दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि वैवाहिक कलह (Marital Discord) के चलते गर्भावस्था को समाप्त करने का किसी महिला का निर्णय ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971’ के वैधानिक संरक्षण के दायरे में आता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में महिला पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 312 (गर्भपात कारित करना) के तहत अपराध नहीं बनता है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें पत्नी को गर्भपात के लिए बतौर आरोपी समन किया गया था। कोर्ट ने कहा कि किसी महिला को अनचाहे गर्भ को जारी रखने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक अखंडता का उल्लंघन है और यह उसके मानसिक आघात को बढ़ाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला प्रतिवादी (पति) द्वारा अपनी पत्नी (याचिकाकर्ता) और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दायर एक आपराधिक शिकायत से जुड़ा है। दोनों का विवाह 19 अप्रैल, 2022 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था।
पति का आरोप था कि ससुराल वालों ने शादी और सगाई में उसे भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर भारी खर्च करवाया। शादी के बाद पत्नी और उसके परिवार ने वित्तीय मांगें शुरू कर दीं और तलाक की धमकी दी। विवाद का मुख्य कारण 9 अक्टूबर, 2022 की एक घटना बनी, जब पत्नी ने पति की सहमति के बिना अपने 14 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त (Medical Termination) करवा दिया।
पति ने इसे अवैध बताते हुए IPC की धारा 182, 192, 312, 379, 384, 406, 420, 500, 506 और 120B के तहत शिकायत दर्ज कराई। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (महिला न्यायालय) ने पत्नी और उसके परिवार को समन जारी किया। बाद में, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) ने 13 अगस्त, 2025 के आदेश में परिवार के अन्य सदस्यों को आरोप मुक्त कर दिया, लेकिन पत्नी के खिलाफ धारा 312 IPC के तहत समन को बरकरार रखा। पत्नी ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता (पत्नी) के वकील ने तर्क दिया कि IPC की धारा 312 के तहत अपराध के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने MTP एक्ट के प्रावधानों का पालन करते हुए एक पंजीकृत अस्पताल में योग्य डॉक्टरों की देखरेख में स्वेच्छा से गर्भपात करवाया था। यह प्रक्रिया 20 सप्ताह की वैधानिक सीमा के भीतर थी।
पत्नी का कहना था कि ससुराल में मानसिक क्रूरता और “अपमानजनक व अस्थिर वातावरण” के कारण वह बच्चे को सुरक्षित रूप से पालने की स्थिति में नहीं थी। उन्होंने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त उनकी ‘प्रजनन स्वायत्तता’ (Reproductive Autonomy) को गलत तरीके से अपराधीकरण के दायरे में लाया जा रहा है।
दूसरी ओर, प्रतिवादी (पति) का तर्क था कि जिस समय पत्नी ने गर्भपात कराया, उस समय वे साथ रह रहे थे और कोई वैवाहिक कलह नहीं थी। पति ने दावा किया कि उसकी सहमति के बिना गर्भपात कराना अपराध है और वैवाहिक कलह का आधार केवल एक बाद का विचार है जो पत्नी के घर छोड़ने के बाद गढ़ा गया।
कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने IPC की धारा 312 और MTP एक्ट के प्रावधानों का विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि MTP एक्ट की धारा 3(2)(b) के तहत, 20 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त किया जा सकता है यदि पंजीकृत डॉक्टरों की राय हो कि गर्भावस्था जारी रखने से महिला के जीवन को खतरा है या उसके “शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट” पहुँच सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य और वैवाहिक कलह: हाईकोर्ट ने “मानसिक स्वास्थ्य” शब्द की व्यापक व्याख्या की। कोर्ट ने MTP एक्ट की धारा 3(3) का हवाला देते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य का आकलन महिला के “वास्तविक या उचित रूप से संभावित वातावरण” (Actual or reasonable foreseeable environment) के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
“इस द्वेषपूर्ण दुनिया की कठोर वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, जब हम वैवाहिक कलह का सामना कर रही एक महिला के मानसिक आघात पर विचार करते हैं। यदि वह गर्भवती है तो यह पीड़ा कई गुना बढ़ जाती है। उसे न केवल खुद का ख्याल रखना होता है, बल्कि अक्सर उसे बिना किसी सहारे के बच्चे को अकेले पालने की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। ऐसी गर्भावस्था अपने साथ भारी कठिनाइयां लाती है, जिससे गंभीर मानसिक आघात होता है।”
कोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज कर दिया कि गर्भपात के समय विवाद पूरी तरह से सामने नहीं आया था। मेडिकल रिकॉर्ड (16 अगस्त, 2022 का OPD कार्ड) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि पत्नी पहले से ही तनाव में थी और तलाक लेने का इरादा रखती थी।
“तथ्य यह है कि महिला तनावग्रस्त थी और उसे महसूस हो रहा था कि वैवाहिक जीवन में कलह है। इसने ऐसी स्थिति पैदा कर दी जहाँ तनाव का उसके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ना स्वाभाविक था, और इसलिए वह गर्भपात कराने के लिए सक्षम थी।”
प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy): सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन और X बनाम प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण) का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि प्रजनन विकल्प चुनना महिला का व्यक्तिगत अधिकार है जो अनुच्छेद 21 के तहत आता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि MTP एक्ट में गर्भपात के लिए पति की सहमति की कोई आवश्यकता नहीं है।
“यदि कोई महिला गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती, तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक अखंडता का उल्लंघन है और उसके मानसिक आघात को बढ़ाता है, जो उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा।”
निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा गर्भपात कराने का कार्य MTP एक्ट के तहत सुरक्षित था और यह IPC की धारा 312 के तहत अपराध नहीं है।
“उपरोक्त चर्चा के आलोक में, जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णयों में वैवाहिक कलह की स्थिति में गर्भपात कराने की महिला की स्वायत्तता को मान्यता दी है, जो उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता द्वारा धारा 312 IPC के तहत कोई अपराध किया गया है।”
तदनुसार, कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए ASJ के आदेश को रद्द कर दिया और पत्नी को मामले से आरोप मुक्त (Discharge) कर दिया।

