सबरीमला ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट: भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर केरल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, नए सिरे से आकलन के आदेश

केरल हाईकोर्ट ने सबरीमला के लिए प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट परियोजना से जुड़ी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के अहम चरणों को रद्द करते हुए राज्य सरकार को झटका दिया है। अदालत ने कहा कि सरकार यह तय करने में विफल रही कि परियोजना के लिए वास्तव में कितनी न्यूनतम भूमि की आवश्यकता है, जबकि कानून इसकी स्पष्ट मांग करता है।

19 दिसंबर को दिए गए फैसले में न्यायमूर्ति सी जयचंद्रन ने माना कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत अपनाई गई प्रक्रिया कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण थी। यह फैसला अयाना चैरिटेबल ट्रस्ट (पूर्व में गॉस्पेल फॉर एशिया) और उसके प्रबंध न्यासी डॉ. सिनी पुन्नूज़ द्वारा दायर याचिका पर आया।

मामला राज्य सरकार के 30 दिसंबर 2022 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसके जरिए सबरीमला एयरपोर्ट के लिए कुल 2,570 एकड़ भूमि अधिग्रहण को मंजूरी दी गई थी। इसमें पथनमथिट्टा जिले की चेरुवली एस्टेट के साथ-साथ उसके बाहर की 307 एकड़ भूमि भी शामिल थी। यह एयरपोर्ट मुख्य रूप से सबरीमला आने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए प्रस्तावित है।

याचिकाकर्ताओं ने सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) रिपोर्ट, विशेषज्ञ समिति की समीक्षा, भूमि अधिग्रहण को मंजूरी देने वाला सरकारी आदेश और 2013 अधिनियम की धारा 11 के तहत जारी अधिसूचना सहित कई सरकारी कदमों को चुनौती दी थी।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि राज्य को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि अधिग्रहण का अधिकार है, लेकिन कानून के अनुसार केवल उतनी ही भूमि ली जा सकती है, जितनी “न्यूनतम रूप से अनिवार्य” हो। न्यायालय के अनुसार, अधिनियम की संबंधित धाराओं में निहित इस अनिवार्य शर्त का पालन इस मामले में ठीक से नहीं किया गया।

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फैसले में कहा गया कि भूमि की वास्तविक आवश्यकता तय करने के दौरान अधिकारियों की ओर से “स्पष्ट रूप से सोच-विचार की कमी” दिखाई देती है। इसी आधार पर अदालत ने SIA रिपोर्ट, विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और सरकारी आदेश को उस सीमा तक अवैध ठहराया, जहां वे न्यूनतम भूमि आवश्यकता के प्रश्न को संबोधित करने में विफल रहे। चूंकि धारा 11 की अधिसूचना इन्हीं चरणों के वैध रूप से पूरे होने पर निर्भर थी, इसलिए उसे भी रद्द कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पूरी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करे। इसके तहत पहले केवल न्यूनतम भूमि आवश्यकता पर केंद्रित एक नया सामाजिक प्रभाव आकलन किया जाए, फिर विशेषज्ञ समूह द्वारा ताजा समीक्षा हो और उसके बाद सरकार दोबारा निर्णय ले।

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याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए ‘सत्ता के दुरुपयोग’ और ‘कूटनीतिक अधिकार प्रयोग’ के आरोपों पर अदालत ने फिलहाल अंतिम राय देने से परहेज किया। न्यायालय ने कहा कि यह मुद्दा न्यूनतम भूमि निर्धारण से गहराई से जुड़ा है और उस प्रक्रिया के विधिवत पूरा होने के बाद ही इसकी जांच संभव होगी।

अंत में, अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि एयरपोर्ट जैसी तकनीकी रूप से जटिल परियोजनाओं के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन टीम में तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि निर्णय प्रक्रिया अधिक सूचित और कानूनी रूप से मजबूत हो सके। याचिका को स्वीकार करते हुए अदालत ने अन्य मुद्दों को भविष्य के लिए खुला रखा है।

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