सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में चल रहे ध्वस्तीकरण पर एक सप्ताह का अंतरिम संरक्षण दिया; याचिकाकर्ताओं को इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश के दो याचिकाकर्ताओं को एक सप्ताह की अंतरिम राहत देते हुए उनके आवासीय और मैरिज हॉल परिसरों के ध्वस्तीकरण पर रोक लगा दी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि बिना किसी नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए, प्राधिकरणों ने उनके परिसरों का आंशिक ध्वस्तीकरण पहले ही शुरू कर दिया है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने निर्देश दिया कि इस अवधि में पक्षकार यथास्थिति बनाए रखें, ताकि याचिकाकर्ता उचित आदेश के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख कर सकें।
पीठ ने कहा, “यह देखते हुए कि आंशिक ध्वस्तीकरण पहले ही किया जा चुका है, हम एक सप्ताह की अवधि के लिए अंतरिम संरक्षण प्रदान करते हैं और पक्षकार यथास्थिति बनाए रखेंगे।”

शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उसकी ओर से दिया गया यह अंतरिम संरक्षण उच्च न्यायालय के विवेक और निर्णय को प्रभावित नहीं करेगा, और हाईकोर्ट याचिका पर उसके अपने गुण-दोष के आधार पर विचार करेगा।

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याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और यह दावा किया कि उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया और उनकी बात सुने बिना कार्रवाई की गई। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक 75 वर्षीय वृद्ध व्यक्ति हैं जिन्होंने नोटिस देने और सुनवाई का अवसर देने की अपील की थी, परंतु कोई जवाब नहीं दिया गया।

पीठ ने पूछा कि याचिकाकर्ता पहले हाईकोर्ट क्यों नहीं गए।
“इस मामले पर विस्तृत फैसला पहले ही दिया जा चुका है। तब हाईकोर्ट जाइए और उस फैसले का लाभ उठाइए। हर बार अनुच्छेद 32 में क्यों आते हैं?” पीठ ने कहा। साथ ही कहा, “ऐसा नहीं है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट तत्काल मामलों को नहीं सुनता। आपको बस ‘मेनशन’ करनी होती है।”

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याचिकाकर्ताओं की ओर से 15 दिन की सुरक्षा मांगने पर पीठ ने मना कर दिया और कहा कि अगर ऐसा हुआ तो हर पक्ष सुप्रीम कोर्ट आएगा और हाईकोर्ट के दायरे में आने वाले मामलों पर अनुच्छेद 226 अप्रासंगिक हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को अनुच्छेद 32 के तहत स्वीकार करने से इनकार कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ताओं को अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी और त्वरित सुनवाई के लिए ‘मेनशन’ करने की अनुमति भी दी।
पीठ ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को लगता है कि प्राधिकरणों की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश का उल्लंघन है, तो वे अवमानना याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष नवंबर में एक महत्वपूर्ण निर्णय में पूरे देश में यह स्पष्ट किया था कि बिना शो-कॉज नोटिस दिए और प्रभावित पक्ष को कम से कम 15 दिन का समय दिए बिना किसी संपत्ति को ध्वस्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा था कि नागरिकों को दंडित करने के नाम पर बिना प्रक्रिया अपनाए घरों को तोड़ना “मनमाना और उच्च-handed” कदम है और ऐसे मामलों से “कानून की कठोरता” के साथ निपटना चाहिए।

ये दिशा-निर्देश उन स्थितियों में लागू नहीं होंगे, जहां निर्माण सार्वजनिक स्थान—सड़क, फुटपाथ, रेलवे लाइन के आसपास, नदी या जल स्रोतों पर—अवैध रूप से किया गया हो, या जहां किसी अदालत द्वारा ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया गया हो।

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