उत्तराखंड में वन भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट तलब

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची की पीठ ने सोमवार को राज्य सरकार की कार्यशैली पर गहरी नाराजगी जताई और कहा कि यह वन भूमि की “व्यवस्थित और संगठित लूट” का मामला प्रतीत होता है जिसमें राज्य के अधिकारी भी “संलिप्त” हो सकते हैं।

पीठ ने कहा, “ऐसा लगता है कि अधिकारियों ने पहले भूमि कब्जाने की अनुमति दी और फिर अदालत के आदेशों की आड़ में खुद को बचाने की कोशिश की।” अदालत ने यह भी कहा कि यह जांच की जानी चाहिए कि क्या यह अतिक्रमण सरकारी तंत्र की मौन सहमति या मिलीभगत से हुआ है।

मामले की सुनवाई एक याचिका के तहत हो रही थी जिसे अनिता कंडवाल ने दायर किया है। इसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य में लगभग 2,866 एकड़ अधिसूचित वन भूमि पर निजी व्यक्तियों ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया है। इनमें से एक हिस्सा पहले ऋषिकेश की पशुलोक सेवा समिति को लीज़ पर दिया गया था, जिसने आगे चलकर इस भूमि के टुकड़े अपने सदस्यों को बांट दिए।

बाद में समिति और उसके सदस्यों के बीच विवाद हुआ और एक “मिलाभगत वाला डिक्री” (collusive decree) पास हुआ, जिसे अदालत ने संदेहास्पद करार दिया। समिति ने 1984 में 594 एकड़ भूमि वन विभाग को वापस सौंप दी थी और यह प्रक्रिया अंतिम रूप ले चुकी थी। इसके बावजूद 2001 में कुछ निजी व्यक्तियों ने इस भूमि पर दोबारा कब्जा कर लिया और अब डिक्री के आधार पर मालिकाना हक का दावा कर रहे हैं।

पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “जो बात हमें सबसे अधिक चौंकाती है, वह यह है कि जब राज्य की आंखों के सामने वन भूमि की लूट हो रही है, तब अधिकारी मूक दर्शक बने बैठे हैं।”

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अदालत ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को निर्देश दिया है कि वे एक जांच समिति गठित करें और दो सप्ताह में एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करें, जिसमें प्रत्येक अवैध निर्माण की प्रकृति, स्थान और अनुमानित विवरण के साथ साइट प्लान शामिल हो।

इसके अलावा, अदालत ने सभी निजी व्यक्तियों को निर्देश दिया है कि वे उक्त भूमि को न तो किसी अन्य के नाम हस्तांतरित करें, न उस पर कोई निर्माण करें और न ही किसी प्रकार का तीसरे पक्ष का अधिकार बनाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जो भी भूमि खाली पड़ी है (सिर्फ मौजूदा रिहायशी मकानों को छोड़कर), उसे वन विभाग और जिला प्रशासन तत्काल अपने कब्जे में ले।

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पीठ ने राज्य सरकार को 5 जनवरी तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया है।

यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की ओर से वन भूमि की रक्षा को लेकर की गई सख्त टिप्पणी और स्वतः संज्ञान (suo motu) की कार्रवाई को दर्शाता है, जो आने वाले दिनों में उत्तराखंड में ऐसे कब्जों पर सख्त कदम की शुरुआत हो सकती है।

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