भाई के नाम राजस्व रिकॉर्ड या संपत्ति गिरवी रखने से पैतृक संपत्ति में बहन का अधिकार खत्म नहीं होता: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में भाई का नाम होने या उसके द्वारा पैतृक संपत्ति को गिरवी रखने मात्र से बहन को संपत्ति से “बेदखल” (Ouster) नहीं माना जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि एक सह-वारिस (Co-heir) का कब्जा सभी सह-वारिसों की ओर से माना जाता है, जब तक कि दूसरे पक्ष के अधिकार का स्पष्ट रूप से इनकार न किया गया हो।

इस टिप्पणी के साथ, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को खारिज करते हुए एक बेटी को उसके पिता की संपत्ति में आधा हिस्सा (1/2 Share) प्रदान किया और भाई द्वारा किए गए संपत्ति के बैनामे (Sale Deed) को अवैध करार दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुथुसामी गाउंडर की संपत्तियों से संबंधित है, जो अपीलकर्ता सेल्लाम्मल (बेटी) और प्रतिवादी पलानीसामी (बेटे) के पिता थे। मुथुसामी गाउंडर का 1968 में बिना वसीयत (Intestate) निधन हो गया था। उनके पीछे उनकी पत्नी पेरुमायी (जिनका 2012 में निधन हुआ), उनका बेटा और बेटी कानूनी वारिस थे।

वादी सेल्लाम्मल ने विभाजन और अपने आधे हिस्से के लिए मुकदमा (O.S. No. 2 of 2013) दायर किया था। उनका आरोप था कि पिता की मृत्यु के बाद उनका भाई (प्रतिवादी संख्या 1) और माँ संपत्ति पर काबिज थे, लेकिन यह कब्जा पूरे परिवार की ओर से था। हालांकि, माँ की मृत्यु के तुरंत बाद, भाई ने 15 अक्टूबर 2012 को वादी की सहमति के बिना पूरी संपत्ति दूसरे प्रतिवादी (वडिवेल) को बेच दी।

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नामक्कल की अतिरिक्त जिला अदालत ने 2017 में वादी के मुकदमे को खारिज कर दिया था। निचली अदालत का तर्क था कि चूंकि पिता की मृत्यु 1968 में (हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम, 2005 से पहले) हुई थी, इसलिए बेटी अधिकार का दावा नहीं कर सकती। इसके अलावा, अदालत ने भाई के लंबे समय से कब्जे और प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) की दलील को भी स्वीकार कर लिया था। इसी फैसले के खिलाफ सेल्लाम्मल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता/वादी ने तर्क दिया कि मुथुसामी गाउंडर की कानूनी वारिस होने के नाते वह सह-मालिक हैं और संपत्ति में बराबर की हकदार हैं। उन्होंने कहा कि 2012 में उनके भाई द्वारा किया गया बैनामा धोखाधड़ीपूर्ण था और उनके हिस्से तक शून्य है। उनका कहना था कि भाई और माँ का कब्जा पूरे परिवार की ओर से था, न कि विशेष रूप से उनके खिलाफ।

प्रतिवादी/विपक्ष ने दो मुख्य आधारों पर इसका विरोध किया:

  1. बेदखली (Ouster) और प्रतिकूल कब्जा: उन्होंने तर्क दिया कि वादी की शादी 1962 में हो गई थी और वह ससुराल चली गई थीं। तब से उनका संपत्ति के उपभोग में कोई हिस्सा नहीं रहा। भाई ने दावा किया कि वह वैधानिक अवधि से अधिक समय से अकेले संपत्ति का आनंद ले रहा है, कर (Tax) चुका रहा है और यहां तक कि संपत्ति को गिरवी भी रख चुका है, जिससे वादी के अधिकार समाप्त हो गए हैं।
  2. पैतृक प्रकृति: उन्होंने कहा कि संपत्ति पैतृक थी और वादी ने अपनी शादी और लंबी अनुपस्थिति के कारण अपना अधिकार खो दिया है। संपत्ति खरीदने वाले दूसरे प्रतिवादी ने खुद को “बोनाफाइड परचेजर” (सद्भावनापूर्ण खरीदार) बताया।
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कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस आर. शक्तिवेल ने मामले की सुनवाई करते हुए “बेदखली” (Ouster) के सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की। हाईकोर्ट ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि एक सह-वारिस का कब्जा कानून की नजर में सभी सह-वारिसों का कब्जा माना जाता है। इसे तब तक प्रतिकूल नहीं माना जा सकता जब तक कि दूसरे सह-मालिक के अधिकार का स्पष्ट और शत्रुतापूर्ण तरीके से इनकार न किया गया हो और यह बात उसे पता न हो।

प्रतिवादी द्वारा राजस्व रिकॉर्ड और गिरवी दस्तावेजों का हवाला देने पर, कोर्ट ने कहा:

“वादी के अधिकारों के इनकार के अभाव में, अन्य सह-वारिसों/सह-मालिकों द्वारा केवल संपत्ति को गिरवी रखना और अपनी आजीविका के लिए ऋण प्राप्त करना, सह-वारिसों के संयुक्त कब्जे की धारणा को बाधित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

कोर्ट ने भारतीय कृषि परिवारों के सामाजिक संदर्भ का भी उल्लेख किया:

“भारतीय समाज में, और विशेष रूप से कृषि परिवारों में, पिता की मृत्यु के बाद पुरुष वारिसों के नाम पर राजस्व रिकॉर्ड दर्ज होना काफी स्वाभाविक है… केवल इसलिए कि पट्टा और किस्ट रसीदें प्रतिवादी के नाम पर हैं, और वादी ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई, सह-मालिक के संयुक्त कब्जे की धारणा को नहीं बदला जा सकता।”

कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी यह साबित करने में विफल रहे कि उन्होंने मुकदमे से पहले कभी वादी के अधिकारों का स्पष्ट रूप से इनकार किया था। इसलिए, प्रतिकूल कब्जे की दलील खारिज कर दी गई।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम पर निचली अदालत के निष्कर्ष को भी हाईकोर्ट ने गलत ठहराया। कोर्ट ने कहा कि यह आवश्यक नहीं है कि बेटी को अधिकार मिलने के लिए पिता 9 सितंबर 2005 को जीवित हों।

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फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने अतिरिक्त जिला अदालत, नामक्कल के फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:

  • अपील स्वीकार की गई।
  • वादी (सेल्लाम्मल) को मुकदमे की संपत्ति में आधा हिस्सा (1/2 Share) पाने का हकदार घोषित करते हुए प्रारंभिक डिक्री पारित की गई।
  • भाई द्वारा दूसरे प्रतिवादी के पक्ष में निष्पादित 15 अक्टूबर 2012 का बैनामा (Sale Deed) वादी के आधे हिस्से पर बाध्यकारी नहीं होगा।
  • पक्षकारों के बीच संबंधों को देखते हुए, खर्च (Cost) को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया।

केस डीटेल्स:

  • केस का नाम: सेल्लाम्मल बनाम पलानीसामी और अन्य
  • केस संख्या: अपील सूट नंबर 712 ऑफ 2017
  • कोरम: जस्टिस आर. शक्तिवेल

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