इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की कार्यवाही पूरी तरह से संक्षिप्त (summary) और राजकोषीय उद्देश्यों के लिए होती है। यह न तो संपत्ति के स्वामित्व का निर्धारण करती है और न ही अधिकार प्रदान करती है। न्यायालय ने दाखिल-खारिज आदेशों को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग ऐसे मामलों में तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि कोई विशिष्ट और असाधारण परिस्थिति न हो।
न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने गंगाराम मिश्रा द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के पास सक्षम सिविल न्यायालय के समक्ष प्रभावी वैकल्पिक उपचार उपलब्ध है, जहां स्वामित्व विवाद से जुड़ा एक मुकदमा पहले से ही लंबित है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद जिला बस्ती की तहसील भानपुर के ग्राम छितिरगवां में स्थित कृषि भूमि से संबंधित है, जो कि संयुक्त परिवार की संपत्ति मानी जाती है।
तथ्यों के अनुसार, 25 जुलाई 2016 को याचिकाकर्ता के भाई, तुलसी राम ने प्रतिवादी संख्या 6, सुशीला देवी के पक्ष में एक पंजीकृत बैनामा (Sale Deed) निष्पादित किया था। याचिकाकर्ता गंगाराम मिश्रा का तर्क था कि यह हस्तांतरण विक्रेता के अविभाजित हिस्से से अधिक और बिना किसी पूर्व विभाजन के किया गया था। उसी तारीख को, याचिकाकर्ता की मां ने कथित तौर पर उनके पक्ष में एक पंजीकृत वसीयत भी निष्पादित की थी।
बैनामे के आधार पर दाखिल-खारिज की कार्यवाही शुरू की गई। तहसीलदार ने 18 अक्टूबर 2021 के आदेश द्वारा सुशीला देवी के पक्ष में दाखिल-खारिज की अनुमति दी। याचिकाकर्ता ने इसे वापस लेने के लिए आवेदन और आपत्तियां दायर कीं, लेकिन तहसीलदार ने 5 फरवरी 2024 को दाखिल-खारिज की प्रविष्टि को पुनः पुष्टि कर दी।
इसके बाद, याचिकाकर्ता ने राजस्व संहिता की धारा 35(2) के तहत अपील की, जिसे उप-जिलाधिकारी (SDM) ने 18 जुलाई 2024 को खारिज कर दिया। इसके बाद दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision) भी अपर आयुक्त (प्रशासन), बस्ती मंडल द्वारा 4 अक्टूबर 2025 को खारिज कर दी गई।
इस बीच, याचिकाकर्ता और उनकी मां द्वारा बैनामे को चुनौती देने और स्वामित्व के निर्णय के लिए दायर मूल वाद संख्या 18/2017 सिविल जज (सीनियर डिवीजन), बस्ती के समक्ष लंबित है।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि दाखिल-खारिज आदेश अवैध हैं क्योंकि बैनामा विक्रेता के हिस्से से अधिक भूमि के लिए और विभाजन के बिना किया गया था। यह भी कहा गया कि राजस्व अधिकारियों ने वसीयत और याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर विचार नहीं किया।
इसके जवाब में, राज्य और निजी प्रतिवादी के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि चुनौती दिए गए आदेश दाखिल-खारिज कार्यवाही से उत्पन्न हुए हैं, जो प्रकृति में संक्षिप्त है और स्वामित्व का निर्णय नहीं करती। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के पास सिविल कोर्ट में जाने का प्रभावी उपचार है, जहां विवाद पहले से लंबित है। यह भी बताया गया कि उस मुकदमे में याचिकाकर्ता का अंतरिम निषेधाज्ञा (Interim Injunction) का आवेदन खारिज हो चुका है।
न्यायालय का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने दाखिल-खारिज आदेशों को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं की पोषणीयता पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए श्रीमती कलावती बनाम राजस्व परिषद (2022 (2) ADJ 456) के निर्णय का हवाला दिया।
न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने कलावती मामले के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि दाखिल-खारिज कार्यवाही की प्रकृति ‘संक्षिप्त और राजकोषीय’ होती है। न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 34 और 35 के तहत कार्यवाही केवल राजस्व रिकॉर्ड को अपडेट करने और भू-राजस्व संग्रह को सुविधाजनक बनाने के लिए की जाती है।
न्यायालय ने टिप्पणी की, “ये कार्यवाही न तो संपत्ति पर कोई मौलिक अधिकार या स्वामित्व बनाती हैं, न प्रदान करती हैं और न ही समाप्त करती हैं। दाखिल-खारिज प्रविष्टियां न तो स्वामित्व का दस्तावेज हैं और न ही हस्तांतरण विलेख के रूप में कार्य करती हैं।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी प्रविष्टियों का स्वामित्व के प्रश्न पर कोई अनुमानित या साक्ष्यिक महत्व नहीं होता। धारा 39 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि दाखिल-खारिज के तहत कोई भी आदेश या प्रविष्टि किसी व्यक्ति को वाद या अन्य कानूनी कार्यवाही में अपने अधिकार स्थापित करने से नहीं रोकेगी।
अनुच्छेद 226 के दायरे पर, न्यायालय ने कहा कि दाखिल-खारिज आदेशों के खिलाफ रिट याचिकाएं आमतौर पर स्वीकार्य नहीं होती हैं। न्यायालय साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन करने या तथ्यों की त्रुटियों को सुधारने के लिए अपील की अदालत के रूप में कार्य नहीं करेगा।
न्यायालय ने उन सात असाधारण परिस्थितियों को सूचीबद्ध किया जहां रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जा सकता है, जैसे कि यदि आदेश बिना अधिकार क्षेत्र के हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हो, धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया हो, या सक्षम सिविल कोर्ट द्वारा निर्णित अधिकारों की अनदेखी की गई हो।
वर्तमान मामले में, न्यायालय ने पाया कि मुख्य विवाद स्वामित्व, उत्तराधिकार और हिंदू अविभाजित परिवार कानून के जटिल प्रश्नों से जुड़ा है। यह विस्तृत सुनवाई के लिए सिविल कोर्ट के लिए उपयुक्त है, न कि रिट क्षेत्राधिकार में संक्षिप्त हस्तक्षेप के लिए। न्यायालय ने पाया कि अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र में कार्य किया है और प्राकृतिक न्याय का पालन किया गया है।
निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका को “पोषणीय नहीं” मानते हुए खारिज कर दिया।
हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता लंबित मूल वाद संख्या 18/2017 को आगे बढ़ाने या स्वामित्व की घोषणा के लिए अन्य उचित कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र है।
न्यायालय ने निर्देश दिया, “कोई भी ऐसा सिविल या राजस्व न्यायालय/प्राधिकरण मामले का निर्णय स्वतंत्र रूप से और सख्ती से गुण-दोष (merits) के आधार पर कानून के अनुसार करेगा, और यह आक्षेपित दाखिल-खारिज आदेशों (जो प्रकृति में विशुद्ध रूप से राजकोषीय हैं) या यहां की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित नहीं होगा।”
केस विवरण
केस टाइटल: गंगाराम मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 6 अन्य
केस संख्या: रिट-सी संख्या 41243 of 2025
कोरम: न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: राम प्रकाश पांडेय
प्रतिवादियों के अधिवक्ता: आशुतोष पांडेय, सी.एस.सी., जे.एन. मौर्य (सीएससी), दिनेश कुमार तिवारी, पुनीत कुमार उपाध्याय

