“क्या बिना ट्रायल के 8 साल जेल में रहना होगा?” – सुप्रीम कोर्ट में उमर खालिद की जमानत पर सिब्बल की तीखी दलीलें

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (2 दिसंबर, 2025) को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के पीछे कथित “बड़ी साजिश” (Larger Conspiracy) से जुड़े मामले में पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद और छात्र कार्यकर्ता शर्जील इमाम की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखी।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने अनिश्चितकालीन कैद और ट्रायल में हो रही देरी को लेकर अभियोजन पक्ष (दिल्ली पुलिस) पर गंभीर सवाल उठाए।

“अभियोजन पक्ष की वजह से रुका है ट्रायल”

उमर खालिद की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अपनी रिजोइंडर दलीलों (Rejoinder Arguments) की शुरुआत ट्रायल में हो रही अत्यधिक देरी के मुद्दे से की। उन्होंने बताया कि खालिद 13 सितंबर, 2020 से हिरासत में हैं, और उन्हें जेल में 5 साल से अधिक का समय हो चुका है।

सिब्बल ने अदालत में तर्क दिया कि ट्रायल में देरी के लिए आरोपी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि यह देरी पूरी तरह से अभियोजन पक्ष की “जांच पूरी न होने” की दलील के कारण हुई है।

सिब्बल ने कोर्ट से कहा:

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“मैं आरोपों (Charges) पर बहस करने के लिए तैयार था, लेकिन ट्रायल जज ने मना कर दिया… हाईकोर्ट के आदेश में यह कहीं नहीं कहा गया कि मुझे देरी के कारण जमानत नहीं दी गई। ट्रायल में देरी केवल इसलिए हुई क्योंकि अभियोजन पक्ष ने जानबूझकर यह बयान देने से इनकार कर दिया कि जांच पूरी हो चुकी है।”

उन्होंने बताया कि पुलिस लगातार पूरक चार्जशीट (Supplementary Chargesheets) दाखिल कर रही है, जिससे आरोपों को तय करने (Framing of Charges) की प्रक्रिया रुकी हुई है। सिब्बल ने अपने मुवक्किल की स्वतंत्रता पर चिंता जताते हुए एक गंभीर परिदृश्य रखा:

“मान लीजिए कि आप मेरी याचिका खारिज कर देते हैं। तो मैं अगले 3 साल और अंदर रहूंगा। यानी बिना ट्रायल के 8 साल। मैं एक शिक्षाविद हूं। मैं एक व्यक्ति हूं। मेरे खिलाफ किसी भी प्रत्यक्ष हिंसा (Overt Act) का आरोप नहीं है।”

“रिजीम चेंज” और हिंसा के सबूत नदारद

सिब्बल ने जोर देकर कहा कि खालिद को केवल एक कथित “समग्र साजिश” के आधार पर एफआईआर 59/2020 में फंसाया गया है। उन्होंने दोहराया कि दंगों के वक्त खालिद दिल्ली में मौजूद भी नहीं थे और अमरावती में दिया गया उनका भाषण, जिसे पुलिस भड़काऊ बताती है, वास्तव में “गांधीवादी सिद्धांतों” पर आधारित था।

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वहीं, सह-आरोपियों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने दिल्ली पुलिस के उस सिद्धांत पर हमला बोला जिसमें दंगों को “सत्ता परिवर्तन” (Regime Change) का एक समन्वित अभियान बताया गया था।

सिंघवी ने सवाल किया कि यह नैरेटिव चार्जशीट में क्यों नहीं है:

“आपने अपनी चार्जशीट के मुख्य भाग में ‘रिजीम चेंज’ का आरोप कहां लगाया है? इसका आधार क्या है?”

उन्होंने चुनौती दी कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस सबूत दिखाए जो आरोपियों को पत्थरों या हथियारों की आपूर्ति जैसी किसी विशिष्ट साजिश से जोड़ता हो।

कोर्ट में तीखी बहस

दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि दंगे पूर्व-नियोजित थे। एएसजी राजू ने सिब्बल के इस दावे का भी खंडन किया कि देरी के लिए केवल पुलिस जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि कई बार बचाव पक्ष ने भी यह कहा है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, वे आरोपों पर बहस नहीं करेंगे।

एएसजी ने टिप्पणी की, “मेरे ऊपर अनुचित होने का आरोप न लगाएं।”

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इस पर जस्टिस कुमार ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि इस मामले में आरोप तय होने के बाद ही ट्रायल शुरू होगा और उन्होंने आरोप तय करने के दौरान हुई देरी की जिम्मेदारी पर सवाल भी पूछे।

सुनवाई की स्थिति

फिलहाल जमानत याचिकाओं पर दलीलें पूरी नहीं हुई हैं और सुनवाई लंच के बाद भी जारी रहने का कार्यक्रम तय किया गया। पीठ अब प्रत्येक आरोपी की विशिष्ट भूमिका और यूएपीए (UAPA) के तहत बिना ट्रायल शुरू हुए इतने लंबे समय तक जेल में रखने की कानूनी वैधता पर विचार कर रही है।

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