दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि भले ही उच्च या पेशेवर शिक्षा का अधिकार संविधान के तहत मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन इसे हल्के में प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता और राज्य पर यह सकारात्मक दायित्व है कि वह इस अधिकार को सुनिश्चित करे।
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाए छात्र की दाखिला रद्द कर दिया गया था। छात्र पर NEET-UG 2024 परीक्षा में गड़बड़ियों में शामिल होने का आरोप था।
CBI ने कोर्ट को सूचित किया कि NEET-UG 2024 प्रश्नपत्र लीक की जांच के दौरान 22 उम्मीदवारों की पहचान की गई है, जो विभिन्न अनियमितताओं में शामिल थे, लेकिन याचिकाकर्ता न तो आरोप पत्र में आरोपी है और न ही उसके खिलाफ कोई आपराधिक प्रमाण सामने आया है। वह केवल गवाह के रूप में सूचीबद्ध है।
इस आधार पर अदालत ने माना कि छात्र के खिलाफ कोई prima facie (प्रथम दृष्टया) अनुचित आचरण का आरोप नहीं बनता।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने मेरिट के आधार पर सार्वजनिक प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाया था। यह एक “मूल्यवान अधिकार” है जिसे केवल ठोस और वास्तविक कारणों से ही छीना जा सकता है।
“याचिकाकर्ता का दाखिला रद्द करना और उसका नाम MBBS कोर्स से हटाना पूरी तरह से अन्यायपूर्ण आधारों पर उसके शैक्षणिक भविष्य को बाधित करता है,” न्यायमूर्ति सिंह ने कहा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कोई छात्र खुले और निष्पक्ष प्रवेश प्रक्रिया में सफल होकर सीट पाता है, तो उसका दाखिला केवल वैध, वास्तविक और ठोस कारणों पर ही रद्द किया जा सकता है।
कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “भले ही भारत के संविधान के भाग-III में उच्च या पेशेवर शिक्षा के अधिकार को स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के रूप में नहीं गिना गया हो, लेकिन राज्य पर यह सकारात्मक दायित्व है कि वह इस अधिकार को सुनिश्चित करे और इसे हल्के में प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को MBBS की पढ़ाई पाठ्यक्रम के अनुसार जारी रखने की अनुमति दें।
यह आदेश छात्र के प्रवेश को बहाल करता है और उस रद्दीकरण निर्णय को खारिज करता है, जिसे अदालत ने “पूर्णतः अन्यायपूर्ण” कहा, विशेष रूप से तब जब छात्र CBI जांच में केवल गवाह है, आरोपी नहीं।

