“अदालतों को असंवेदनशील नहीं होना चाहिए”: सुप्रीम कोर्ट ने 80 वर्षीय दोषी की सजा घटाकर ‘जितनी जेल काटी उतनी सजा’ मानी

सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के एक हत्या मामले में 80 वर्षीय बुजुर्ग की सजा को लेकर एक मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है। शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 भाग II के तहत उनकी दोषसिद्धि (conviction) को तो बरकरार रखा, लेकिन उनकी सजा को घटाकर उस अवधि तक सीमित कर दिया, जितना समय वे पहले ही जेल में बिता चुके हैं।

जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने श्रीकृष्ण बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि अपीलकर्ता अपने “जीवन के अंतिम पड़ाव” (December of his life) में हैं, और इस उम्र में उन्हें वापस जेल भेजना “कठोर और अनुचित” होगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि “अदालतों को असंवेदनशील नहीं होना चाहिए।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 10 दिसंबर 1992 का है, जो ग्राम दुदनखेड़ी में घटित हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलकर्ता श्रीकृष्ण और मृतक राम सिंह के पुत्रों के बीच झगड़ा हुआ था। जब राम सिंह अपने बेटे के साथ हुई मारपीट की शिकायत लेकर श्रीकृष्ण के घर गए, तो वहां मौजूद आरोपियों ने कथित तौर पर हथियारों के साथ उन पर हमला कर दिया।

आरोप था कि सह-आरोपियों के पास कुल्हाड़ी (फरसा) थी, जबकि अपीलकर्ता सहित अन्य लोगों के पास लाठियां थीं। इस हमले में राम सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए और 11 दिसंबर 1992 को उनकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने शुरू में आईपीसी की धारा 302 के तहत मामला दर्ज किया। वहीं, अपीलकर्ता ने भी एक क्रॉस-एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें दावा किया गया था कि उन पर भी फरसा और लाठी से हमला किया गया था और उन्होंने आत्मरक्षा में कदम उठाया था।

9 दिसंबर 1997 को बासोदा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने श्रीकृष्ण और अन्य को आईपीसी की धारा 302 और 149 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

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इसके बाद मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को धारा 302 (हत्या) से बदलकर धारा 304 भाग II (गैर-इरादतन हत्या) कर दिया और सजा को 7 साल के कठोर कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने में बदल दिया। इसी फैसले के खिलाफ श्रीकृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

कोर्ट का विश्लेषण: हत्या नहीं, गैर-इरादतन हत्या

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का परीक्षण किया कि क्या अपराध धारा 302 (हत्या) के तहत आता है या धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या)। फैसला लिखते हुए जस्टिस एन.वी. अंजारिया ने डॉ. आनंद उनिया (PW-2) और डॉ. अशोक कुमार (PW-12) के चिकित्सा साक्ष्यों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में बताया गया था कि राम सिंह को सिर पर किसी सख्त और भोथरी वस्तु से चोट लगी थी, जिससे उनकी पार्श्विका हड्डी (parietal bone) टूट गई थी।

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अदालत ने पाया कि यह घटना एक “स्वच्छंद लड़ाई” (free fight) और “अचानक हुए झगड़े” का परिणाम थी, जिसमें दोनों पक्षों को चोटें आई थीं। पीठ ने कहा:

“हाईकोर्ट का यह तर्क सही था कि ऐसी परिस्थितियों में, यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है कि मृत्यु कारित करने के सामान्य उद्देश्य के साथ कोई गैर-कानूनी सभा (unlawful assembly) गठित की गई थी।”

केसर सिंह और अन्य बनाम हरियाणा राज्य (2008) के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने इरादे (intention) और ज्ञान (knowledge) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। कोर्ट ने माना कि हालांकि अपीलकर्ता ने मृतक के सिर पर लाठी से वार किया था, लेकिन यह कृत्य “हंगामे और सामूहिक संघर्ष के बीच” बिना किसी पूर्व-नियोजन (premeditation) के किया गया था।

फैसले में कहा गया:

“रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों और लाठी का उपयोग करके मृतक के सिर पर चोट पहुंचाने में अपीलकर्ता की भूमिका को देखते हुए, यह माना जा सकता है कि उसने इस इरादे से कार्य किया कि जिससे मृत्यु हो सकती है… हालांकि, अपराध की गंभीरता… धारा 302 के तहत हत्या के अपराध की श्रेणी में नहीं आती।”

परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट द्वारा धारा 304 भाग II के तहत दोषी ठहराया जाना सही था।

सजा और “जीवन का अंतिम पड़ाव”

दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सजा की अवधि पर विचार किया। कोर्ट ने नोट किया कि अपीलकर्ता पहले ही कुल छह साल और तीन महीने की जेल काट चुके हैं।

अपीलकर्ता की वृद्धावस्था को देखते हुए पीठ ने मानवीय रुख अपनाया और कहा:

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“अपीलकर्ता की उम्र वर्तमान में 80 वर्ष से अधिक है। चूंकि अपीलकर्ता एक वृद्ध व्यक्ति हैं और अपने जीवन के अंतिम पड़ाव (December of his life) में हैं, इसलिए इस अवस्था में उन्हें फिर से सलाखों के पीछे भेजना कठोर और अनुचित होगा। अदालतों को असंवेदनशील नहीं होना चाहिए।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया लेकिन सजा में संशोधन किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सजा को अपीलकर्ता द्वारा पहले ही काटी गई अवधि तक कम किया जाता है।

फैसले का निष्कर्ष इस प्रकार था:

“इसलिए, अपीलकर्ता की अधिक उम्र और तथ्यों व परिस्थितियों की समग्रता को देखते हुए, आईपीसी की धारा 304, भाग II के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, उनकी सजा को पहले से काटी गई अवधि तक कम किया जाता है।”

केस विवरण:

  • केस का नाम: श्रीकृष्ण बनाम मध्य प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1533/2011
  • कोरम: जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया

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