सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के खिलाफ दायर याचिका खारिज की; CJI बोले- ‘वकील मुकदमे पैदा न करें’

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि दिल्ली हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate) पदनाम प्रक्रिया के संबंध में शीर्ष अदालत के पिछले आदेशों का पालन नहीं किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेवजह की याचिकाओं से बचा जाना चाहिए।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमल्य बागची की पीठ ने याचिका दायर करने वाले वकील के कदम पर कड़ी आपत्ति जताई। पीठ ने वकीलों को नसीहत देते हुए कहा कि बार के सदस्यों से मुकदमेबाजी (litigation) पैदा करने की उम्मीद नहीं की जाती है।

“देरी मानने का कोई कारण नहीं”

याचिका में दावा किया गया था कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल के आदेश पर कोई कार्रवाई नहीं की है। उस आदेश में हाईकोर्ट को उन वकीलों के आवेदनों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था, जिनके नाम पिछले साल की पदनाम प्रक्रिया में या तो खारिज कर दिए गए थे या टाल (deferred) दिए गए थे।

इस आशंका को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि देश भर के अधिकांश हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अनुरूप अपने नियमों में संशोधन करने की प्रक्रिया में हैं।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “हमारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करने में हाईकोर्ट द्वारा अत्यधिक देरी की जाएगी। याचिका खारिज की जाती है।”

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याचिकाकर्ता को संबोधित करते हुए CJI सूर्य कांत ने टिप्पणी की, “हम बार के सदस्यों से मुकदमेबाजी पैदा करने की उम्मीद नहीं करते हैं। इस तरह की याचिकाएं दायर न करें। चीफ जस्टिस कमेटी इस मामले से अवगत है।”

क्या है पूरा विवाद?

यह कानूनी लड़ाई दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पिछले साल आयोजित वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम प्रक्रिया से जुड़ी है। नवंबर 2024 में ‘फुल कोर्ट’ द्वारा लिए गए निर्णय में, इंटरव्यू किए गए 302 उम्मीदवारों में से केवल 70 वकीलों को सीनियर गाउन प्रदान किया गया था। वहीं, 67 अन्य आवेदकों के मामलों को स्थगित (defer) कर दिया गया था।

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यह चयन प्रक्रिया तब विवादों में घिर गई थी जब स्थायी समिति (Permanent Committee) के एक सदस्य, वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर नंदराजोग ने इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने दावा किया था कि अंतिम सूची उनकी सहमति के बिना तैयार की गई थी। बता दें कि ‘इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट’ (2017) के फैसले के तहत गठित यह स्थायी समिति उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करती है, जिसके बाद फुल कोर्ट अंतिम निर्णय लेता है।

अप्रैल में दिया गया था निर्देश

इन विवादों के बाद, अधिवक्ता रमन गांधी ने नवंबर 2024 के फैसले को रद्द करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

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अप्रैल में उस याचिका पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट को निर्देश दिया था कि वह उन वकीलों के आवेदनों पर पुनर्विचार करे जिनके नाम खारिज या स्थगित कर दिए गए थे। मंगलवार को खारिज की गई वर्तमान याचिका में इसी निर्देश के अनुपालन न होने का आरोप लगाया गया था, जिसे कोर्ट ने निराधार माना।

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