सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के तहत अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब किए गए व्यक्ति की जमानत याचिका पर विचार करते समय, अदालत को इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि उसकी संलिप्तता के “मजबूत और ठोस सबूत” (Strong and cogent evidence) मौजूद हैं। यह मानक मूल आरोपी के खिलाफ आरोप तय करने (framing of charges) के लिए आवश्यक मानक से काफी ऊंचा है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने मो. इमरान उर्फ डी.सी. गुड्डू की जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही, कोर्ट ने सह-आरोपियों मो. शमशेर और मो. अरशद को मिली अग्रिम जमानत के खिलाफ झारखंड राज्य द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला डेली मार्केट पुलिस स्टेशन केस संख्या 46/2018 से जुड़ा है, जो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 149 और 302 (हत्या) तथा आर्म्स एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया था। शुरुआत में एफआईआर (FIR) में कुल नौ लोगों को नामजद किया गया था। हालांकि, जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने केवल तीन आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की और बाकी छह के मामले में क्लोजर रिपोर्ट लगा दी।
मुकदमे (Trial) के दौरान, मृतक के परिजनों, जो इस घटना के चश्मदीद गवाह थे, ने 2020 और 2021 में अपनी गवाही दर्ज कराई। इन गवाहों ने एफआईआर में मूल रूप से नामजद सभी नौ आरोपियों की संलिप्तता के बारे में बयान दिया। इसी मौखिक साक्ष्य के आधार पर, शिकायतकर्ता ने 2022 में CrPC की धारा 319 के तहत एक आवेदन दायर किया, जिसमें पुलिस द्वारा छोड़े गए छह सह-आरोपियों को मुकदमे का सामना करने के लिए तलब करने की मांग की गई।
ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए छह में से तीन लोगों – मो. इमरान उर्फ डी.सी. गुड्डू, मो. शमशेर और मो. अरशद को समन जारी किया। इसके बाद गैर-जमानती वारंट जारी होने पर मो. इमरान को गिरफ्तार कर लिया गया। झारखंड हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल, 2025 को इमरान की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। वहीं, अन्य दो आरोपियों, मो. शमशेर और मो. अरशद को हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिल गई थी।
पक्षकारों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो अलग-अलग अपीलें थीं: एक मो. इमरान द्वारा नियमित जमानत के लिए और दूसरी झारखंड राज्य द्वारा सह-आरोपियों की अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए।
आरोपियों की ओर से अधिवक्ता सामंत सिंह, राकेश कुमार सिंह और गणेश खन्ना ने दलीलें पेश कीं, जबकि राज्य की ओर से अधिवक्ता प्रज्ञा बघेल ने पक्ष रखा। बेंच ने उन चश्मदीद गवाहों के बयानों का भी बारीकी से अध्ययन किया जिनके आधार पर नए आरोपियों को तलब किया गया था।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 319 CrPC के तहत बुलाए गए आरोपियों की जमानत पर विचार करने के लिए विशिष्ट मानदंड निर्धारित किए। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में केवल संलिप्तता की संभावना (probability) पर्याप्त नहीं है, बल्कि सबूत “मजबूत और ठोस” होने चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“लागू किया जाने वाला परीक्षण (Test) प्रथम दृष्टया मामले (prima facie case) से अधिक होना चाहिए, जैसा कि आरोप तय करते समय देखा जाता है, लेकिन यह दोषसिद्धि (conviction) के लिए आवश्यक सबूतों के स्तर से थोड़ा कम हो सकता है। यदि ये सबूत बिना किसी खंडन के रह जाएं तो सजा का आधार बन सकते हैं।”
बेंच ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि अदालत को अपराध की प्रकृति, नए आरोपी के खिलाफ सबूतों की गुणवत्ता और उसके फरार होने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की संभावना जैसे कारकों को तौलना चाहिए। कोर्ट को शुरुआत में ही इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि व्यक्ति की संलिप्तता के ठोस सबूत हैं।
फैसला
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने मो. इमरान उर्फ डी.सी. गुड्डू की अपील स्वीकार कर ली और उन्हें ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों पर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।
वहीं, मो. शमशेर और मो. अरशद की अग्रिम जमानत के खिलाफ राज्य की अपील पर कोर्ट ने गौर किया कि वे 2 जुलाई, 2025 से जमानत पर हैं और ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि उनकी अग्रिम जमानत रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता है और राज्य की याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि तीन आरोपियों को अब समन किया गया है, इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा नए सिरे से चलेगा। साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की टिप्पणियां केवल जमानत के उद्देश्य तक सीमित रहेंगी और इसका मुकदमे के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: मो. इमरान उर्फ डी.सी. गुड्डू बनाम झारखंड राज्य (एवं अन्य संबद्ध अपील)
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील (SLP (Crl) No. 12110/2025 और SLP (Crl) No. 19548/2025 से उद्भुत)
- कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

