जिला सर्वेक्षण और पुनर्भरण अध्ययन के बिना पर्यावरण मंजूरी अवैध: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सिलिका खदान के खिलाफ NGT के आदेश को सही ठहराया

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), साउथ जोन के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसके तहत एक सिलिका सैंड माइनिंग फर्म को दी गई पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance – EC) को स्थगित (abeyance) कर दिया गया था। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि NGT की भूमिका केवल न्यायिक निर्णय (adjudicatory) तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण को गिरावट से बचाने के लिए यह “निवारक और उपचारात्मक” (preventive and remedial) भी है।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि यदि वैज्ञानिक अध्ययन और जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट के बिना पर्यावरण मंजूरी दी जाती है, तो वह कानूनन सही नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने यह भी माना कि स्थानीय निवासी यदि पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देता है, तो उसे ‘पीड़ित व्यक्ति’ (aggrieved person) माना जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, मेसर्स श्री कुमारस्वामी सिलिका माइन्स, एक साझेदारी फर्म है जो नेल्लोर जिले के मोमिदी गांव में सिलिका रेत खनन का कार्य करती है। मूल खनन पट्टा (Lease) 1975 में दिया गया था और बाद में इसका नवीनीकरण किया गया।

याचिकाकर्ता ने EIA अधिसूचना 2006 के तहत 2013 में पर्यावरण मंजूरी (EC) के लिए आवेदन किया था। हालांकि, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने कथित उल्लंघनों के कारण खनन रोकने का निर्देश दिया था। कानूनी प्रक्रियाओं के बाद, याचिकाकर्ता ने 2018 में ‘उल्लंघन श्रेणी’ (violation category) के तहत आवेदन किया और मंत्रालय ने 16 अप्रैल, 2020 को EC प्रदान कर दी।

इस मंजूरी को 7वें प्रतिवादी, बी. मदन कुमार रेड्डी ने NGT, साउथ जोन के समक्ष चुनौती दी (अपील संख्या 19/2020)। 15 नवंबर, 2021 को NGT ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए EC को स्थगित (abeyance) कर दिया। ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि क्षेत्र के “विशिष्ट ड्यूनल वेटलैंड इकोसिस्टम” (Dunal wetland ecosystem) पर खनन के प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया जाए और अवैध खनन के लिए मुआवजे का आकलन किया जाए। याचिकाकर्ता ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता का तर्क: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी. वीरा रेड्डी ने तर्क दिया कि:

  1. याचिका की पोषणीयता: NGT के समक्ष अपील दायर करने वाला 7वां प्रतिवादी NGT अधिनियम की धारा 16 के तहत “पीड़ित व्यक्ति” नहीं है, इसलिए अपील सुनवाई योग्य नहीं थी।
  2. प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: NGT ने उन आधारों (जैसे जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट का अभाव) पर फैसला सुनाया जो अपील में उठाए ही नहीं गए थे, जिससे याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला।
  3. दिशानिर्देशों की प्रयोज्यता: ‘सतत रेत खनन प्रबंधन दिशानिर्देश, 2016’ (Sustainable Sand Mining Management Guidelines, 2016) केवल नदी से रेत खनन पर लागू होते हैं, सिलिका रेत पर नहीं।

प्रतिवादियों का तर्क: 7वें प्रतिवादी और अधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री गंता रामा राव ने तर्क दिया:

  1. लोकस स्टैंडी (Locus Standi): 7वां प्रतिवादी उस गांव का निवासी है जहां खनन हो रहा है और पर्यावरण प्रदूषण से सीधे प्रभावित है, इसलिए वह एक “पीड़ित व्यक्ति” है।
  2. प्रक्रियात्मक खामियां: विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने यह सुनिश्चित किए बिना EC की सिफारिश की कि क्या कोई जिला सर्वेक्षण किया गया था या स्थानीय पारिस्थितिकी पर बड़े पैमाने पर खनन के प्रभाव का अध्ययन किया गया था।
  3. अधिकार क्षेत्र: पर्यावरण की रक्षा के लिए NGT का अधिकार क्षेत्र व्यापक है और वह उन उल्लंघनों का भी संज्ञान ले सकता है जो स्पष्ट रूप से याचिका में नहीं लिखे गए हैं।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

