौलिक विरोधाभास” की पहचान की जो अभियोजन पक्ष के मामले की जड़ पर प्रहार करता है। कोर्ट ने पाया कि जहां एक ओर पीड़िता ने 13 नवंबर, 2013 से 14 जनवरी, 2014 तक शकूर बस्ती में अवैध रूप से बंधक बनाए जाने का आरोप लगाया, वहीं दूसरी ओर स्वीकार किए गए फोटोग्राफिक साक्ष्य 16 नवंबर, 2013 को हरिद्वार में उसकी उपस्थिति दर्शाते हैं।

अदालत ने टिप्पणी की: “जबरन कैद के आरोप और दूसरे शहर में उसकी यात्रा और उपस्थिति के निर्विवाद तथ्य के बीच सामंजस्य बिठाना मुश्किल है।”

अदालत ने पिछली मुकदमेबाजी के संबंध में पीड़िता के आचरण पर भी गौर किया। यह देखा गया कि पहली सुनवाई के लंबित रहने के दौरान और अपीलकर्ता के जमानत पर होने के बावजूद जब दूसरी घटना कथित रूप से हुई, तो पीड़िता ने उसकी जमानत रद्द कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसके अलावा, कोर्ट ने नोट किया कि फॉरेंसिक सबूत अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं करते, क्योंकि एफएसएल (FSL) रिपोर्ट अनिर्णायक रही और कोई डीएनए प्रोफाइल तैयार नहीं किया जा सका।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 114A के तहत उपधारणा और अपीलकर्ता के बचाव में बदलाव के तर्क को संबोधित करते हुए, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

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“भले ही अदालत साक्ष्य अधिनियम की धारा 114A के तहत वैधानिक उपधारणा (statutory presumption) से अवगत है, लेकिन इसे अभियोजन पक्ष द्वारा अपने मामले को उचित संदेह से परे (beyond reasonable doubt) साबित करने की आवश्यकता का विकल्प नहीं माना जा सकता है।”

फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोप विश्वसनीय नहीं हैं और अभियोजन पक्ष अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। परिणामस्वरूप, अदालत ने संदेह का लाभ अपीलकर्ता को दिया और उसे आईपीसी की धारा 376 (रेप), 344 (दस या अधिक दिनों के लिए गलत तरीके से बंधक बनाना) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत सभी आरोपों से बरी कर दिया। दोषसिद्धि के फैसले और सजा के आदेश को रद्द कर दिया गया, और अपीलकर्ता का निजी मुचलका रद्द कर दिया गया।

केस डीटेल्स:

केस टाइटल: प्रदीप कुमार बनाम स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली)

केस नंबर: CRL.A. 665/2017

कोरम: माननीय जस्टिस मनोज कुमार ओहरी 

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