सरलता ही सुशासन है: सहकारी समितियों पर अतिरिक्त शर्तें थोपने वाला झारखंड सरकार का 2009 का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को झारखंड सरकार के उस 2009 के निर्देश को रद्द कर दिया, जिसमें सहकारी समितियों को संपत्ति हस्तांतरण दस्तावेजों के पंजीकरण पर स्टांप शुल्क छूट पाने के लिए सहकारिता के सहायक रजिस्ट्रार से अतिरिक्त सत्यापन अनिवार्य किया गया था।

न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि सरकार द्वारा थोपे गए “अनावश्यक और अत्यधिक” शर्तें अवैध हैं और टिक नहीं सकतीं।

निर्णय लिखते हुए न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि सार्वजनिक लेन-देन में सरलता सुशासन की पहचान है। अदालत ने टिप्पणी की कि प्रशासनिक प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो स्पष्ट, सरल और आसानी से समझ आने वाली हो, ताकि जनता बिना किसी अतिरिक्त बोझ के उसका पालन कर सके।

उन्होंने लिखा, “सरलता ही सुशासन है। संवैधानिक अदालतें इस गुण को इसलिए संरक्षित करती हैं ताकि कानून का शासन मजबूत हो और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित हो। प्रशासनिक प्रक्रियाओं में जटिलता, अनावश्यक औपचारिकताएं और बेवजह के बोझ से समय, खर्च और मानसिक शांति का नुकसान होता है।”

20 फरवरी 2009 को जारी हुए इस मेमो में जिला उप-रजिस्ट्रारों को निर्देश दिया गया था कि भारतीय स्टांप (बिहार संशोधन) अधिनियम, 1988 की धारा 9A के तहत छूट तभी दी जाए जब सहायक रजिस्ट्रार यह अनुशंसा करे कि संबंधित सहकारी समिति अस्तित्व में है।

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शीर्ष अदालत ने कहा कि एक बार समिति पंजीकृत हो जाती है और प्रमाणपत्र जारी हो जाता है, तो यह उसके अस्तित्व का अंतिम और निर्णायक प्रमाण है। इसलिए अतिरिक्त सिफारिश मांगना “अनावश्यक, अप्रासंगिक और अवैध” है।

पीठ ने इसे “अतिरिक्त, निरर्थक और अवैध” करार दिया और कहा कि यह शर्त प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा में कोई मूल्यवृद्धि नहीं करती।

अदालत ने आदर्श सहकारी गृह निर्माण स्वावलंबी सोसायटी लिमिटेड की अपील स्वीकार कर ली, जिसने इस मेमो को चुनौती दी थी। झारखंड हाई कोर्ट ने यह तर्क मानते हुए सरकार के कदम को सही ठहराया था कि अतिरिक्त जांच से केवल वास्तविक समितियां ही लाभ ले सकेंगी।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जब विधि द्वारा जारी प्रमाणपत्र ही उद्देश्य को पूरा करता है, तो उसके अतिरिक्त कोई और बाधा थोपना संविधान सम्मत प्रशासन नहीं माना जा सकता।

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निर्णय के साथ शीर्ष अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि सरकारें नियमों के नाम पर ऐसे अवरोध नहीं खड़ी कर सकतीं जो नागरिकों के अधिकारों या लेन-देन की सरल प्रक्रिया में अनावश्यक रुकावट पैदा करें।

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