चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जनवरी तक टली

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की उस याचिका पर सुनवाई जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी, जिसमें उन्होंने कथित शराब घोटाले से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की गई अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह के मामले को टुकड़ों में नहीं सुना जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में सभी पहलुओं पर एक साथ विचार किया जाएगा और इसकी सुनवाई अगले वर्ष जनवरी के पहले सप्ताह में की जाएगी। चैतन्य बघेल को ईडी ने 18 जुलाई को गिरफ्तार किया था। उन्होंने अपनी याचिका में धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के कुछ प्रावधानों की वैधता को भी चुनौती दी है।

सुनवाई के दौरान चैतन्य बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर लेती हैं, लेकिन जांच को खुला छोड़ देती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनिंदा तरीके से कार्रवाई की जा रही है और बार-बार नए वारंट जारी किए जा रहे हैं। सिब्बल ने आग्रह किया कि इस दौरान किसी तरह के दबावात्मक कदम न उठाए जाएं।

ईडी की ओर से पेश अधिवक्ता जोहेब हुसैन ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि चैतन्य बघेल पहले से ही न्यायिक हिरासत में हैं और उनकी जमानत याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है, जहां फैसला सुरक्षित रखा गया है। उन्होंने यह भी कहा कि जब आरोपी हिरासत में हो तो किसी अतिरिक्त “कोर्सिव स्टेप्स” की बात करना असंगत है, खासकर तब जब वह किसी अन्य मामले में अग्रिम जमानत भी मांग रहे हों।

पीठ ने कहा कि इस याचिका से जुड़े मुद्दों को अलग-अलग हिस्सों में नहीं देखा जा सकता और पूरे मामले पर समग्र रूप से सुनवाई आवश्यक है।

गौरतलब है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और ईडी समेत कई एजेंसियां महादेव सट्टा ऐप, राइस मिलों और कथित कोयला, शराब तथा जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) घोटालों से जुड़े मामलों की जांच कर रही हैं। ये सभी कथित तौर पर भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री रहते हुए हुए थे।

चैतन्य बघेल ने सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 17 अक्टूबर के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी गिरफ्तारी को सही ठहराया गया था। इसके अलावा उन्होंने पीएमएलए की धारा 50 समेत अन्य प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाए हैं।

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इससे पहले, 4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में सीधे शीर्ष अदालत का रुख करने की प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई थी और भूपेश बघेल व उनके बेटे को केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जांच किए जा रहे मामलों में पहले हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया था।

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