1. रिट याचिका की पोषणीयता

हाईकोर्ट ने सबसे पहले वैधानिक अपील के विकल्प के बावजूद रिट याचिका की पोषणीयता पर विचार किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि वैकल्पिक उपाय का होना अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र को समाप्त नहीं करता है। चूंकि मामला 2021 से लंबित था, इसलिए कोर्ट ने गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करने का निर्णय लिया।

2. NGT के समक्ष अपीलकर्ता का अधिकार (Locus Standi)

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि स्थानीय निवासी ‘पीड़ित व्यक्ति’ नहीं है। कोर्ट ने कहा कि खनन क्षेत्र के निवासी को अनुच्छेद 21 के तहत प्रदूषण मुक्त पर्यावरण का अधिकार है।

“7वां प्रतिवादी संबंधित गांव का निवासी है। यदि किसी खनन गतिविधि के लिए मानदंडों का उल्लंघन करते हुए EC जारी की गई है, तो ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से NGT अधिनियम की धारा 16 के अर्थ में पीड़ित व्यक्ति होगा।”

3. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की शक्तियां

पीठ ने म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई बनाम अंकिता सिन्हा (2021) के फैसले का हवाला देते हुए NGT की व्यापक शक्तियों की पुष्टि की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि NGT की भूमिका केवल दो पक्षों के बीच विवाद सुलझाने तक सीमित नहीं है।

“NGT का कानूनी दायित्व है कि वह निवारक और उपचारात्मक उपाय प्रदान करे… उसके पास स्वतः संज्ञान (suo motu) की शक्ति भी है। यह नहीं कहा जा सकता कि NGT को केवल अपील में उठाई गई आपत्तियों तक ही सीमित रहना चाहिए था।”

4. जिला सर्वेक्षण और पुनर्भरण अध्ययन की अनिवार्यता

हाईकोर्ट ने पाया कि NGT ने EC प्रक्रिया में कई खामियों को सही पकड़ा था, जिसमें 1,607 काजू के पेड़ों को काटने के प्रभाव का आकलन न करना और जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (DSR) की कमी शामिल थी। कोर्ट ने सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइन्स, 2016 के बारे में स्पष्ट किया कि ये दिशानिर्देश नदी के साथ-साथ अन्य रेत स्रोतों पर भी लागू होते हैं।

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले (यूटी ऑफ जम्मू-कश्मीर बनाम राजा मुजफ्फर भट, 2025) का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि उचित ‘पुनर्भरण अध्ययन’ (replenishment study) के बिना तैयार की गई जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट मौलिक रूप से दोषपूर्ण है।

निष्कर्ष

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया और 15 नवंबर, 2021 के NGT के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने MoEF&CC और राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे:

  1. NGT के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए कानून के अनुसार पर्यावरण मंजूरी (EC) पर पुनः विचार करें।
  2. ‘एक्स-पोस्ट फैक्टो’ (ex-post facto) मंजूरी के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम निर्णय (CREDAI बनाम वनशक्ति, 2025) को ध्यान में रखें।
  3. याचिकाकर्ता और 7वें प्रतिवादी दोनों को सुनवाई का अवसर प्रदान करें।

केस डिटेल्स

  • केस का नाम: मेसर्स श्री कुमारस्वामी सिलिका माइन्स बनाम भारत सरकार और अन्य
  • केस संख्या: डब्ल्यूपी नंबर 31066/2021 (W.P. No. 31066 of 2021)
  • कोरम: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री पी. वीरा रेड्डी, वरिष्ठ अधिवक्ता
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री जी. साई नारायण राव; सुश्री अनुषा (AGP); श्री गंता रामा राव, वरिष्ठ अधिवक्ता

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